देश में कई कोयला खदानें हैं जिनसे कोयले की नियमित आपूर्ति बनी रहती है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों, मेघालय, असम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भी कोयले की खदानें सक्रिय हैं। साल 2014 में रैट-होल माइनिंग पर प्रतिबंध के बाद मेघालय में 2025 से वैज्ञानिक तरीके से खनन दोबारा शुरू किया गया। पूरे उत्तर-पूर्व क्षेत्र में लगभग 1739 मिलियन टन कोयला संसाधन उपलब्ध हैं। मेघालय में बड़ी संख्या में खदानें मौजूद हैं लेकिन पहाड़ी इलाकों में अब भी कोयला खनन मुख्य रूप से रैट-होल पद्धति से किया जाता है। यह संकरी सुरंगों पर आधारित तरीका बेहद खतरनाक माना जाता है। खदानों की अधिकता के बावजूद खनन असुरक्षित बना हुआ है, क्योंकि कई जगह अवैध और अवैज्ञानिक तरीकों का इस्तेमाल होता है और सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता।
मेघालय के जयंतिया हिल्स और खासी हिल्स प्रमुख कोयला क्षेत्र हैं। यहां सायंगखाम (पूर्व जयंतिया हिल्स) और पिंडेंगशालांग (पश्चिम खासी हिल्स) ब्लॉकों में जून 2025 से उत्पादन शुरू हो चुका है। इसके बावजूद पहाड़ी इलाकों में अवैध रैट-होल खनन जारी है, जिसके कारण अक्सर हादसे होते रहते हैं। उदाहरण के तौर पर, जनवरी 2026 में पूर्व जयंतिया हिल्स के थंगस्को गांव में हुए विस्फोट में दो लोगों की मौत हो गई।
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'रैट-होल माइनिंग'
मेघालय के पहाड़ों में कोयला खनन एक अत्यंत जटिल और विवादास्पद मुद्दा है। यहां कोयला निकालने के लिए जिस पारंपरिक तरीके का उपयोग किया जाता है, उसे 'रैट-होल माइनिंग' कहते हैं। मेघालय की पहाड़ियों (खासी, जयंतिया और गारो हिल्स) में कोयले की परतें बहुत पतली (लगभग 2 मीटर से कम) हैं। यहां बड़ी मशीनों से खनन करना आर्थिक रूप से महंगा पड़ता है, इसलिए स्थानीय लोग संकरी सुरंगें खोदते हैं।
यह तकनीक ही सबसे बड़ी जानलेवा वजह है। इसमें 3-4 फीट चौड़ी संकरी सुरंगें बनाई जाती हैं। इन सुरंगों में खंभों या कंक्रीट का सहारा नहीं दिया जाता, जिससे मिट्टी और पहाड़ धंसने का खतरा हमेशा बना रहता है। संकरी सुरंगों में ऑक्सीजन की भारी कमी होती है और जहरीली गैसों के रिसाव से मजदूरों की मौत हो जाती है।
पर्यावरण पर असर
मेघालय के कोयले में सल्फर की मात्रा बहुत अधिक होती है। जब यह कोयला हवा और पानी के संपर्क में आता है, तो सल्फ्यूरिक एसिड बनता है। इससे खदानों के अंदर का पानी बेहद जहरीला और एसिडिक हो जाता है। यदि कोई मजदूर इसमें फंस जाए तो उसके स्किन और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। मेघालय दुनिया के सबसे अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है। बारिश का पानी पहाड़ों से रिसकर सीधे इन गहरी सुरंगों में भर जाता है। चूंकि ये खदानें अवैध और अनियोजित होती हैं इसलिए इनमें पानी निकालने की कोई व्यवस्था नहीं होती।
खदानों से निकलने वाला पानी अत्यधिक अम्लीय होता है, जिसने लुखा और कोपिली जैसी नदियों के पानी को नीला या नारंगी कर दिया है, जिससे मछलियां और अन्य जलीय जीव मर गए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2014 में सुरक्षा और पर्यावरण के कारणों से इस पर प्रतिबंध लगा दिया था।
इसके बावजूद, निजी मालिकाना वाली भूमि होने के कारण यहां चोरी-छिपे खनन जारी रहता है। 2018 क्षान हादसे में जयंतिया हिल्स में 15 मजदूर एक खदान में पानी भरने से फंस गए थे। यह भारत के सबसे लंबे बचाव अभियानों में से एक था, जिसमें नौसेना और NDRF को महीनों तक मशक्कत करनी पड़ी थी। हाल के वर्षों में भी अवैध खदानों के धंसने से मजदूरों की मौत की खबरें आती रही हैं।
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बड़ी घटनाएं
शिलांग स्थित NGO इंपल्स सोशल एंटरप्राइजेज के अनुसार, यह अनुमान है कि अकेले इस सात साल (2007-2014) की अवधि में मेघालय में रैट-होल खदानों में 10,000 से 15,000 लोग - जिनमें से कई बच्चे और प्रवासी मजदूर थे मारे गए। जुलाई 2012 में, नोंगलबिब्रा इलाके में एक खदान में पानी भरने से कम से कम 30 खनिक फंस गए और मारे गए। 2021 में पूर्वी जयंतिया हिल्स में ही एक अन्य घटना में 6 मजदूरों की मौत हुई थी।
मेघालय में खनन इसलिए असुरक्षित है क्योंकि वहां जमीन के मालिक खुद ही बिना किसी इंजीनियरिंग सलाह या सरकारी सुरक्षा मानकों के खुदाई करवाते हैं। संकरी सुरंगों में बच्चों और छोटे कद के मजदूरों को भेजा जाता है, जिनके पास न तो हेलमेट होते हैं और न ही ऑक्सीजन मास्क।