हिमाचल प्रदेश में इस मानसून के दौरान भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने से हुए नुकसान के आकलन के लिए प्रदेश का दौरा कर चुके अंतर-मंत्रालय केंद्रीय दल ने गुरुवार को मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय दल के समक्ष हिमाचल की भौगोलिक परिस्थितियों और लगातार बदलते मौसम से पैदा हो रही नई आपदा चुनौतियों को प्रमुखता से उठाया।
गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव एम. रामचंद्रुडु के नेतृत्व में आए अंतर-मंत्रालय दल ने सितंबर में प्रदेश के विभिन्न आपदा प्रभावित क्षेत्रों का दौरा कर जमीनी नुकसान का जायजा लिया था। मुख्यमंत्री ने दल के साथ आपदा से हुए नुकसान, राहत और पुनर्वास के साथ भविष्य में आपदाओं से निपटने की तैयारियों पर विस्तार से चर्चा की।
बादल फटने की घटनाओं का अध्ययन जरूरी
मुख्यमंत्री ने कहा कि हिमाचल में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। कम समय में अत्यधिक बारिश, बादल फटने और अचानक बाढ़ जैसी घटनाओं की आवृत्ति बढ़ रही है। उन्होंने बादल फटने की बढ़ती घटनाओं का वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन करवाने की आवश्यकता पर जोर दिया, ताकि इनके कारणों को समझने के साथ-साथ संवेदनशील क्षेत्रों में पूर्व चेतावनी और आपदा प्रबंधन की व्यवस्था को मजबूत किया जा सके। मुख्यमंत्री ने केंद्र से आपदा राहत राशि जारी करने के मौजूदा मानकों में बदलाव की मांग की।
उन्होंने कहा कि हिमाचल जैसे पर्वतीय राज्यों की भौगोलिक और भौतिक परिस्थितियां मैदानी राज्यों से पूरी तरह अलग हैं। पहाड़ों में सड़क, पुल, पेयजल योजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे को दोबारा तैयार करने की लागत और समय दोनों अधिक होते हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदा से हुए नुकसान का आकलन करते समय पर्वतीय राज्यों की विशिष्ट परिस्थितियों को अलग से ध्यान में रखा जाना चाहिए, ताकि प्रभावित क्षेत्रों को वास्तविक नुकसान के अनुरूप राहत और पुनर्निर्माण सहायता मिल सके।
हिमाचल उत्तर भारत का ‘इकोलॉजिकल बैलेंस’
मुख्यमंत्री ने हिमाचल के पर्यावरणीय महत्व को भी केंद्रीय दल के समक्ष रखा। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश उत्तर भारत के पारिस्थितिक तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और प्रदेश की वन संपदा तथा प्राकृतिक संसाधन पूरे क्षेत्र को स्वच्छ वायु उपलब्ध कराने में योगदान देते हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल में बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मुख्यमंत्री ने राजमार्गों के निर्माण के दौरान अधिक से अधिक सुरंगों के निर्माण पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क चौड़ीकरण के लिए बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटिंग करने के बजाय सुरंग आधारित निर्माण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इससे भूस्खलन के जोखिम को कम करने और पर्यावरणीय नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
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आपदा प्रबंधन की दीर्घकालिक रणनीति बने
मुख्यमंत्री ने केंद्रीय दल को प्रदेश में आपदा प्रबंधन, राहत एवं पुनर्वास से जुड़े प्रयासों की जानकारी भी दी और पर्वतीय राज्यों के लिए आपदा प्रबंधन की दीर्घकालिक रणनीति तैयार करने की आवश्यकता बताई। इस अवसर पर मुख्य सचिव के.के. पंत, जल शक्ति मंत्रालय के निदेशक प्रकाश चंद, कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. सुभाष चंद्रा, ग्रामीण विकास मंत्रालय के निदेशक रामावतार मीणा, निदेशक एवं विशेष सचिव आपदा प्रबंधन पुष्पेंद्र राणा सहित अंतर-मंत्रालय केंद्रीय दल के सदस्य और प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।