जलवायु परिवर्तन और बदलते मानसून ने भारतीय खेती के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कहीं कुछ घंटों में मूसलाधार बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है। ऐसे हालात में कृषि वैज्ञानिक किसानों को खेती के तौर-तरीकों में बदलाव लाने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि भविष्य की खेती केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर नहीं रह सकती। अब कम पानी में तैयार होने वाली, सूखा सहन करने वाली और कम अवधि में अधिक उत्पादन देने वाली फसलें ही किसानों की सबसे बड़ी ताकत बनेंगी।
हैदराबाद स्थित इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (आईसीआरआईसैट) के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि बदलते मौसम का सबसे अधिक असर खेती पर पड़ रहा है। वर्षा का असमान वितरण किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। इससे बुवाई, सिंचाई, उत्पादन और लागत सभी प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए किसानों को अब उन्नत किस्मों, जल संरक्षण तकनीकों और जलवायु अनुकूल खेती की ओर तेजी से बढ़ना होगा।
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बुंदेलखंड तक पहुंचेगी नई अरहर की किस्म
डॉ हिमांशु पाठक ने बताया कि आईसीआरआईसैट ने भारत की पहली गर्मी और सूखा सहन करने वाली अरहर की किस्म आईसीपीवी-25444 (ICPV-25444) विकसित की है। यह किस्म करीब 125 दिनों में तैयार हो जाती है और 45 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सहन करने की क्षमता रखती है।
कर्नाटक, ओडिशा और तेलंगाना में हुए परीक्षणों में इसने दो टन प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन दिया है। स्पीड ब्रीडिंग तकनीक से विकसित यह किस्म बुंदेलखंड जैसे सूखा प्रभावित क्षेत्रों के किसानों के लिए बड़ी उम्मीद मानी जा रही है।
कम पानी में तैयार होंगी धान की नई किस्में
डॉ. हिमांशु ने बताया कि कम पानी में बेहतर उत्पादन देने वाली धान की कई उन्नत किस्में भी विकसित की गई हैं। इनमें सहभागी धान, स्वर्ण श्रेष्ठ, डीआरआर धान-44, सीजीआर धान-807 और पूसा बासमती-1509 प्रमुख हैं। ये किस्में सूखे को सहन करने, कम अवधि में पकने और सीधी बुवाई के लिए उपयुक्त हैं। इनसे पारंपरिक धान की तुलना में 33 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत की जा सकती है। साथ ही किसानों की सिंचाई लागत कम होती है और मौसम की अनिश्चितता का असर भी घटता है।
बाजरा, रागी और ज्वार बढ़ाएंगे खेती की मजबूती
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में किसानों को धान और गेहूं के साथ-साथ बाजरा, ज्वार, रागी, मूंगफली और अरहर जैसी कम पानी वाली फसलों का रकबा बढ़ाना चाहिए। ये फसलें कम लागत में बेहतर उत्पादन देने के साथ पोषण से भी भरपूर हैं। सरकार भी मोटे अनाज यानी श्रीअन्न को बढ़ावा दे रही है, जिससे किसानों को बेहतर बाजार और आय के नए अवसर मिल सकते हैं।
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जल संरक्षण और नई तकनीक होगी भविष्य की खेती की पहचान
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में खेती की सफलता जल संरक्षण, सूखा सहन करने वाली उन्नत किस्मों, आधुनिक तकनीक और फसल विविधीकरण पर निर्भर करेगी। यदि किसान समय रहते बदलते मौसम के अनुसार अपनी खेती में बदलाव अपनाते हैं तो वे उत्पादन बढ़ाने के साथ प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को भी काफी हद तक कम कर सकेंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते जलवायु परिदृश्य में खेती को टिकाऊ बनाने के लिए फसल विविधीकरण, कम पानी वाली किस्मों का चयन, आधुनिक तकनीकों का उपयोग और जल प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा। यही रणनीति किसानों की आय बढ़ाने के साथ देश की खाद्य सुरक्षा को भी मजबूत करेगी और भविष्य की खेती को अधिक सुरक्षित बनाएगी।