अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावा चोरी प्रकरण की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। इस बहुचर्चित मामले में गठित विशेष जांच दल (SIT) गुरुवार को अपनी अंतिम रिपोर्ट उत्तर प्रदेश सरकार को सौंप सकती है। शुरुआती जांच में महज 40 दिनों के भीतर 70 बार चढ़ावा चोरी, दानराशि की सुरक्षा व्यवस्था में भारी लापरवाही, बैंक तक रकम पहुंचाने की प्रक्रिया में खामियां, नियुक्तियों में अनियमितता और खरीद प्रक्रिया में गड़बड़ियों जैसे गंभीर तथ्य सामने आए थे।
अब अंतिम रिपोर्ट में कुछ और लोगों की भूमिका, जिम्मेदारी तय करने के साथ भविष्य की कार्रवाई को लेकर भी अहम सिफारिशें किए जाने की संभावना है। ऐसे में शासन की नजर एसआईटी की रिपोर्ट पर टिकी है क्योंकि इसके आधार पर कई अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ बड़े फैसले लिए जा सकते हैं।
13 जून को गठित हुई थी SIT
राम मंदिर चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद प्रदेश सरकार ने 13 जून को लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय SIT का गठन किया था। टीम ने 15 जून से जांच शुरू की और उसे अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए समय दिया गया था। सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट लगभग पूरी हो चुकी है और इसे गुरुवार को शासन को सौंपा जा सकता है।
23 जून को शासन को सौंपी गई प्रारंभिक रिपोर्ट में एसआईटी ने चौंकाने वाले तथ्य उजागर किए थे। जांच में सामने आया कि महज 40 दिनों के भीतर चढ़ावे की रकम 70 बार चोरी की गई। सीसीटीवी फुटेज में आरोपियों की गतिविधियां स्पष्ट दिखाई दीं। रिपोर्ट के मुताबिक अविनाश शुक्ला सबसे अधिक करीब 50 बार चढ़ावे की रकम निकालते हुए कैमरे में कैद हुआ। पुलिस की विवेचना में भी इन तथ्यों की पुष्टि होने की बात कही गई है।
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अनुकल्प-लवकुश तैयार करते थे पूरी योजना
एसआईटी जांच के अनुसार चोरी पूरी तरह सुनियोजित तरीके से की जाती थी। अनुकल्प मिश्रा और लवकुश मिश्रा यह तय करते थे कि कब और कैसे रकम निकाली जाएगी। इसके बाद अविनाश शुक्ला, मनीष और रमाशंकर चढ़ावे की रकम पार करते थे, जबकि टिन्नू यादव और गणनाकर्मी सुभाष श्रीवास्तव निगरानी रखते थे ताकि किसी को संदेह न हो। रिमांड के दौरान आरोपियों ने भी कई अहम जानकारियां दीं, जिनकी पुष्टि सीसीटीवी फुटेज से होने का दावा किया गया है।
एसआईटी की जांच केवल चोरी तक सीमित नहीं रही। रिपोर्ट में दानराशि की गणना, बैंक तक रकम पहुंचाने, सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी प्रणाली में गंभीर कमियां मिलने का उल्लेख किया गया है। जांच में पाया गया कि गणनाकर्मियों को पर्याप्त सत्यापन के बिना प्रवेश दिया जा रहा था और दानराशि की सुरक्षा के लिए तय मानकों का पालन नहीं हो रहा था। सोने-चांदी के आभूषणों का अभिलेखीकरण भी मानकों के अनुरूप नहीं मिला।
नियुक्तियों और खरीद प्रक्रिया पर भी उठे सवाल
एसआईटी ने अपनी जांच में मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार कई नियुक्तियां निर्धारित प्रक्रिया और योग्यता के बजाय सिफारिश के आधार पर की गईं। वहीं सामग्री खरीद और टेंडर प्रक्रिया में भी पारदर्शिता की कमी मिली। सीता रसोई और प्रसाद वितरण से जुड़ी खाद्य सामग्री की खरीद कई मामलों में बाजार दर से अधिक कीमत पर किए जाने के संकेत भी जांच में सामने आए हैं।
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सूत्रों का कहना है कि अंतिम रिपोर्ट में चोरी प्रकरण से जुड़े कुछ और लोगों की भूमिका का भी उल्लेख किया गया है। एसआईटी ने जवाबदेही तय करने, वित्तीय व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। अब शासन अंतिम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद तय करेगा कि किन अधिकारियों, कर्मचारियों और अन्य संबंधित लोगों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। माना जा रहा है कि एसआईटी की अंतिम रिपोर्ट इस पूरे मामले में कई बड़े खुलासों और अहम फैसलों का आधार बन सकती है।