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मेरठ नहीं, अंबाला से शुरू हुई थी 1857 की क्रांति? इतिहासकारों के दावों से समझिए

हरियाा के अंबाला में 5 नवंबर को गृह मंत्री अमित शाह शहीदी स्मारक का उद्घाटन करेंगे। यह स्मारक 1857 की क्रांति के नाम पर बनाया गया है।

Martyrs Memorial in Ambala

शहीदी स्मारक का दृश्य। (Photo Credit - Social Media)

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भारत की आजादी की पहली लड़ाई यानी 1857 की क्रांति का नाम आते ही ज्यादातर लोगों के दिमाग में सबसे पहले मेरठ का नाम आता है। इतिहास की किताबों में भी 10 मई 1857 को मेरठ से शुरू हुई सैनिक बगावत को इस क्रांति की शुरुआत बताया जाता है। लेकिन अब हरियाणा के अंबाला को लेकर एक ऐतिहासिक दावा चर्चा में है। हरियाणा सरकार और कई इतिहासकारों का कहना है कि अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की पहली चिंगारी मेरठ से करीब नौ घंटे पहले अंबाला छावनी में भड़क चुकी थी। 1857 में देश की पहली आजादी की लड़ाई को समर्पित शहीद स्मारक अंबाला में बनाया गया है जिसका उद्घाटन 5 नवंबर को केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह करेंगे। 

 

1857 की क्रांति का नाम मेरठ से जुड़ा है लेकिन पिछले लंबे समय से हरियाणा की ओर से भी दावा किया जा रहा था कि मेरठ से पहले अंबाला में क्रांति की शुरुआत हो गई थी। इस दावे को सामने लाने में इतिहासकार प्रोफेसर केसी यादव की अहम भूमिका रही। उनकी रिसर्च और ब्रिटिशकालीन दस्तावेजों के आधार पर अंबाला के योगदान को पहचान दिलाने की कोशिश कई दशकों से चल रही है। इसी इतिहास को सम्मान देने के लिए अब अंबाला छावनी में करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से शहीद स्मारक बनाया गया है।

 

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अंबाला को लेकर क्या है दावा?

इस कहानी के केंद्र में हरियाणा के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर केसी यादव हैं। उन्होंने 1970 के दशक में ब्रिटिश सरकार के पुराने टेलीग्राम और दस्तावेजों का अध्ययन किया था। उनकी रिसर्च के मुताबिक, 10 मई 1857 की सुबह अंबाला छावनी में तैनात भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की तैयारी शुरू कर दी थी। उस समय अंबाला में 5वीं और 60वीं नेटिव इन्फैंट्री रेजिमेंट तैनात थीं। 

 

केसी यादव की रिसर्च के अनुसार, सैनिकों की योजना अंग्रेजों के खिलाफ कार्रवाई करने की थी। हालांकि, अंग्रेजी अधिकारियों को इसकी भनक लग गई और विद्रोह को दबाने के लिए कार्रवाई की गई। इस तरह अंबाला में उठी बगावत की कोशिश को बड़े स्तर पर फैलने से पहले ही कुचल दिया गया। उनकी रिसर्च में ब्रिटिश अधिकारियों के टेलीग्राम को महत्वपूर्ण प्रमाण बताया गया है।

 

क्या अंबाला में हुई थी पहली बगावत?

प्रोफेसर केसी यादव की रिसर्च के मुताबिक, अंबाला छावनी में 10 मई 1857 को सुबह करीब 9 बजे विद्रोह की शुरुआत हो चुकी थी। इसके लगभग नौ घंटे बाद मेरठ में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेज अधिकारियों के खिलाफ खुली बगावत कर दी। मेरठ में विद्रोह बड़े स्तर पर भड़का और वहां से सैनिक दिल्ली की ओर बढ़े। 11 मई को बागी सैनिक दिल्ली पहुंचे और बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। यही वजह है कि मेरठ की घटना इतिहास में ज्यादा प्रमुखता से दर्ज हुई। अंबाला में विद्रोह की शुरुआती कोशिश दबा दी गई, इसलिए उसे वैसी प्रसिद्धि नहीं मिली। हालांकि, हरियाणा सरकार का कहना है कि क्रांति की शुरुआती चिंगारी अंबाला में ही उठी थी।

क्यों हुई थी बगावत? 

1857 की क्रांति के पीछे कई कारण थे लेकिन कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी ने इस विरोध को भड़का दिया था। भारतीय सैनिक लंबे समय से अंग्रेजों के भेदभाव, कम वेतन, खराब व्यवहार और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप से नाराज थे। इसी बीच एनफील्ड राइफल के नए कारतूसों को लेकर विवाद खड़ा हो गया। सैनिकों के बीच यह खबर फैली कि कारतूसों पर गाय और सूअर की चर्बी लगी है और उन्हें इस्तेमाल करने से पहले मुंह से काटना पड़ेगा। इससे हिंदू और मुस्लिम दोनों सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुईं। अंबाला उन सैन्य छावनियों में शामिल था, जहां नए कारतूस पहुंचाए गए थे। इतिहासकारों के अनुसार, इन परिस्थितियों ने सैनिकों के भीतर विद्रोह की भावना को मजबूत किया।

 

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कई साल के बाद कैसे मिली पहचान? 

अंबाला की भूमिका को सामने लाने के लिए हरियाणा में लंबे समय से प्रयास किए जा रहे थे। साल 2010 में तत्कालीन हरियाणा सरकार ने यहां शहीद स्मारक बनाने की घोषणा करते हुए 17 करोड़ रुपये मंजूर किए थे, लेकिन परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। साल 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की सरकार ने इस योजना को फिर से शुरू किया और इसे बड़े स्तर पर विकसित करने का फैसला लिया। इस परियोजना को आगे बढ़ाने में हरियाणा के तत्कालीन गृह मंत्री और अंबाला कैंट के विधायक अनिल विज की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 

 

करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से तैयार यह स्मारक 22 एकड़ में फैला है। इसमें 22 थीम आधारित गैलरी, तीन मंजिलें और लगभग 63 मीटर ऊंचा कमल के आकार का टावर बनाया गया है। यहां आधुनिक तकनीक के जरिए 1857 की क्रांति की घटनाओं को दिखाया जाएगा। इसमें होलोग्राम, ऑगमेंटेड रियलिटी, मूर्तियां, मॉडल और करीब 130 शॉर्ट फिल्में शामिल हैं।


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