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'कानून का हो रहा गलत इस्तेमाल', लिव-इन रिलेशनशिप पर होई कोर्ट ने क्या बोला?

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामले में आरोपी की सजा रद्द करते हुए कानून के दुरुपयोग पर अहम टिप्पणी की है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर । Photo Credit: AI Generated

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उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट के सामने एक ऐसा मामला सामने आया जिस पर कोर्ट ने चिंता जताई। मामला लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़ा हुआ था। सुनवाई के दौरान समाज की बदलती स्थिति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि आज के दौर में युवा पश्चिमी विचारधारा को अपना रहे हैं, जिसके चलते लिव-इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ा है। ऐसे रिश्तों में युवक-युवतियां बिना शादी के साथ रहते हैं और शारीरिक संबंध बनाते हैं, लेकिन जब संबंध टूट जाते हैं, तो कई मामलों में एफआईआर दर्ज करा दी जाती है। चूंकि कानून अधिकतर महिलाओं के पक्ष में हैं, ऐसे में पुरुषों को दोषी मान लिया जाता है और उन्हें सजा का सामना करना पड़ता है।


न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा की पीठ ने यह टिप्पणी चंद्रेश नाम के आरोपी के मामले की सुनवाई के दौरान की। हाई कोर्ट ने चंद्रेश के मामले की सुनवाई के दौरान उनकी उम्र कैद की सजा को रद्द कर दिया। साथ ही कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े मामलों और पुरुषों के खिलाफ सख्त कानूनों को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। न्यायालय ने कहा कि बदलते सामाजिक हालात में कुछ कानूनों का गलत इस्तेमाल हो रहा है, जिससे कई बार पुरुषों को अनावश्यक रूप से दोषी ठहरा दिया जाता है।

 

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क्या है चंद्रेश का मामला?

दरअसल, एक व्यक्ति ने आरोप लगाया था कि चंद्रेश उसकी नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर बेंगलुरु ले गया और शादी का झांसा देकर उससे शारीरिक संबंध बनाए। इन आरोपों के आधार पर निचली अदालत ने चंद्रेश को दोषी ठहराते हुए आईपीसी की विभिन्न धाराओं, जिनमें पॉक्सो एक्ट भी शामिल था, के तहत उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इसके बाद चंद्रेश ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

 

हाई कोर्ट में केस की दोबारा सुनवाई हुई, जहां सबूतों के आधार पर यह सामने आया कि लड़की की उम्र 20 साल थी, जबकि उसके पिता ने एफआईआर में उसकी उम्र 18 साल 6 महीने बताई थी, जो गलत साबित हुई। उम्र से जुड़ी इस जानकारी ने पूरे केस की दिशा ही बदल दी।

 

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इसके अलावा, लड़की ने अपने बयान में स्वीकार किया कि वह अपनी मर्जी से घर छोड़कर चंद्रेश के साथ बेंगलुरु गई थी। जांच में यह भी सामने आया कि वह करीब छह महीने तक चंद्रेश के साथ रही। बाद में जब चंद्रेश ने उससे अपना रास्ता अलग कर लिया, तो वह अपने माता-पिता के घर वापस लौट आई। इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि चंद्रेश के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित नहीं होते। परिणामस्वरूप, कोर्ट ने उम्र कैद सहित उस पर लगी सभी धाराओं को रद्द कर दिया और उसे निर्दोष करार दिया।

कानून का गलत इस्तेमाल

कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत में ये कानून उस समय बनाए गए थे, जब लिव-इन रिलेशनशिप की अवधारणा समाज में आई ही नहीं थी। आज के बदलते सामाजिक दौर में इन कानूनों का कभी-कभी गलत इस्तेमाल हो रहा है, जिससे पुरुषों को अनुचित रूप से फंसाया जा रहा है।

 

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हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इन कानूनों को बनाने की मंशा पुरुष-विरोधी नहीं थी। ये कानून महिलाओं की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए थे, लेकिन बदलते समय में इनके संतुलित उपयोग की जरूरत है।


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