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साल में दो बार कैसे होगी प्याज खेती? BBAU की नई खोज ने मचाई सनसनी

लखनऊ के बीबीएयू के वैज्ञानिकों ने आठ वर्षो के शोध के बाद ऐसी तकनीक विकसित की है, जिसमें रबी के अलावा खरीफ या लेट खरीफ मौसम में भी प्याज की भरपूर खेती करके मुनाफा कमाया जा सकता है।

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प्याज के खेत में शोधार्थियों के साथ बीबीएयू के प्रोफेसर डाॅ. सुतनु माजी, Photo Credit Social Media

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देश में हर साल अक्टूबर से मार्च के बीच प्याज की कमी और आसमान छूती कीमतें आम लोगों की परेशानी बढ़ा देती हैं। अब इस समस्या का स्थायी समाधान निकलता दिखाई दे रहा है। लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के वैज्ञानिकों ने करीब आठ वर्षों के लगातार शोध के बाद ऐसी तकनीक विकसित की है, जिससे अब किसान सिर्फ रबी ही नहीं बल्कि खरीफ और लेट खरीफ सीजन में भी सफलतापूर्वक प्याज की खेती कर सकेंगे। इससे सालभर प्याज का उत्पादन बढ़ेगा, किसानों की आय में कई गुना इजाफा होगा और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव पर भी काफी हद तक नियंत्रण लग सकेगा।

 

यह तकनीक बीबीएयू के बागवानी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सुतनु माझी के निर्देशन में विकसित की गई है। इस शोध में डॉ. माता प्रसाद, डॉ. माया राम और डॉ. रमेश चंद्र मीणा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध किसानों के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है, क्योंकि इससे वर्षभर प्याज उत्पादन का रास्ता खुल जाएगा।

चार से पांच गुना तक बढ़ सकती है किसानों की कमाई

डॉ. सुतनु माझी के अनुसार, नई तकनीक अपनाने वाले किसानों को पारंपरिक खेती की तुलना में चार से पांच गुना तक अधिक लाभ मिल सकता है। इसके लिए किसानों को अस्थायी संरक्षित ढांचे के तहत ऊंची उठी हुई क्यारियां तैयार करनी होंगी और खेत में जलभराव बिल्कुल नहीं होने देना होगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि सही तकनीक अपनाने पर खरीफ मौसम में भी बेहतर गुणवत्ता और अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

 

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खरीफ में ऐसे करें प्याज की खेती

वैज्ञानिकों के अनुसार, खरीफ प्याज की सफल खेती के लिए जुलाई के अंतिम सप्ताह से अगस्त तक नर्सरी तैयार करनी चाहिए। बुवाई से पहले बीजों को थिरम से उपचारित करना जरूरी है। बीजों को 5 से 7 सेंटीमीटर की दूरी पर कतारों में बोया जाए।एक एकड़ क्षेत्र के लिए 4 से 5 किलोग्राम बीज पर्याप्त माना गया है। लगभग 40 से 50 दिन बाद पौधे रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। अगस्त के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के पहले सप्ताह तक रोपाई करने पर अच्छी उपज मिलने की संभावना रहती है।

 

वैज्ञानिकों ने किसानों को खेत तैयार करते समय 20 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी खाद मिलाने की सलाह दी है। इसके साथ ही 120:60:80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर एनपीके उर्वरक के संतुलित प्रयोग की सिफारिश की गई है। पौधों की रोपाई 10×15 सेंटीमीटर की दूरी पर करें। खेत में जल निकासी की समुचित व्यवस्था रखें और कटाई से कम से कम सात दिन पहले सिंचाई बंद कर दें, ताकि बेहतर गुणवत्ता वाली प्याज तैयार हो सके।

कई जिलों को भी मिलेगा फायदा

शोध के दौरान यह पाया गया कि पीएच 7.6 या उससे अधिक वाली क्षारीय मिट्टी में कई किस्मों ने शानदार प्रदर्शन किया। इनमें भीमा राज, भीमा शक्ति, एन-883, एग्रीफाउंड डार्क रेड, भीमा सुपर और एन-53 प्रमुख हैं। वैज्ञानिकों ने इन्हें खरीफ मौसम के लिए सबसे उपयुक्त बताया है। ऐसी क्षारीय और दोमट-क्षारीय मिट्टी उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बड़े पैमाने पर पाई जाती है। इनमें लखनऊ, उन्नाव, रायबरेली, हरदोई, सीतापुर, बाराबंकी, कानपुर नगर, कानपुर देहात, फतेहपुर, उरई (जालौन), इटावा, औरैया, फर्रुखाबाद, कन्नौज, मैनपुरी, एटा, अलीगढ़, हाथरस, बुलंदशहर, प्रयागराज, कौशांबी और प्रतापगढ़ जैसे जिले प्रमुख हैं।

 

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक तकनीक अपनाकर खरीफ प्याज का उत्पादन बढ़ाया जा सकता है, जिससे किसानों को अतिरिक्त आय का नया स्रोत मिलेगा।

प्याज किसानों को होगा फायदा? 

भारत दुनिया में प्याज उत्पादन के मामले में चीन के बाद दूसरे स्थान पर है। सामान्य तौर पर देश में रबी की फसल अप्रैल-मई में तैयार होकर सितंबर-अक्टूबर तक बाजार में उपलब्ध रहती है। इसके बाद अक्टूबर से मार्च के बीच आपूर्ति घटने से प्याज के दाम तेजी से बढ़ जाते हैं।बीबीएयू के वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि खरीफ और लेट खरीफ में भी बड़े पैमाने पर प्याज की खेती शुरू हो जाती है तो यह अंतर काफी हद तक खत्म हो जाएगा। इससे बाजार में सालभर प्याज की उपलब्धता बनी रहेगी, जमाखोरी की संभावना कम होगी और उपभोक्ताओं को महंगे प्याज से राहत मिल सकेगी। वहीं किसानों को भी साल के अलग-अलग मौसम में फसल बेचने का अवसर मिलेगा, जिससे बेहतर दाम मिलने की संभावना बढ़ेगी।

 

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डॉ. सुतनु माझी का कहना है कि खरीफ प्याज की खेती में सही किस्म का चयन, वैज्ञानिक तरीके से नर्सरी तैयार करना, समय पर रोपाई, जल निकासी की बेहतर व्यवस्था और संतुलित पोषक तत्वों का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण है। किसानों को खेत में पानी रुकने नहीं देना चाहिए और पौधों की नियमित निगरानी करनी चाहिए। इन तकनीकों को अपनाकर कम लागत में अधिक उत्पादन और बेहतर मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बीबीएयू की यह नई तकनीक उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के उन सभी राज्यों के किसानों के लिए नई उम्मीद बन सकती है, जहां खरीफ मौसम में प्याज की खेती अब तक चुनौती मानी जाती रही है। यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर अपनाया गया तो यह किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ देश में सालभर प्याज की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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