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'चांद पर पहुंच गए लेकिन आज भी लोग मैला ढोने को मजबूर', हाई कोर्ट की टिप्पणी

सीवर और सेप्टिक टैंक जैसी जगहों पर सफाई करने के दौरान मौत हो जाने के चलते हुई मौतों के मामले में हाई कोर्ट ने कहा है कि पहले तो महाराष्ट्र सरकार मुआवजा दे।  

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बॉम्बे हाई कोर्ट, File Photo Credit: PTI

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि वह सफाई का काम करने के दौरान मारे गए मजदूरों के आश्रितों को 30 लाख रुपये मुआवजा तुरंत दे। साथ ही, राज्य की उस नीति को भी रद्द कर दिया गया है जिसमें मुआवजे की जिम्मेदारी निजी सोसायटियों और इन कर्मियों को काम पर रखने वाले लोगों पर डाली गई थी। इसी केस की सुनवाई खे दौरान हाई कोर्ट की ओर से एक टिप्पणी भी की गई जो अब चर्चा का विषय बन गई है। हाई कोर्ट ने कहा कि 21वीं सदी में हम चांद तक पहुंच गए हैं लेकिन जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक अब भी मौजूद है। हाई कोर्ट ने अब भी लोगों के मैला ढोने की व्यवस्था पर भी सवाल उठाए।  

 

जस्टिस भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने पिछले हफ्ते पारित आदेश में कहा कि मुआवजा पहले राज्य सरकार अदा करे। इसके बाद सरकार जिम्मेदार निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं से यह राशि वसूल सकती है। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर उन सभी लोगों की पहचान करने का निर्देश दिया, जिनकी मौत खतरनाक सफाई कार्य के दौरान हुई है। यह कार्य मैला ढोने वालों के रूप में रोजगार के निषेध और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 की धारा 2(डी) के तहत परिभाषित है।

हाई कोर्ट ने उठाए सवाल

हाई कोर्ट ने कहा है कि ऐसे हर मृतक व्यक्ति के आश्रितों को राज्य सरकार 30 लाख रुपये का मुआवजा दे। हाई कोर्ट ने कहा है, '21वीं सदी में हम चंद्रमा के दूसरे हिस्से तक पहुंचने का दावा करते हैं लेकिन हमारे सामने खड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे देश में जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक अब भी मौजूद है, जो हमारे कुछ नागरिकों को ऐसे काम करने के लिए मजबूर करता है जो मानवीय गरिमा से नीचे हैं।’

 

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अदालत ने आगे कहा, 'संविधान सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है लेकिन संविधान अपनाए जाने के 75 साल बाद भी हमारा देश उस सामाजिक बुराई से मुक्त नहीं हो पाया है, जिसने सदियों से हमें परेशान किया है। मैला ढोना ऐसी ही एक प्रथा है, जो एक खास समुदाय के लोगों को पीढ़ियों से इस अमानवीय काम को करने के लिए मजबूर करती रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और कानूनों के जरिए इस पर रोक लगाई गई है।’

कितने मैनुअल स्कैवेंजर गंवा रहे जान?

बीते संसद सत्र में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने एक सवाल पूछा था। इसी सवाल के जवाब में सामाजिक न्याय मंत्रालय की ओर से बताया गया कि साल 2024-25 में देश के किसी भी जिले में कोई मैनुअल स्कैवेंजर नहीं पाया गए। इसके पहले के दो सर्वे 2013 और 2018 में कराए गए थे और मैनुअल स्कैवेंजर्स की संख्या 58,098 पाई गई थी। सरकार ने यह भी बताया कि मैनुअल स्कैवेंजिंग के चलके किसी की भी जान नहीं गई।

 

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हालांकि, ऐसा लगता है कि शाब्दिक परिभाषाओं में बदलाव के चलते ऐसा दिखता है। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग की रिपोर्ट में ऐसे लोगों की गिनती की जाती है जिनकी मौत सीवर और सेप्टिक टैंक कि सफाई के दौरान हुई। इसके लिए मुआवजा भी दिया गया है। आंकड़े बताते हैं कि 1 जनवरी 2019 से 30 जून 2026 के बीच कुल 498 लोगों की जान गई। इसमें से 30 लाख का मुआवजा सिर्फ 75 लोगों को दिया गया। कुल 22 लोगों को आंशिक मुआवजा दिया गया।

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