उत्तर प्रदेश में नकली दवाओं का संगठित और बहुस्तरीय नेटवर्क सक्रिय है, जो प्रदेश की बड़ी दवा मंडियों से लेकर छोटे शहरों और मेडिकल स्टोरों तक फैला हुआ है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) की जांच में खुलासा हुआ है कि राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से आने वाली नामी कंपनियों की नकली दवाएं पहले आगरा और लखनऊ की मंडियों तक पहुंचती हैं। इसके बाद इन्हें पूरे प्रदेश में सप्लाई करने के साथ महराजगंज और सिद्धार्थनगर के रास्ते नेपाल तथा पश्चिम बंगाल के जरिए बांग्लादेश तक भेजा जा रहा है। बीते एक महीने में करीब 20 करोड़ रुपये की नकली दवाएं पकड़ी गई हैं, 50 से अधिक मेडिकल स्टोरों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हुए हैं और कई जिलों में लगातार छापेमारी जारी है।
एफएसडीए (FSDA) की जांच में सामने आया है कि उत्तर प्रदेश नकली दवाओं के कारोबार का सबसे बड़ा बाजार बन चुका है। राजस्थान, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से आने वाली फर्जी दवाओं की खेप सबसे पहले आगरा और लखनऊ की प्रमुख दवा मंडियों में पहुंचती है। यहां से इन्हें प्रदेश के विभिन्न जिलों में भेजा जाता है और फिर छोटे शहरों के मेडिकल स्टोरों तक पहुंचाया जाता है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, एफएसडीए की सख्ती के दौरान कुछ समय के लिए सप्लाई रोक दी जाती है लेकिन निगरानी कम होते ही पूरा नेटवर्क दोबारा सक्रिय हो जाता है। कई मामलों में नकली दवाएं कोरियर के जरिए भी भेजी जाती हैं। वहीं सरकारी और निजी बस अड्डों के आसपास बने गोदामों का इस्तेमाल स्टॉक रखने और मेडिकल स्टोरों तक सप्लाई पहुंचाने के लिए किया जाता है।
नेपाल और बांग्लादेश तक पहुंच रही फर्जी दवाएं
जांच में सामने आया है कि महराजगंज और सिद्धार्थनगर बॉर्डर के रास्ते नकली दवाओं की खेप नेपाल भेजी जा रही है। वहीं वाराणसी से दवाएं बिहार और पश्चिम बंगाल पहुंचती हैं, जहां उनकी पैकेजिंग बदलकर बांग्लादेश भेजा जाता है। कई नमूनों की जांच में दवा का सक्रिय तत्व (एक्टिव इंग्रेडिएंट) बेहद कम या न के बराबर मिला है। जांच एजेंसियों को आशंका है कि जल्द एक्सपायर होने वाली दवाओं पर नया रैपर चढ़ाकर भी बाजार में बेचा जा रहा है।
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एक महीने में 20 करोड़ की नकली दवाएं जब्त
एफएसडीए की कार्रवाई के दौरान पिछले एक महीने में करीब 20 करोड़ रुपये की नकली दवाएं जब्त की गई हैं। 50 से अधिक मेडिकल स्टोरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई गई है। गिरफ्तार आरोपियों से मिली जानकारी के आधार पर लखनऊ, आगरा, वाराणसी समेत कई जिलों में लगातार छापेमारी जारी है।आगरा की विभोर मेडिकल एजेंसी से अंशिका फार्मा ने चेमोरॉल फोर्ट दवा खरीदकर कोलकाता की पाल ब्रदर्स को बेची थी। जांच में स्टॉक रजिस्टर में एंट्री मिली लेकिन खरीद के बिल फर्जी पाए गए।
दूसरे मामले में लखनऊ के आलमबाग से बरामद दवा नकली निकली। पूछताछ में आरोपी ने बताया कि उसने यह दवा वाराणसी की न्यू सर्जिकल से बिना बिल खरीदी थी। आगे की जांच में संदीप सिंह ने खुलासा किया कि उसने यह दवा प्रयागराज निवासी संजय सिंह चौहान से खरीदी थी। इन मामलों के बाद पूरे नेटवर्क की कई कड़ियां सामने आई हैं।
दवा कारोबारियों ने भी मानी बड़ी चुनौती
दवा व्यापार मंडल के अध्यक्ष सुरेश कुमार ने कहा कि अधिक मुनाफे के लालच में बिना बिल दवाएं खरीदना सबसे बड़ी गलती है। दवा विक्रेताओं को पैकिंग, बैच नंबर और बिल की पूरी जांच करनी चाहिए। नकली दवाएं मरीजों के साथ-साथ दुकानदारों के कारोबार के लिए भी बड़ा खतरा हैं। एफएसडीए के उप आयुक्त शशि मोहन गुप्ता ने कहा कि नकली दवाओं के पूरे नेटवर्क को खत्म करने के लिए लगातार कार्रवाई की जा रही है। आगरा से मिले इनपुट के आधार पर लखनऊ, वाराणसी समेत कई जिलों में जांच कराई गई है। जैसे-जैसे सैंपल रिपोर्ट आ रही हैं, संबंधित बैचों को बाजार से हटाया जा रहा है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा रही है।
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फैक्ट फाइल
- प्रदेश में थोक दवा दुकानें: करीब 60 हजार
- फुटकर दवा दुकानें: करीब 1.05 लाख
- रोजाना मेडिकल स्टोर कारोबार: लगभग 100 करोड़ रुपये
- देश के दवा बाजार में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी: करीब 25 प्रतिशत
- प्रदेश की प्रमुख दवा मंडियां: लखनऊ, आगरा, वाराणसी और कानपुर