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राहुल और सोनिया गांधी की AJL कंपनी को राहत, हुड्डा को भी मिली क्लीन चिट

पंचूकला प्लॉट आवंटन मामले में राहुल गांधी और सोनिया गांधी की स्वामित्व वाली एजेएल कंपनी और हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हाई कोर्ट से क्लीन चिट मिल गई है। हाई कोर्ट ने सीबीआई कोर्ट द्वारा आरोप तय करने के आदेश को रद्द कर दिया है।

Bhupinder Singh Hooda

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा। (Photo Credit: X/@BhupinderShooda)

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पंचूकला में प्लांट आवंटन मामले में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को क्लीन चिट दे दी है। सीबीआई ने प्लांट आवंटन में अनियमितता और पूर्व सीएम हुड्डा पर आपराधिक आरोप लगाया था।

 

न्यायमूर्ति त्रिभुवन दहिया ने कहा कि2005 में आवंटित भूखंड को हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण (एचयूडीए) ने 2006 में सर्वसम्मति से अनुमोदित किया था। अभी तक किसी भी अदालत ने इस फैसले को अवैध घोषित नहीं किया है। इस दौरान हाई कोर्ट ने सीबीआई के कामकाज पर भी सवाल उठाया और पूछा कि एजेंसी प्लॉट आवंटन को खुद ही गैर-कानूनी कैसे मान सकती है और आपराधिक मामला दर्ज कर सकती है। यह पूरी तरह से गैर-कानूनी है। हाई कोर्ट ने कहा कि जब तक प्लाट का दोबारा आवंटन कानूनी तौर पर अवैध घोषित नहीं किया जाता तब तक केवल जांच एजेंसी के आकलन के आधार पर उसे अपराध नहीं माना जा सकता।

 

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अदालत ने आगे कहा, 'पुनः आवंटन मूल्य और विस्तार शुल्क का भुगतान करने के बाद ही एजेएल ने निर्माण कार्य शुरू किया। प्राधिकरण ने 14 अगस्त 2014 को उसे अधिभोग प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया। प्राधिकरण को किसी भी प्रकार की हानि की कोई शिकायत नहीं की गई। न ही एजेएल या किसी अन्य आरोपी को किसी भी कथित नुकसान की भरपाई करने को कहा गया। यहां तक ​​कि सरकारी लेखा परीक्षकों ने भी दोबारा आंवटन के कारण प्राधिकरण को होने वाले वित्तीय नुकसान के संबंध में अपनी आपत्ति वापस ले लिया।'

क्या है पूरा मामला?

पहला आवंटन: यह पूरा मामला एजेएल बनाम सीबीआई का है। मामला पंचकूला के सेक्टर सेक्टर-6 में एक प्लाट आवंटन, रद्द करने और 2005 में दोबारा आवंटित करने से जुड़ा है। सबसे पहले 1982 में एजेएल को 91 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से 'नो प्रॉफिट नो लॉस' के आधार पर आवंटित किया गया था। यहां से नवजीवन अखबार प्रकाशित होना था। आवंटन की शर्त के मुताबिक- 

 

  • छह माह में निर्माण शुरू करना था।
  • दो साल में निर्माण कार्य पूरा करना था।
  • मगर समय पर एजेएल निर्माण नहीं कर पाया।
  • 1992 में प्लॉट आवंटन कर दिया गया। 
  • एजेएल ने अपील की, वह भी खारिज कर दी गई।

 

दोबारा आवंटन: 2005 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा हरियाणा के मुख्यमंत्री बने। एजेएल ने प्लॉट की दोबारा बहाली की मांग की। इस पर कानूनी सलाहकारों ने कहा कि प्लॉट दोबारा उसी पार्टी को नहीं दिया जा सकता। अगर देना ही है तो नई दरों पर विज्ञापन निकालने के बाद दिया जा सकता है। बाद में 28 अगस्त 2005 को मुख्यमंत्री के आदेश पर एजेएल को दोबारा प्लॉट आवंटित कर दिया गया। एजेएल ने पुरानी दर और ब्याज के साथ लगभग 59.39 लाख रुपये की धनराशि जमा करवाई। 2006 में हुडा ने भी फैसले को अनुमोदित कर दिया।  

 

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ऑडिट रिपोर्ट: 2007 में ऑडिट रिपोर्ट में आवंटन पर आपत्ति जताई गई। इसमें कहा गया कि 2005 की दर के आधार पर प्लॉट की कीमत 1.22 करोड़ रुपये बनती है, जबिक एजेएल ने सिर्फ 59.39 लाख रुपये जमा करवाए हैं। इस हिसाब से करीब 63 लाख रुपये का नुकसान हुआ है। बाद में यह ऑडिट रिपोर्ट को हटा लिया गया। 

 

सीबीआई का आरोप: सीबीआई ने अपनी जांच के आधार पर प्लॉट आवंटन मामले में आईपीसी की धारा 420- (धोखाधड़ी), धारा 120B IPC (आपराधिक साजिश) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(d) के तहत पद का दुरुपयोग कर लाभ देने का आरोप लगाया। इसमें कहा गया कि तत्कालीन सीएम ने कानूनी सलाह को दरकिनार किया। पुराने रद्द निर्णय की अनदेखी की। कम कीमत पर प्लॉट आवंटित करके आर्थिक नुकसान पहुंचाया। यह सब एजेएल को अनुचित लाभ देने की खातिर किया गया।

 

हुड्डा और एजेएल का पक्ष: भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने बताया कि यह फैसला निर्णय अधिकार के तहत और सार्वजनिक हित में लिया गया। इससे कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं लिया। उनके पास पुनः आवंटन का अधिकार था। ऑडिट आपत्ति भी हट चुकी थी। वहीं 2018 के संशोधन के बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की पुरानी धारा लागू नहीं हो सकती है। वहीं एजेएल ने कहा कि हमने नियमों के तहत काम किया है। ब्याज समेत पैसा जमा किया और निर्माण भी किया। किसी भी तरह का अवैध लाभ नहीं लिया गया। 

 

 


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