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केरल की सरकारी कंपनियों की हालत खस्ताहाल, निजी हाथों में देगी कांग्रेस सरकार?

केरल में घाटे वाली सरकारी कंपनियां राज्य के खजाने पर बोझ बन रही हैं। सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए श्वेत पत्र में घाटे में चल रही PSEs के विनिवेश, निजीकरण या बंद करने की सिफारिश की गई है।

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केरल के मुख्यमंत्री वी डी सतीशान, Photo Credit: vdsatheesan/X

केरल की सरकारी कंपनियों की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है। राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए एक श्वेत पत्र में यह खुलासा हुआ है कि राज्य की सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयां (PSEs) लगातार भारी घाटे में चल रही हैं और अब राज्य के खजाने पर बड़ा बोझ बन चुकी हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार को इन कंपनियों के भविष्य को लेकर गंभीर निर्णय लेने की जरूरत है।

 

रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2021-22 में सरकारी कंपनियों का कुल घाटा 42,930 करोड़ रुपये था, जो बढ़कर 2024-25 में 72,851 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री वी डी सतीशान ने विधानसभा में पेश की। इसके लिए पूर्व कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय समिति बनाई गई थी, जिसने राज्य की वित्तीय स्थिति का विस्तृत अध्ययन किया।

 

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बड़े सुधारों की सिफारिश

श्वेत पत्र में सुझाव दिया गया है कि राज्य सरकार को घाटे में चल रही और गैर-जरूरी कंपनियों के पुनर्गठन पर विचार करना चाहिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कुछ मामलों में निजीकरण या बंद करने जैसे विकल्पों पर भी ध्यान दिया जा सकता है। हालांकि, इसमें यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी भी सुधार प्रक्रिया में कर्मचारियों के हितों की पूरी सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए।

बिजली, परिवहन और जल आपूर्ति क्षेत्र सबसे कमजोर

रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य की तीन प्रमुख कंपनियां केरल राज्य बिजली बोर्ड (KSEB), केरल राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) और केरल जल प्राधिकरण (KWA) सबसे अधिक घाटे में हैं। ये तीनों संस्थान राज्य के कुल घाटे का बड़ा हिस्सा वहन कर रहे हैं। विशेष रूप से KSRTC की स्थिति चिंताजनक बताई गई है, जिसने 2024-25 में 1,580 करोड़ रुपये का नुकसान दर्ज किया है और उसका शुद्ध मूल्य लगभग 19,821 करोड़ रुपये नकारात्मक हो गया है।

 

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बिजली बोर्ड पर सबसे बड़ा वित्तीय दबाव

केरल राज्य बिजली बोर्ड लिमिटेड (KSEBL) का नकारात्मक शुद्ध मूल्य 35,149 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो किसी भी राज्य इकाई में सबसे अधिक है। रिपोर्ट के अनुसार, बाहरी स्रोतों से महंगी बिजली खरीदना इसकी आर्थिक कमजोरी का मुख्य कारण है। साथ ही, इन कंपनियों पर सरकार का भारी निर्भरता बनी हुई है क्योंकि ये कम लाभांश देती हैं और लगातार बजट सहायता, अनुदान और सब्सिडी पर टिकी रहती हैं।

 

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि KSRTC, KWA और KSEBL मिलकर राज्य सरकार के कुल बकाया कर्ज का लगभग 69 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं। अब इस रिपोर्ट के बाद राज्य में यह बहस तेज हो गई है कि क्या इन कंपनियों में बड़े सुधार किए जाएंगे या इन्हें निजी हाथों में सौंपने की दिशा में कदम बढ़ाया जाएगा।


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