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बिहार तक कैसे पहुंचा सबसे बड़ा शिवलिंग? 40 दिन का सफर और 210 टन वजन

तमिलनाडु से करीब 210 टन वजनी शिवलिंग बिहार पहुंच चुका है। हालांकि अभी यात्रा समाप्त नहीं हुई है। उसे पूर्वी चंपारण ले जाना है। उम्मीद है कि 17 जनवरी तक शिवलिंग पूर्वी चंपारण के केसरिया पहुंच जाएगा।

Shivling Image

एआई से तैयार की गई तस्वीर।

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संजय सिंह, पटना। तमिलनाडु के महाबलीपुरम से चला दुनिया का सबसे बड़ा शिवलिंग 40 दिनों बाद गोपालगंज पहुंच गया। शिवलिंग को एक विशेष ट्रक से यहां तक लाया गया है। इस ट्रक में 96 पहिये हैं और इसकी रफ्तार 5 किमी प्रति घंटे की है। उम्मीद है कि यह शिवलिंग 17 जनवरी तक पूर्वी चंपारण पहुंच जाएगा। यहां केसरिया में करीब 120 एकड़ जमीन पर विराट रामायण मंदिर का निर्माण किया जा रहा है। इसी मंदिर में विशाल शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की जाएगी।

 

जानकारी के मुताबिक शिवलिंग का निर्माण करीब 10 साल से किया जा रहा है। इसे काले रंग के एक ही ग्रेनाइड पत्थर से तैयार किया गया है। 33 फुट उंचाई और 33 फुट गोलाई वाले इस शिवलिंग का वजन 210 टन है। ट्रक चालक ने बताया कि वह 23 नवंबर को तमिलनाडु के महाबलीपुरम से चला था। 40 दिन की यात्रा के बाद वह गोपालगंज पहुंचा है। ट्रक के बिहार में दाखिल होते ही लोगों का तांता लगना शुरू हो गया। लोगों ने पुष्पवर्षा की और जयकारे लगाए।

 

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कितना खास होगा विराट रामायण मंदिर?

विराट रामायण मंदिर की आधारशिला साल 2012 में रखी गई थी। बिहार के पूर्व आईपीएएस और महावीर मंदिर न्यास समिति (पटना) के तत्कालीन सचिव किशोर कुणाल इसके प्रेरणास्रोत थे।  धन के अभाव में कई वर्षों तक निर्माण कार्य अटका रहा। हालांकि 20 जून 2023 से मंदिर का निर्माण कार्य जारी है। 2027 तक निर्माण पूरा होने की उम्मीद है।


एक अनुमान के मुताबिक मंदिर निर्माण में करीब 500 करोड़ रुपये खर्च होंगे। विराट रामायण मंदिर बेहद अद्भुत होगा। मंदिर परिसर 1080 फुट लंबा और 540 फुट चौड़ा होगा। कुल 22 मंदिर और 12 शिखरों का निर्माण होगा। मंदिर के पांच शिखरों की ऊंचाई 108 फुट होगी। वहीं चार शिखर 180 और एक 135 फुट ऊंचा होगा।

 

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कितना अहम है केसरिया?

पूर्वी चंपारण जिले के केसरिया का न केवल धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक महत्व है। यह स्थान भगवान बुद्ध से भी जुड़ा है। मान्यता है कि वैशाली से कुशीनगर जाते वक्त भगवान बुद्ध यहां एक रात रुके थे। यहां पर सम्राट अशोक ने एक विशाल स्तूप का निर्माण करवाया था। यह स्तूप दुनिया का सबसे ऊंचा बौद्ध स्तूप है। इसकी ऊंचाई 32 मीटर है। इसके अलावा यह स्थान महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह का भी गवाह रहा है। 

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