हिमाचल प्रदेश के विश्वविद्यालयों में होने वाली सरकारी भर्तियों और वित्तीय निर्णयों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। विश्वविद्यालयों में नियुक्तियों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने के उद्देश्य से प्रदेश सरकार ने हिमाचल प्रदेश राज्य विश्वविद्यालय संशोधन विधेयक, 2026 विधानसभा में पारित कर दिया है। विपक्षी भाजपा के विरोध के बावजूद विधेयक ध्वनिमत से पारित हुआ।
संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विश्वविद्यालयों में होने वाली भर्तियों से जुड़ा है। अब विश्वविद्यालयों को सभी पदों पर सीधे नियुक्तियां करने का अधिकार नहीं रहेगा। विश्वविद्यालय केवल प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर नियुक्तियां कर सकेंगे, जबकि अन्य पदों की भर्तियां हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग और राज्य चयन आयोग के माध्यम से करवाई जाएंगी।
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भर्ती प्रक्रिया पर सरकार की सीधी निगरानी
सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से विश्वविद्यालयों में गैर-शैक्षणिक और अन्य सरकारी पदों पर होने वाली भर्तियों में मनमानी की संभावना कम होगी। आयोगों के माध्यम से भर्ती होने से चयन प्रक्रिया निर्धारित नियमों, प्रतियोगी परीक्षा और मेरिट के आधार पर संचालित होगी। इस बदलाव का असर विश्वविद्यालयों में विभिन्न श्रेणियों के उन पदों पर पड़ेगा, जिनकी भर्ती अब तक विश्वविद्यालय स्तर पर ही की जा सकती थी। सरकार का मानना है कि भर्ती प्रक्रिया को केंद्रीयकृत और संवैधानिक/वैधानिक भर्ती संस्थाओं के माध्यम से कराने से पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही बढ़ेगी।
मुख्यमंत्री ठाकुर सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने विधानसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान कहा कि इसका उद्देश्य विश्वविद्यालयों की सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है। उन्होंने पूर्व सरकार के कार्यकाल में हुई भर्तियों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उस दौरान भर्ती प्रक्रिया में धांधली हुई थी। मुख्यमंत्री ने कहा कि संशोधन के बाद इस तरह की गड़बड़ियों की गुंजाइश नहीं रहेगी।
विश्वविद्यालयों के खर्च पर भी निगरानी
विधेयक में विश्वविद्यालयों की वित्तीय व्यवस्था को अधिक जवाबदेह बनाने का भी प्रावधान किया गया है। इसके तहत विश्वविद्यालय की वित्त समिति की अध्यक्षता अब प्रदेश सरकार के वित्त सचिव द्वारा किए जाने का प्रावधान किया गया है। इस बदलाव को विश्वविद्यालय के वित्तीय निर्णयों पर सरकार की निगरानी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। वित्त समिति में वित्त सचिव की अध्यक्षता होने से विश्वविद्यालय के बजट, खर्च और वित्तीय निर्णयों में सरकारी स्तर पर निगरानी और वित्तीय अनुशासन मजबूत होने की उम्मीद है।
सरकार का तर्क है कि विश्वविद्यालय को मिलने वाले सरकारी धन और अन्य वित्तीय संसाधनों के इस्तेमाल में भी पारदर्शिता जरूरी है। इसलिए संशोधन के जरिए भर्ती व्यवस्था के साथ-साथ वित्तीय प्रबंधन को भी जवाबदेह बनाने का प्रयास किया गया है। विधेयक के प्रावधानों से विश्वविद्यालय की प्रशासनिक स्वायत्तता को लेकर भी बहस तेज हो सकती है। एक ओर सरकार इसे भर्ती में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाला कदम बता रही है, वहीं विपक्ष ने इसका विरोध किया है। बीजेपी ने विधेयक का विरोध करते हुए सरकार की मंशा और इसके प्रावधानों पर सवाल उठाए। हालांकि विपक्ष के विरोध के बीच सरकार ने विधेयक को विधानसभा में ध्वनिमत से पारित करा लिया।
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सरकार के फैसले का सीधा असर क्या होगा?
- नए संशोधन के लागू होने के बाद विश्वविद्यालयों की नियुक्ति व्यवस्था में मोटे तौर पर दो स्तर बनेंगे
- प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर: विश्वविद्यालय स्वयं नियुक्ति कर सकेंगे।
- अन्य पद: नियुक्तियां लोक सेवा आयोग और राज्य चयन आयोग के माध्यम से होंगी।
- वित्त समिति: प्रदेश सरकार के वित्त सचिव अध्यक्ष होंगे।
- उद्देश्य: भर्ती में पारदर्शिता, मेरिट आधारित चयन और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करना।
कुल मिलाकर, यह संशोधन हिमाचल के राज्य विश्वविद्यालयों की भर्ती और वित्तीय प्रशासन की मौजूदा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव है। सरकार जहां इसे विश्वविद्यालयों में कथित भर्ती अनियमितताओं पर रोक और सरकारी धन के बेहतर इस्तेमाल की दिशा में कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता में सरकारी हस्तक्षेप के रूप में देख रहा है। अब इस संशोधन के अमल में आने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आयोगों के माध्यम से होने वाली भर्तियों से पारदर्शिता और नियुक्तियों की गति दोनों में कितना सुधार आता है।