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10 से 1km में सिमट जाएगा काजीरंगा का इको सेंसिटिव जोन, बाढ़ में मरेंगे जानवर? 

असम सरकार काजीरंगा नेशनल पार्क के आसपास के इको सेंसेटिव जोन (ESZ) को 10 से घटाकर 1 किलोमीटर करने की तैयारी में है। इससे बाढ़ के दौरान जानवरों के भागने या लौटने का रास्ता बंद हो सकता है।

Kaziranga National Park, Assam

सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit-Chat GPT

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असम में काजीरंगा नेशनल पार्क के आसपास के इको सेंसेटिव जोन (ESZ) को लेकर असम सरकार एक बड़ी योजना बना रही है। सरकार चाहती है कि काजीरंगा के आसपास जो 10 किलोमीटर का सेफ्टी जोन (ESZ) है, उसे घटाकर 1 किलोमीटर के दायरे में लाया जाए। इसके लिए सरकार केंद्र सरकार से बात करने वाली है। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का कहना है कि काजीरंगा नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व के आसपास अगर 1 किलोमीटर से ज्यादा का जोन रखा गया, तो इसकी वजह से बोकाखाट, कलियाबोर जैसे आसपास के शहरों में जो भी नया निर्माण या विकास होना है वह नहीं हो सकेगा। 

 

अब इसको लेकर विवाद बढ़ गया है। एक तरफ पार्क से सटे गांवों के लोग इस कटौती के समर्थन में कर रहे हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष की पार्टी और पर्यावरण संगठन इसे वन्यजीवों की जान से जुड़ा गंभीर खतरा बता रहे हैं। बता दें कि काजीरंगा असम में ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बसा एक नेशनल पार्क और टाइगर रिजर्व है। यह दुनिया में बचे हुए ग्रेट वन-हॉर्न्ड राइनो यानी एक सींग वाले गैंडे की करीब दो-तिहाई आबादी का घर है। इसके अलावा, यह एशियाई हाथियों के लिए भी एक संरक्षित जगह और यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट भी है। 

 

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पहले समझिए ESZ होता क्या है? 

ESZ यानी इको सेंसिटिव जोन किसी भी नेशनल पार्क या जंगल के चारों तरफ का वह सुरक्षा घेरा या बफर एरिया होता है, जहां बड़े निर्माण कार्य, फैक्ट्री, माइनिंग जैसी चीजों पर रोक या नियंत्रण रहता है। इसका मकसद होता है कि जंगल और शहर के बीच थोड़ी दूरी बनी रहे, ताकि इंसानी बस्ती और जानवर आमने-सामने न आएं, संघर्ष कम हो और जंगल पर सीधा दबाव न पड़े

 

अभी तक काजीरंगा जैसे इलाकों में डिफॉल्ट रूप से यह घेरा 10 किलोमीटर तक का रखा गया है। इसे अब घटाकर 1 किलोमीटर करने की बात हो रही है, यही पूरे विवाद की जड़ है। बता दें कि जून 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि देश के सभी संरक्षित जंगलों, राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास कम से कम 1 किलोमीटर का इलाका पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) होना चाहिए।

 

26 अप्रैल 2023 को कोर्ट ने अपने जून 2022 के आदेश में संशोधन किया। कोर्ट ने साफ कहा कि ESZ का दायरा देश भर में एक समान नहीं हो सकता, बल्कि यह क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति और संरक्षित क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग होना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जिन इलाकों में पहले ही ESZ की अधिसूचना का मसौदा या अंतिम अधिसूचना जारी हो चुकी है, वहां वही नियम लागू रहेंगे। हालांकि इन इलाकों में सड़क, स्कूल जैसी जरूरी सुविधाओं के निर्माण की अनुमति दी जा सकती है लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि व्यावसायिक खनन पर रोक जारी रहेगी। 

इको सिस्टम पर क्या असर पड़ेगा? 

इस जोन के घटने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि बाढ़ के दौरान जानवरों के भागने या लौटने का रास्ता बंद हो सकता है। सीधे तौर पर कहें तो कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों तक जाने वाला कॉरिडोर संकरा या बाधित हो सकता है, क्योंकि यही एकलौती ऊंची जगह है जहां गैंडे, हाथी और हिरण बाढ़ में शरण लेते हैं। यहां से चिंता शुरू होती है। आंकड़ों पर नजर डालें तो 2017 की भीषण बाढ़ में यहां 291 जानवर मारे गए थे, जिनमें 24 गैंडे शामिल थे। 2019 में यह आंकड़ा 215 रहा, और 2024 की बाढ़ में 174 जानवरों की मौत हुई, जिनमें 

10 गैंडे शामिल थे। 2022 की गणना के अनुसार काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में 2,613 गैंडे हैं।

इनमें से ज्यादातर मौतें या तो डूबने से होती हैं या फिर हाईवे पार करते वक्त गाड़ियों की चपेट में आने से हुई। ऐसे में अगर ESZ घटा और कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों के आसपास और निर्माण, सड़कें व खनन बढ़ा इन जानवरों के लिए मुश्किल और बढ़ सकती है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जानवरों की यह इकलौती शरणस्थली और सिकुड़ सकती है, यानी हर साल आने वाली बाढ़ में मौतों का यह आंकड़ा आगे और बढ़ सकता है।

ESZ कम होने से काजीरंगा पर क्या होगा असर?

इस मामले में पर्यावरण कार्यकर्ता जादब पायेंग ने सरकार से कहा है कि काजीरंगा के आसपास 10 किलोमीटर तक का ईएसजेड बनाए रखा जाए। उनका कहना है कि इस इलाके में पहले से ही इंसानों और जंगली जानवरों के बीच टकराव होता रहता है। अगर ESZ कम किया गया तो यह समस्या और बढ़ सकती है। इससे दुनिया के प्रमुख संरक्षित राष्ट्रीय उद्यानों में शामिल काजीरंगा की पहचान पर भी असर पड़ सकता है।

 

इसके अलावा, अन्य पर्यावरण संगठनों ने भी ESZ कम करने के प्रस्ताव पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि 1,302 वर्ग किलोमीटर में फैले काजीरंगा टाइगर रिजर्व के आसपास का सुरक्षा क्षेत्र छोटा होने से बाढ़ के समय जानवरों के आने-जाने के रास्ते प्रभावित हो सकते हैं। काजीरंगा में हर साल बाढ़ आती है। बाढ़ के दौरान जब पार्क का बड़ा हिस्सा पानी में डूब जाता है, तो गैंडे, हाथी और दूसरे जानवर राष्ट्रीय राजमार्ग-715 पार कर कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों की तरफ जाते हैं। ये पहाड़ियां उनके लिए सुरक्षित और ऊंची जगह का काम करती हैं।

 

इन इलाकों में पत्थर और रेत का खनन बढ़ने से वन्यजीवों के रास्तों पर खतरा बढ़ रहा है। कार्बी आंगलोंग के एक कार्यकर्ता ने देइहोरी नदी में बड़े पैमाने पर रेत खनन और भारी मशीनों के इस्तेमाल का मुद्दा भी उठाया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि इससे जंगल, जानवरों के रास्ते और पानी के प्राकृतिक बहाव पर असर पड़ सकता है।

 

दूसरी ओर कुछ राजनीतिक नेताओं, उनके परिवारों और कारोबारी समूहों पर ईएसजेड के अंदर होटल और रिसॉर्ट बनाने की योजना के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। स्थानीय किसान ऐसी ही एक बड़े होटल परियोजना का विरोध कर रहे हैं। इस विरोध के दौरान भूमि अधिकार कार्यकर्ता प्रणब डोले को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में लिए जाने की बात भी सामने आई है।


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