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कन्नौज बस हादसे में 6 साल बाद भी नहीं मिला न्याय, अब ग्रेटर नोएडा में 9 की मौत

UP के ग्रेटर नोएडा में स्लीपर बस में आग लगने से नौ लोगों की मौत हो गई। 6 वर्ष पहले कन्नौज में स्लीपर बस में आग लगने से 10 लोग जिंदा जल गए थे। इस मामले में अधिकारियों के खिलाफ दर्ज मुकदमे में पुलिस ने एफआर लगा दी थी।

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ग्रेटर नोएडा में इसी स्लीपर में बस में लगी थी आग, Photo Credit: Social Media

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उत्तर प्रदेश के  ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत ने उत्तर प्रदेश में लंबी दूरी की निजी बसों की सुरक्षा व्यवस्था पर फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। दिल्ली के कश्मीरी गेट से महोबा जा रही बस में करीब 30-35 यात्री सवार थे। हादसे के बाद चालक और परिचालक को गिरफ्तार किया गया। शुरुआती जांच में आग बस के एसी/इंजन क्षेत्र से फैलने की बात सामने आई है लेकिन यह यूपी में स्लीपर बसों से जुड़ा पहला ऐसा मामला नहीं है। छह साल पहले कन्नौज के घिलोई में स्लीपर बस आग का गोला बनी थी और 10 यात्रियों की मौत हो गई थी। उस हादसे की जांच में सामान्य बसों को स्लीपर बस में तब्दील किए जाने का मामला सामने आया था। इसके बाद जो घटनाक्रम हुआ, वह आज की व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल खड़ा करता है।

 

10 जनवरी 2020 को फर्रुखाबाद की बस कन्नौज के छिबरामऊ क्षेत्र के घिलोई के पास ट्रक से टकराने के बाद आग की चपेट में आ गई थी। हादसे में 10 यात्रियों की मौत हुई थी। जांच में सामने आया कि हादसे वाली बस सामान्य बस से स्लीपर में तब्दील की गई थी। बस फर्रुखाबाद निवासी विमल चतुर्वेदी के परिवार के नाम पंजीकृत थी। हादसे के बाद बस संचालक विमल चतुर्वेदी और उनकी पत्नी प्रीती चतुर्वेदी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज किया गया था। पुलिस ने इस मामले में बुकिंग एजेंटों के नाम भी जांच में शामिल किए थे।

2 ARTO पर भी दर्ज हुआ था मुकदमा

हादसे की जांच आगे बढ़ी तो सामान्य बसों को स्लीपर में बदलने की अनुमति को लेकर तत्कालीन अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे। तत्कालीन आरटीओ प्रवर्तन कानपुर राकेश सिंह ने फर्रुखाबाद के तत्कालीन एआरटीओ मोहम्मद हसीब खां और एआरटीओ शांतिभूषण पांडेय के खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज कराया था।


पुलिस की जांच में सामने आया कि विमल चतुर्वेदी की 17 बसों को सामान्य से स्लीपर में बदलने से जुड़ी पत्रावलियां एआरटीओ कार्यालय से गायब थीं। दोनों एआरटीओ को इस मामले में निलंबित भी किया गया था।

 

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17 बसों की फाइलों का रिकॉर्ड गायब

यह इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू था। जिस प्रक्रिया की जांच होनी थी, उसी से जुड़ी 17 बसों की फाइलें एआरटीओ कार्यालय से गायब हो गईं। इन फाइलों के गायब होने पर अलग से मुकदमा भी दर्ज हुआ। एक समय जांच में यह सामने आया कि रिकॉर्ड पुराने एआरटीओ कार्यालय में रखा था। बाद में जब सामान्य से स्लीपर में बदली गई बसों की पत्रावलियां तलाश की गईं तो रिकॉर्ड गायब मिला। विवेचक ने कार्यालय के कर्मचारियों और संबंधित लोगों से रिकॉर्ड मांगा था। यानी एक तरफ बसों को स्लीपर में बदलने की अनुमति की जांच, दूसरी तरफ उसी अनुमति से जुड़ी फाइलों के गायब होने की जांच दोनों स्तर पर सवाल खड़े हुए।

पुलिस ने ARTO मामले में लगा दी फाइनल रिपोर्ट

सबसे बड़ा सवाल यहीं से पैदा होता है। दो एआरटीओ के खिलाफ दर्ज मुकदमे में पुलिस ने जांच के बाद फाइनल रिपोर्ट लगा दी। रिपोर्ट में दोनों एआरटीओ और संबंधित कर्मचारियों के बयान दर्ज किए जाने का उल्लेख है। पुलिस की विवेचना में उन्हें क्लीन चिट मिल गई। फाइलों के गायब होने के मामले में भी पुलिस फाइलें बरामद नहीं कर सकी। इस मामले की जांच के दौरान कार्यालय से रिकॉर्ड गायब होने और जिम्मेदारी तय करने में सामने आई मुश्किलों का उल्लेख है।

 

यहीं सवाल खड़ा होता है अगर हादसे के बाद व्यवस्था में गड़बड़ी की आशंका पर मुकदमे दर्ज हों, फिर जांच के बाद एफआर लग जाए और जिस रिकॉर्ड से जांच होनी है वही फाइलें गायब हो जाएं, तो हादसे में मारे गए लोगों के परिवारों को न्याय कैसे मिलेगा और व्यवस्था कैसे सुधरेगी?

फर्रुखाबाद में 100 से ज्यादा अमानक स्लीपर बसें

फर्रुखाबाद में 100 से अधिक अमानक स्लीपर बसों के दिल्ली, जयपुर और अन्य शहरों के लिए चलने की बात सामने आई है। इन बसों के अलग-अलग स्थानों और स्टॉपेज से यात्रियों को बैठाने की व्यवस्था भी चल रही है। 2020 में भी फर्रुखाबाद एआरटीओ कार्यालय के रिकॉर्ड में करीब 90 स्लीपर बसें दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। इनमें करीब 60 बसें दिल्ली रूट पर चलने की बात बताई गई थी, जबकि करीब 20 बसें जयपुर रूट पर थीं।

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7 पंजीकृत एसी स्लीपर बसों में सिर्फ 1 मानक पर

कानपुर से जुड़ी ताजा जांच भी तस्वीर को गंभीर बनाती है। परिवहन विभाग के रिकॉर्ड में सात एसी स्लीपर बसें पंजीकृत मिलीं। इनमें केवल एक ने मानक पूरे किए। पांच बसों को मानक पूरे नहीं करने पर ब्लैकलिस्ट किया गया और एक बस को सीज किया गया। इसके बावजूद दिल्ली, आगरा और झांसी रूट पर स्लीपर बसों के संचालन की जानकारी सामने आई है यानी सवाल सिर्फ उन बसों का नहीं है जो किसी जिले में पंजीकृत हैं। बड़ा सवाल उन बसों की निगरानी का है जो एक जिले से दूसरे जिले और एक राज्य से दूसरे राज्य तक लंबी दूरी तय कर रही हैं।

 

लखनऊ में अनधिकृत स्लीपर बसों के खिलाफ अभियान चलाया गया। परिवहन विभाग की टीम ने 22 स्लीपर बसों के चालान किए और सात बसें सीज कीं। इनमें कुछ बसें ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट पर थीं लेकिन परमिट की शर्तों के विपरीत फुटकर सवारियां ढोते हुए पाई गईं। कार्रवाई के ये आंकड़े एक दूसरा सवाल भी खड़ा करते हैं अगर एक तरफ लगातार बसें सीज हो रही हैं और दूसरी तरफ उन्हीं रूटों पर अमानक बसें फिर दिखाई दे रही हैं, तो क्या सिर्फ चेकिंग और चालान से समस्या खत्म होगी?

सामान्य बस को स्लीपर में बदलने की निगरानी 

कन्नौज का पुराना मामला इस बात का उदाहरण है कि बस की सुरक्षा केवल फिटनेस सर्टिफिकेट तक सीमित नहीं हो सकती। अगर सामान्य बस की बॉडी और अंदरूनी ढांचा बदलकर उसे स्लीपर बनाया जाता है तो उसकी संरचना, बर्थ की व्यवस्था, आपातकालीन निकास, फायर सेफ्टी और यात्रियों के सुरक्षित बाहर निकलने की व्यवस्था की दोबारा जांच जरूरी है। मौजूदा मानकों में स्लीपर बसों में आपातकालीन निकास, बर्थ की लंबाई-ऊंचाई, बॉडी कोड और अग्निशमन उपकरण जैसी व्यवस्थाएं निर्धारित हैं। कानपुर की मौजूदा जांच में भी अग्निशमन उपकरण और मॉडिफिकेशन से जुड़ी कमियां सामने आई हैं।

 

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कन्नौज में 2020 में 10 लोग जिंदा जल गए। सामान्य बसों को स्लीपर में बदलने का मामला सामने आया। 17 बसों की फाइलें गायब हुईं। अधिकारियों पर मुकदमा हुआ और बाद में एफआर लग गई। छह साल बाद फर्रुखाबाद में 100 से अधिक अमानक स्लीपर बसें चलने की रिपोर्ट सामने आई। और अब नोएडा में स्लीपर बस की आग में नौ यात्रियों की मौत हो गई। सवाल यही है हर हादसे के बाद मुकदमा और चेकिंग तो होती है, लेकिन क्या व्यवस्था की वह खामी खत्म होती है, जो अगली बार किसी और परिवार को हादसे के सामने खड़ा कर देती है?

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