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AJL प्लॉट आवंटन केस: भूपेंद्र हुड्डा आरोपमुक्त, पंचकूला की अदालत से मिली राहत

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पंचकूला की विशेष सीबीआई अदालत से बड़ी राहत मिली है। एजेएल प्लॉट आवंटन केस में उन्हें आरोपमुक्त करार दिया गया है।

BS Hooda

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा। (Photo Credit: X/@BhupinderShooda)

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हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के बाद पंचकूला की एक विशेष अदालत से बड़ी राहत मिली है। पंचकूला के सेक्टर 6 में एक प्लॉट के दोबारा आवंटन मामले में भूपेंद्र सिंह हुड्डा, मोतीलाल वोरा और एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) को प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मामले में आरोपमुक्त कर दिया है।

 

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25 फरवरी को पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हुड्डा और एजेएल को क्लीनचिट दी थी। इसके बाद हरियाणा के विशेष न्यायाधीश राजीव गोयल ने ईडी की मनी लॉन्ड्रिंग शिकायत को भी बंद कर दिया है। अदालत की कार्यवाही के दौरान भूपेंद्र सिंह हुड्डा वहां उपस्थित थे।

 

पंचूकला के सेक्टर 6 में 1982 में नवजीवन अखबार को 3360 वर्ग मीटर का प्लॉट 91 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से आवंटित किया गया। नवजीवन अखबार का मालिकाना हक एजेएल के पास है। शर्त के मुताबिक छह माह में निर्माण शुरू करना था। दो साल के भीतर निर्माण कार्य पूरा करना था। मगर 10 वर्षों तक कंपनी ने प्लॉट पर कोई निर्माण नहीं किया। 1992 में हरियाणा सरकार ने इसे रद्द कर दिया। बाद में एजेएल ने अपील की, मगर इसे भी खारिज कर दिया गया। 

 

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क्या है एजेएल प्लॉट आवंटन केस

2005 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने 28 मार्च 2005 को पुरानी दर पर ही एजेएल को प्लांट आवंटित कर दिया। उधर, एजेएल ने पुरानी दर और ब्याज के साथ करीब 59.39 लाख रुपये की राशि जमा करवाई। 2007 की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया कि पुरानी दर में प्लॉट आवंटित करने के कारण 63 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। 2014 में हरियाणा में बीजेपी की सरकार बनी। 2016 में सीबीआई ने मामला दर्जकर प्लांट आवंटन में अनियमितता का आरोप लगाया। यह भी कहा गया कि कम कीमत पर भूखंड आवंटित करके न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया, बल्कि एजेएल को अनुचित लाभ भी दिया गया। 

हाई कोर्ट ने क्या कहा था?

अपने फैसले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने कहा था कि प्लाट आवंटन को हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (HUDA) ने 2006 में सर्वसम्मति से मंजूरी दी थी। किसी भी अदालत ने इस फैसले को खारिज नहीं किया। हाई कोर्ट ने सीबीआई के कामकाज पर भी सवाल उठाया। उसने कहा कि एजेंसी प्लॉट आवंटन को खुद ही गैर-कानूनी कैसे मान सकती है और आपराधिक मामला दर्ज कर सकती है। यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है। 

 


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