logo

मूड

ट्रेंडिंग:

'BJP-अमित शाह मुर्दाबाद' कहना जिला बदर का आधार कैसे? बॉम्बे हाई कोर्ट का सवाल

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक फैसले में कहा कि सरकार के खिलाफ प्रदर्शन में हिस्सा लेने मात्र से किसी व्यक्ति को जिला बदर नहीं किया जा सकता।

 bombay high court judgements

बॉम्बे हाई कोर्ट।

शेयर करें

google_follow_us

संबंधित खबरें

Advertisement

बॉम्बे हाई कोर्ट ने शुक्रवार कहा कि सरकार के खिलाफ आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों में शामिल होने मात्र के आधार पर किसी व्यक्ति के खिलाफ जिला बदर का आदेश पारित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने एक स्थानीय नेता के खिलाफ जारी एक साल के जिला बदर आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की है।

 

जस्टिस माधव जामदार की एकल पीठ ने गुरुवार को पारित आदेश में कहा कि केवल भारत सरकार के कुछ फैसलों का विरोध करने की वजह से सईद अहमद अब्दुल वहीद चौधरी को जिला बदर करना उनके मौलिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करता है।

 

यह भी पढ़ें: 'निर्भीक कामकाज में बाधा', जज को मिल रही धमकियों पर बोला हाईकोर्ट

एफआईआर की समीक्षा करने को कहा

कोर्ट ने वहीद चौधरी के खिलाफ दर्ज एफआईआर की समीक्षा करने के बाद कहा कि उन्होंने (चौधरी ने) बीजेपी सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ नारे लगाए थे, जिनके आधार पर जिला बदर का आदेश जारी किया गया था।

नारे लगाने से जिला बदर का आदेश कैसे?

कोर्ट ने सवाल किया, 'क्या केवल नारे लगाने के लिए जिला बदर का आदेश जारी किया जा सकता है? क्या नागरिक ऐसे नारे नहीं लगा सकते? सरकार की कार्रवाइयों और फैसलों के खिलाफ नागरिक विरोध-प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकते?'

 

यह भी पढ़ें: पंजाब पर बीजेपी की नजर, पीएम मोदी खुद संभालेंगे कमान, चंडीगढ़, पंजाब के दौरे तय

याचिका में क्या है?

हाई कोर्ट ने यह आदेश सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया से जुड़े वहीद चौधरी द्वारा दायर याचिका पर जारी किया। वहीद चौधरी ने याचिका में मुंबई पुलिस की ओर से उनके खिलाफ की गई कार्रवाई को चुनौती दी थी। याचिका के मुताबिक, वहीद चौधरी और उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा सरकार के कुछ फैसलों के खिलाफ कई विरोध-प्रदर्शन और आंदोलन किए जाने के बाद उनके खिलाफ जिला बदर का आदेश जारी किया गया था।

 

पुलिस का दावा था कि ये विरोध-प्रदर्शन संबंधित अधिकारियों से आवश्यक अनुमति लिए बिना आयोजित किए गए थे। कोर्ट ने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आंदोलनों और विरोध-प्रदर्शनों से कोई नुकसान हुआ था इसलिए केवल इन्हीं के आधार पर महाराष्ट्र पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के तहत जिला बदर का आदेश जारी नहीं किया जा सकता।


और पढ़ें