तमिलनाडु के राजधानी चेन्नई की दक्षिण रेलवे ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। लगभग 95 साल पहले मद्रास (अब चेन्नई) में इलेक्ट्रिक ट्रेन चलनी शुरू हुई थी, और अब यह अपने पूरे ब्रॉड-गेज नेटवर्क को 100% इलेक्ट्रिफाई कर दिया है। बता दें कि 9 सितंबर को पट्टुकोट्टई-कराईकुडी के बीच के 71 किलोमीटर लंबे ट्रैक का इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा हुआ।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दक्षिण रेलवे के मुख्य इलेक्ट्रिकल इंजीनियर गणेश ने इस सेक्शन का निरीक्षण किया। इसके बाद दक्षिण रेलेवे के कुल 5,068 रूट किलोमीटर ब्रॉड-गेज नेटवर्क का इलेक्ट्रिफिकेशन पूरी तरह से हो गया।
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कैसे हुआ पूरा, क्या होगा इसका फायदा?
बता दें कि 9 सितंबर को पट्टुकोट्टई-कराईकुडी के बीच के 71 किलोमीटर लंबे सेक्शन का इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा हुआ। दक्षिण रेलवे के मुख्य इलेक्ट्रिकल इंजीनियर गणेश ने इस सेक्शन का कानूनी निरीक्षण किया। इसके बाद दक्षिण रेलवे का कुल 5,068 रूट किलोमीटर लंबा ब्रॉड-गेज नेटवर्क पूरी तरह से इलेक्ट्रिफाइड हो गया।
ऐसे में अब पूरे नेटवर्क में ट्रेनें बिना किसी रुकावट के इलेक्ट्रिक इंजन से चल सकेंगी, ट्रैक्शन बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यानी अलग-अलग तरह के इंजन बदलने का झंझट खत्म हो जाएगा, ट्रेनों की रफ्तार और सर्विस पहले से बेहतर होगी। इसके अलावा फ्यूल पर निर्भरता कम होगी, जिससे यह पर्यावरण के लिहाज से भी बेहतर है। इससे रेलवे का सिस्टम ज़्यादा भरोसेमंद और आधुनिक बनेगा।
इतिहास पर एक नजर
इसके इतिहास के बारे में बात करें तो मद्रास में सबसे पहले 11 मई 1931 को इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन शुरू हुआ था। उस समय मुंबई (बॉम्बे) के बाद मद्रास देश का दूसरा ऐसा महानगर बना था, जहां इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन शुरू हुआ। इसके बाद 1968 में मद्रास बीच और तांबरम के बीच 25kV AC इलेक्ट्रिफिकेशन का काम शुरू किया गया। अब लगभग 95 साल बाद सदर्न रेलवे ने अपने पूरे नेटवर्क का इलेक्ट्रिफिकेशन पूरा कर लिया है, जिसे रेलवे के आधुनिकीकरण की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।