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हिमाचल के जिस पहाड़ पर परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां कैसे पहुंचा यह विदेशी?

हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पहाड़ी दर्रे पर स्थित कुगती जोत पिछले आठ महीने से खामोश है। 15 जून से पहले यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता लेकिन एक विदेशी नागरिक बर्फ को काटते हुए यहां पहुंच गया।

foreign tracker with locals

स्थानीय लोगों के साथ बेंजामिन, Photo Credit: Social Media

अभी जून का पहला हफ्ता ही चल रहा है और इस पहले हफ्ते में हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में पीर पंजाल पर्वतमाला पर स्थित एक बेहद दुर्गम और प्रसिद्ध पहाड़ी दर्रे पर स्थित कुगती जोत पर अभी भी बर्फ का की चादर बिछि हुई है। करीब आठ महीने से खामोश पड़े 16,800 फीट ऊंचे इस दर्रे पर परिंदा भी पर नहीं मारता। चंबा-लाहौल के बुजुर्ग कहते हैं कि 15 जून से पहले इस जोत की तरफ देखना ही बड़ी बात रहती है। क्योंकि मौत यहां बर्फ बनकर इंतजार करती है, लेकिन इस बार एक विदेशी नागरिक ने ऐसा कर दिखाया है। 

 

स्विट्जरलैंड से आए बेंजामिन ने वह कर दिखाया जिसके बारे में चंबा के बुजुर्ग सोच भी नहीं सकते हैं। मंगलवार की शाम लाहौल की वादियों में एक अजनबी दाखिल हुआ। पीठ पर रकसैक, चेहरे पर बर्फ की जलन, आंखों में तीन दिन का सफर। वह कुगती गांव से चला था। अकेला नहीं, एक लोकल गाइड साथ था। मंजिल थी लाहौल। रास्ता था कुगती जोत, वही जोत जो अक्टूबर से बंद पड़ी थी।

 

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तीन दिन का संघर्ष

तीन दिन, बर्फ काटते, फिसलते, रातें खुले आसमान के नीचे काटते। पहला पड़ाव, दूसरा पड़ाव… और तीसरे दिन लाहौल की जमीन। गाइड ने लाहौल पहुंचते ही विदा ले ली। बोला, 'साहब, मेरा सफर आपके साथ यहां तक था। आगे का रास्ता तुम्हें खुद तय करना है।'

 

अकेले पड़ने पर भी बेंजामिन रुका नहीं। बुधवार को वह लोट गांव पहुंचा। वारपा पंचायत के नवनिर्वाचित उप-प्रधान प्रभात नलवा के साथ लोट में एक चाय की दुकान में मुलाकात हुई। चाय की चुस्कियों के बीच उसने अपनी कहानी सुनाई। बताया कि वह कुगती से पैदल निकला था। जोत पर बहुत बर्फ है। सांस फूलती थी, पैर धंसते थे। दो रातें रास्ते में काटीं। लेकिन पहुंच गया। फिर मुस्कुराकर बोला, 'अब पैदल ही लेह जाऊंगा।'

15 जून के बाद खुलता है रास्ता

प्रभात नलवा सुनते रहे। उन्हें यकीन नहीं हो रहा था। क्योंकि वह जानता है कि कुगती जोत इस समय लांघना आसान नहीं है। ये रास्ता भेड़पालकों का है। 15 जून के बाद जब चंबा के गद्दी अपने भेड़-बकरियों के साथ चारागाहों के लिए निकलते हैं, तब जाकर इस दर्रे पर पहली पदचाप पड़ती है। उससे पहले? सन्नाटा और बर्फ। सिर्फ बर्फ।

 

कुगती जोत सिर्फ एक दर्रा नहीं है। ये लाहौल और चंबा को जोड़ने वाली सदियों पुरानी रग है। गर्मियों में इसी रास्ते से लाहौल, मनाली, कुल्लू, मंडी के सैकड़ों श्रद्धालु मणिमहेश झील के लिए गुजरते हैं। भोले के जयकारे लगाते, नंगे पांव बर्फ रौंदते। फिर अक्टूबर आते ही बर्फबारी शुरू होती है। और जोत सो जाता है, अगले सात-आठ महीने के लिए। लेकिन इस बार जोत जून के पहले हफ्ते में जाग गया। एक स्विस ट्रैकर के हौसले से।

 

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क्या बोले प्रभात?

प्रभात नलवा कहते हैं, 'बेंजामिन सीजन का पहला ट्रैकर है। उसने साबित कर दिया कि हौसला हो तो बर्फ भी रास्ता दे देती है।'बेंजामिन अब लेह की तरफ कूच कर चुका है। पैदल। पीछे छूट गया है कुगती जोत, एक बार फिर खामोश, एक बार फिर बर्फ से ढका। अगले मेहमान का इंतजार करते हुए। शायद 15 जून के बाद आने वाले भेड़पालकों का। कहते हैं पहाड़ उसी को रास्ता देते हैं जिसमें सीना छलनी करने का जज़्बा होता है। बेंजामिन ने इसका सबूत दे दिया।


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