उत्तर प्रदेश सरकार ने मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम-2004 में बदलाव को मंजूरी दे दी है। इसके बाद अब मदरसा बोर्ड कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा की डिग्री नहीं दे सकेगा। बता दें कि यूपी के मदरसों से मिली कामिल की डिग्री को , फाजिल की ग्रेजुएशनडिग्री को पोस्ट ग्रेजुएशन के बराबर माना जाता रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार का यह फैसला सीधे तौर पर पर सुप्रीम कोर्ट के नवंबर 2024 के फैसले से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में कहा था कि मदरसा बोर्ड उच्च शिक्षा की डिग्री देने का अधिकार नहीं रखता। सरकार के इस फैसले के बाद अब यूपी के मदरसे सिर्फ 12वीं क्लास यानी कि आलिम स्तर तक की पढ़ाई करवा सकेंगे, इसी का सर्टिफिकेट दे पाएंगे।
ऐसे में बड़ा सवाल उठता है कि इस फैसले की वजह से क्या उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा अब धीरे-धीरे सिर्फ स्कूली स्तर तक सिमट जाएगी? आंकड़ों की मानें तो उत्तर प्रदेश में कुल लगभग 25,000 मदरसे हैं। इनमें से करीब 16,513 मदरसे उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त हैं। इनमें से 558 मदरसे ऐसे हैं जो पूरी तरह से राज्य सरकार के अनुदान से चलते हैं। लगभग 8,449 मदरसे गैर-मान्यता प्राप्त हैं। दूसरी ओर साल दर साल मदरसों में छात्रों के दाखिले भी कम हो रहे हैं। ऐसे में सरकार के इस फैसले का कितना असर छात्रों के साथ मदरसा की व्यवस्था पर पड़ेगा, यह भी एक सवाल है।
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मदरसा बोर्ड का स्ट्रक्चर
बता दें कि यूपी मदरसा बोर्ड की पढ़ाई 6 स्तरों में बंटी होती है, जो सामान्य स्कूल-कॉलेज सिस्टम के बराबर मानी जाती रही है। इसके तहत छात्र सबसे पहले तहतानिया से शुरुआत करता है, फिर फौकानिया पूरा करता है। इसके बाद मुंशी या मौलवी और फिर आलिम की पढ़ाई होती है। आलिम के बाद छात्र चाहे तो कामिल कर सकता है, कामिल के बाद फिर फाजिल कर सकता है। इसके अलावा मदरसा बोर्ड डिप्लोमा कोर्स भी कराता है, जिसे पूरा करने वाले छात्र को कारी कहा जाता है।

बता दें कि मदरसा एक्ट के तहत अरबी, उर्दू, फारसी और इस्लामिक स्टडीज के साथ-साथ ट्रेडिशनल मेडिसिन और फिलॉसफी जैसे विषय भी पढ़ाए जाते हैं, ताकि छात्रों को धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ सामान्य और आधुनिक ज्ञान भी मिल सके।
जब सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया हाई कोर्ट का फैसला
मार्च 2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा अधिनियम, 2004 को असंवैधानिक बताते हुए रद्द कर दिया था। बाद में इसके खिलाफ मदरसा प्रबंधकों, शिक्षकों और कुछ संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया और मदरसा कानून को लागू रहने दिया। हालांकि, कोर्ट ने एक अहम बात साफ की। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियां मदरसा बोर्ड नहीं दे सकता। उच्च शिक्षा और उससे जुड़ी डिग्रियों का अधिकार विश्वविद्यालयों और संबंधित वैधानिक संस्थाओं के पास होता है। मदरसा बोर्ड विश्वविद्यालय नहीं है, इसलिए वह उच्च शिक्षा की डिग्री देने का अधिकार नहीं रखता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए उत्तर प्रदेश में योगी सरकार मदरसों द्वारा जारी की जाने वाली 'कामिल'और 'फाज़िल' जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियों को बंद करने जा रही है। ऐसे में अब मदरसा बोर्ड सिर्फ तहतानिया से आलिम तक (यानी प्राइमरी से 12वीं तक) की पढ़ाई और सर्टिफिकेट दे पाएगा। कामिल और फाजिल का नहीं।
कामिल और फाजिल को बंद करने का फैसला
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को आधार बनाते हुए उत्तर प्रदेश में योगी सरकार मदरसों द्वारा जारी की जाने वाली 'कामिल'और 'फाज़िल' जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियों को बंद करने जा रही है। अब मदरसा बोर्ड सिर्फ तहतानिया से आलिम तक (यानी प्राइमरी से 12वीं तक) की पढ़ाई और सर्टिफिकेट दे पाएगा। कामिल और फाजिल का नहीं। मदरसे से 12वीं के बाद अब जो छात्र उच्च शिक्षा की डिग्री हासिल करना चाहते हैं तो उन्हें विश्वविद्यालयों या अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों का रुख करना होगा। दूसरे छात्रों की तरह सामान्य प्रवेश प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा।
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कामिल-फाजिल बंद होने का असर किस पर पड़ेगा?
इस बदलाव का सबसे सीधा असर कामिल और फाजिल की पढ़ाई कर रहे छात्रों पर पड़ेगा। ऐसे छात्रोंं को आगे की पढ़ाई या डिग्री के लिए विश्वविद्यालयों और दूसरे मान्यता प्राप्त संस्थानों का रास्ता तलाशना होगा। खासकर छोटे शहरों और गांवों के उन छात्रों के लिए यह बदलाव मुश्किल हो सकता है, जो अपने इलाके के मदरसे में रहकर ही उच्च शिक्षा पूरी कर रहे थे। इसके अलावा, मदरसा संचालकों के सामने भी बड़ा बदलाव होगा, क्योंकि उन्हें उच्च शिक्षा वाले कोर्स की जगह स्कूल स्तर की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। इसका असर शिक्षकों और कामिल-फाजिल से जुड़े स्टाफ पर भी पड़ सकता है।
दूसरी ओर लंबे समय में इसका असर उन छात्रों पर होगा जो मदरसे के जरिए पारंपरिक धार्मिक शिक्षा के साथ आगे की पढ़ाई करना चाहते थे। हालांकि, सरकार अगर छात्रों को विश्वविद्यालयों में दाखिले का आसान रास्ता और पुरानी पढ़ाई की उचित मान्यता देती है, तो इस बदलाव का नुकसान काफी हद तक कम किया जा सकता है।