उत्तर प्रदेश के अपराध इतिहास में कई खूंखार गैंगस्टरों के नाम दर्ज हैं लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला की कहानी सबसे अलग और रहस्यमयी मानी जाती है। महज कुछ वर्षों में पूर्वांचल का यह युवक ऐसा अपराधी बन गया, जिसने बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक पुलिस और सरकार की नींद उड़ा दी। बिहार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद, यूपी के बाहुबली नेता वीरेंद्र प्रताप शाही और ठेकेदार भानु प्रकाश मिश्रा समेत कई चर्चित हत्याओं में उसका नाम सामने आया लेकिन उसकी पहचान सिर्फ एक गैंगस्टर तक सीमित नहीं रही। 1998 में जब खुफिया एजेंसियों को सूचना मिली कि उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले ली है तो प्रदेश की राजनीति और पुलिस महकमे में भूचाल आ गया।
इसी खतरे से निपटने के लिए उत्तर प्रदेश में STF का गठन हुआ। STF ने श्रीप्रकाश शुक्ला को मुठभेड़ में मार गिराया लेकिन सबसे बड़ा सवाल आज भी बरकरार है- आखिर मुख्यमंत्री की हत्या की कथित सुपारी किसने दी थी? करीब 27 साल बाद भी इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ सका है और यह मामला आज भी यूपी के अपराध इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में गिना जाता है।
एक हत्या से शुरू हुआ अपराध का सफर
गोरखपुर जिले के मामखोर गांव का रहने वाला श्रीप्रकाश शुक्ला युवावस्था में ही अपराध की दुनिया में उतर गया। शुरुआती अपराधों के बाद वह फरार हुआ और धीरे-धीरे पूर्वांचल के सबसे खतरनाक अपराधियों में गिना जाने लगा। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार हत्या, रंगदारी, अपहरण और गैंगवार उसके अपराध का मुख्य आधार बन गए थे। श्रीप्रकाश शुक्ला का नाम बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या से जुड़ा।
यह भी पढ़ें: एटा के बाहुबली यादव ब्रदर्स: सत्ता, संघर्ष और सियासत की कहानी
1998 में पटना के IGIMS अस्पताल परिसर में दिनदहाड़े हुई इस हत्या ने पूरे देश का ध्यान खींचा था।इसके अलावा लखनऊ में पूर्व विधायक और बाहुबली नेता वीरेंद्र प्रताप शाही की AK-47 से की गई हत्या ने उसके आतंक को नई पहचान दी। ठेकेदार भानु प्रकाश मिश्रा समेत कई कारोबारियों और प्रतिद्वंद्वियों की हत्या के मामलों में भी उसका नाम सामने आया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार उस दौर में उसका नाम सुनकर ही व्यापारी और ठेकेदार वर्ग दहशत में आ जाता था।
जब मुख्यमंत्री की सुपारी की खबर से मचा भूचाल
1998 में खुफिया एजेंसियों को सूचना मिली कि श्रीप्रकाश शुक्ला ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ली है। यह सूचना इतनी गंभीर मानी गई कि शासन स्तर पर तत्काल कार्रवाई शुरू हुई। मुख्यमंत्री की सुरक्षा बढ़ाई गई और अपराधी को पकड़ने के लिए एक विशेष टीम गठित करने का फैसला लिया गया।
4 मई 1998 को उत्तर प्रदेश STF का गठन हुआ। STF के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे पूर्व आईपीएस राजेश पांडेय ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘ऑपरेशन बाजूका’ और कई साक्षात्कारों में बताया है कि श्रीप्रकाश शुक्ला उस समय प्रदेश का सबसे बड़ा अपराधी बन चुका था। राजेश पांडेय के अनुसार, मुख्यमंत्री को मिले खतरे के इनपुट इतने गंभीर थे कि सरकार को विशेष बल बनाना पड़ा। उन्होंने बताया कि श्रीप्रकाश शुक्ला उन शुरुआती अपराधियों में था जो AK-47 जैसे अत्याधुनिक हथियारों का खुलेआम इस्तेमाल करता था। पांडेय के मुताबिक वह केवल हत्या नहीं करता था, बल्कि भय और दबदबा कायम करने के लिए अपराध को हथियार की तरह इस्तेमाल करता था
पूर्व DGP विक्रम सिंह क्या कहते हैं?
पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कई बार सार्वजनिक मंचों पर कह चुके हैं कि श्रीप्रकाश शुक्ला उस दौर का सबसे दुस्साहसी और संगठित अपराधी था। उनके मुताबिक, उसने अपराध की दुनिया में आधुनिक हथियारों और पेशेवर गैंग संचालन का नया मॉडल खड़ा किया था। हालांकि मुख्यमंत्री की कथित सुपारी के पीछे किसका हाथ था, इस बारे में कभी कोई आधिकारिक खुलासा नहीं हो सका।
यह भी पढ़ें: 'मां बुला रही है', धोखे से कॉल किया, फिर गैंगरेप, मुजफ्फनगर में युवती से दरिंदगी
22 सितंबर 1998: जब खत्म हुआ श्रीप्रकाश का खेल
करीब पांच महीने तक चले ऑपरेशन के बाद 22 सितंबर 1998 को गाजियाबाद के इंदिरापुरम क्षेत्र में STF ने श्रीप्रकाश शुक्ला को मुठभेड़ में मार गिराया। यह STF की पहली बड़ी सफलता मानी गई। उसके मारे जाने के बाद प्रदेश में संगठित अपराध के खिलाफ कार्रवाई को नई दिशा मिली।
श्रीप्रकाश शुक्ला की मौत के साथ उसके कई राज भी खत्म हो गए। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की कथित सुपारी किसने दी थी, यह सवाल आज भी स्पष्ट जवाब का इंतजार कर रहा है। वर्षों तक चली चर्चाओं, दावों और अटकलों के बावजूद किसी व्यक्ति का नाम आधिकारिक रूप से सामने नहीं आ पाया।बृज बिहारी प्रसाद, वीरेंद्र प्रताप शाही और भानु प्रकाश मिश्रा जैसे बड़े नामों की हत्या से चर्चा में आए श्रीप्रकाश शुक्ला का अंत तो STF ने कर दिया, लेकिन मुख्यमंत्री की कथित सुपारी का रहस्य आज भी उत्तर प्रदेश के अपराध इतिहास की सबसे बड़ी पहेलियों में शामिल है। STF के गठन की वजह बना यह मामला आज भी उतना ही दिलचस्प है, जितना 1998 में था।