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'श्मशान से खोदकर लाश निकालो, कब्रिस्तान में दफनाओ', हाई कोर्ट ने ऐसा क्यों कहा?

एक मुस्लिम शख्स की लाश हिंदुओं के श्मशान में गाड़ दी गई थी। अब हाई कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस लाश को खोदकर निकाला जाए और मुस्लिमों के कब्रिस्तान में गाड़ा जाए।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit: Sora AI

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अक्सर आपने जिंदा लोगों को ही अदालतों के चक्कर लगाते और अपने हक के लिए लड़ते देखा होगा। अब एक रोचक मामला सामने आया है जिसमें हाई कोर्ट ने 'मरने के बाद के अधिकार' का जिक्र किया है। बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस केस में सुनवाई के बाद आदेश दिए हैं कि एक मुस्लिम शख्स की दफनाई गई लाश को कब्रिस्तान से खोदकर निकाला जाए और सही तरीके से दफनाया जाए। यह मामला महाराष्ट्र के नागपुर का है। केस यह है कि गलती से मुस्लिम शख्स के शव को हिंदुओं के श्मशान वाली जमीन पर दफना दिया गया। इस शख्स की मौत एक ट्रेन हादसे में हुई थी।

 

इस मामले पर बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने सुनवाई की और अपना फैसला सुनाया। हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच में जस्टिस अनिल किलोर और राज वकोडे शामिल थे। इन दोनों जजों ने जाविद खान की ओर से दाखिल याचिका को स्वीकार किया और तहसीलदाप और नागपुर ग्रामीण क्षेत्र से सब डिविजनल ऑफिसर के आदेश को खारिज कर दिया। इन दोनों अधिकारियों ने लाश को खोदकर निकालने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। याचिका दायर करने वाले जाविद खान मृतक के भाई हैं।

क्या है मामला?

 

अब हाई कोर्ट ने आदेश दिए हैं कि घाट रोड पर स्थित मोक्षधाम घाट पर दफनाई गई साजिद खान की लाश को निकाला जाए। यह काम नागपुर नगर निगम की निगरानी में करवाया जाएगा और लाश जाविद खान को सौंपी जाएगी। ऐसा करने की वजह यह है कि जाविद खान अपने भाई का अंतिम संस्कार इस्लामी परंपराओं के हिसाब से करना चाहते हैं। 

 

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रिपोर्ट के मुताबिक, मालेगांव के रहने वाले साजिद खान 25 जनवरी को अपने दो दोस्तों के सात ताजुद्दीन बाबा के उर्स में आए थे। 26 जनवरी को वह बुतिबोरी के पास लापता हो गए। बाद में एक ट्रेन हादसे में उनकी मौत हो गई। लाश मिली लेकिन पहचान नहीं की जा सकी कि वह कौन हैं। आखिर में पुलिस ने उनका अंतिम संस्कार हिंदुओं के श्मशान मोक्षधाम घाट में करवा दिया और अज्ञात के तौर पर उनकी लाश दफना दी।

हाई कोर्ट ने क्या वजह बताई?

 

बाद में जब पुलिस को इस केस की हकीकत पता चली तो खुद पुलिस ने ही लाश खोदकर निकालने और बाबा ताजबाग कब्रिस्तान में गाड़ने की अनुमति मांगी। हालांकि, स्थानीय प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी। इसी को चुनौती देते हुए यह मामला हाई कोर्ट में पहुंचा।

 

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अब हाई कोर्ट ने कहा है, 'संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जो जीवन का अधिकार मिलता है, न्यायिक तौर पर यह समझा जाता है कि उसी में सम्मान का अधिकार है और यह अधिकार मरने के बाद भी लागू रहता है।' इसके लिए हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार बनाम आश्रय अधिकार अभियान में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र किया। हाई कोर्ट की इस बेंट ने कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो लाश को खोदकर निकालने से रोकता हो। ऐसे में कोर्ट ने नागपुर ग्रामीण की पुलिस को भी निर्देश दिए हैं कि वह अपनी निगरानी में यह काम करवाए और मृतक के भाई को शव के अवशेष सौंप दे।

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