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4 बार के MLA नंद लाल का निधन, हिमाचल में कांग्रेस के सामने गढ़ बचाने की चुनौती

हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस विधायक नंद लाल की मौत से पार्टी की मुश्किलें बढ़ती हुई नजर आ रही है। इस सीट पर उपचुनाव पार्टी के लिए चुनौती होगा।

सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दी श्रद्धांजलि

सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दी श्रद्धांजलि, Photo Credit: CMO

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हिमाचल प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस को एक बड़ा झटका लगा है। शिमला जिले की रामपुर विधानसभा सीट से लगातार चार बार विधायक रहे नंद लाल का 72 साल की उम्र में निधन हो गया है। वह लंबे समय से बीमार चल रहे थे और 3 नवंबर 2026 को शिमला के चमियाणा अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके जाने से सिर्फ कांग्रेस ने अपना एक वरिष्ठ नेता नहीं खोया, बल्कि पार्टी के सामने रामपुर की अपनी पुरानी सीट बचाने की चुनौती भी खड़ी हो गई है।

 

नियमों के मुताबिक किसी विधायक के सीट खाली करने के बाद 6 महीने के अंदर चुनाव आयोग को उस सीट पर चुनाव करवाने होते हैं। हालांकि, अगर विधानसभा का कार्यकाल एक साल से कम हो तो उस सीट पर उपचुनाव करवाना जरूरी नहीं होता है। हिमाचल प्रदेश की मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल दिसंबर 2027 में खत्म होगा यानी रामपुर सीट पर उपचुनाव करवाना होगा। उपचुनाव में कांग्रेस को एक बार फिर साबित करना होगा कि रामपुर में उसकी पकड़ आज भी मजबूत है।अगले विधानसभा चुनाव में भी ज्यादा समय नहीं बचा है। ऐसे में रामपुर का उपचुनाव हिमाचल की राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।

 

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कांग्रेस का गढ़ है रामपुर

रामपुर को कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है। इसकी एक बड़ी वजह पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का इस इलाके से जुड़ाव रहा है। वीरभद्र सिंह का संबंध रामपुर के शाही परिवार से था और यहां उनकी राजनीतिक पकड़ काफी मजबूत थी। नंद लाल भी वीरभद्र सिंह के करीबी नेताओं में गिने जाते थे। उन्होंने साल 2007 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर रामपुर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद 2012 और 2017 में भी वह विधायक बने। 

 

साल 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने लगातार चौथी बार जीत दर्ज की। हालांकि, इस बार मुकाबला काफी करीबी रहा था। नंद लाल ने बीजेपी के उम्मीदवार कौल सिंह को महज 567 वोटों से हराया था। यानी सीट पर कांग्रेस की जीत तो हुई, लेकिन बीजेपी ने भी अपनी ताकत दिखा दी थी। यही वजह है कि अब होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है।

कौन थे नंद लाल?

नंद लाल का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा था। राजनीति में आने से पहले वह भारत-तिब्बत सीमा पुलिस यानी ITBP में अधिकारी थे। इसके अलावा उन्होंने स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (SPG) में भी सेवाएं दी थीं। वह कांग्रेस नेता सोनिया गांधी की सुरक्षा टीम का हिस्सा भी रहे थे। साल 2007 में उन्होंने सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर राजनीति में कदम रखा। वीरभद्र सिंह की सरकार में वह मुख्य संसदीय सचिव भी रहे। बाद में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की सरकार ने मार्च 2024 में उन्हें सातवें राज्य वित्त आयोग का अध्यक्ष बनाया था।

 

उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिला था। खास बात यह थी कि नंद लाल वीरभद्र सिंह के खेमे के नेता माने जाते थे, जबकि मुख्यमंत्री सुक्खू और वीरभद्र परिवार के बीच पहले से राजनीतिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में नंद लाल का जाना कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों को भी प्रभावित कर सकता है।

 

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रामपुर क्यों बना चुनौती?

दरअसल, नंद लाल की अपनी पहचान और वीरभद्र सिंह के परिवार का प्रभाव दोनों ही इस सीट पर कांग्रेस के लिए अहम रहे हैं। अब पार्टी को ऐसा उम्मीदवार तलाशना होगा, जो उनकी जगह ले सके और लोगों के बीच वैसा ही भरोसा बना सके। इस चुनाव में मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रतिभा सिंह और लोक निर्माण मंत्री विक्रमादित्य सिंह की भूमिका भी अहम होगी।

 

अब देखना होगा की राजपरिवार ही इस सीट पर उम्मीदवार तय करता है या फिर सीएम की पसंद के किसी व्यक्ति को मौका दिया जाएगा। यह चुनाव ऐसे समय में होगा जब आगामी विधानसभा चुनाव के लिए कुछ ही महीने शेष होंगे। ऐसे में चुनाव में जीत या हार का सीधा असर अगले साल होने वाले चुनावों पर पड़ सकता है। 


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