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गले की फांस बना 'तनखैया' कहना, आजम खान की सजा कम क्यों नहीं हुई?

यूपी के रामपुर जिले में चुनावी सभा में अफसर को तनखैया कहने के मामले में कोर्ट ने आजम खां को दो वर्ष की सजा सुनाई थी। यह सजा कम नहीं हुई।

Azam Khan Jauhar University demolition notice

आजम खान की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी, Photo Credit: JauharUniversit/X

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समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आजम खां को न्यायालय से बड़ा झटका लगा है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक चुनावी सभा में अधिकारियों को लेकर की गई विवादित टिप्पणी के मामले में एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट (सेशन ट्रायल), रामपुर ने उनकी अपील खारिज कर दी है।

अदालत ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए दो वर्ष के कारावास और पांच-पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा को बरकरार रखा है। इस फैसले के बाद आजम खां की कानूनी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। हालांकि उनके पास अब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का विकल्प खुला है।

 

यह मामला लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान रामपुर के भोट थाना क्षेत्र के गांव मनकरा में आयोजित चुनावी जनसभा से जुड़ा है। आरोप है कि चुनाव प्रचार के दौरान आजम खां ने मंच से अधिकारियों को लेकर विवादित टिप्पणी करते हुए उन्हें 'तनखैया' कहा था। प्रशासन ने इसे आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन माना और तत्कालीन उप जिलाधिकारी घनश्याम त्रिपाठी की शिकायत पर भोट थाने में मुकदमा दर्ज कराया गया था।

निचली अदालत ने 16 मई को सुनाई थी सजा

मामले की सुनवाई एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट (मजिस्ट्रेट ट्रायल) में हुई। अदालत ने 16 मई 2026 को आजम खां को दोषी करार देते हुए विभिन्न धाराओं में दो-दो वर्ष के कारावास और प्रत्येक धारा में पांच-पांच हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

 

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सेशन कोर्ट ने भी बरकरार रखा फैसला

निचली अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए आजम खां ने एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट (सेशन ट्रायल) में अपील दाखिल की थी। अपील पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था। शनिवार को सुनाए गए फैसले में अदालत ने अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के निर्णय को सही माना और सजा व जुर्माने को यथावत रखा।

सरकारी पक्ष ने रखा मजबूत पक्ष

सुनवाई के दौरान शासकीय अधिवक्ता सीमा राणा ने अभियोजन पक्ष की ओर से अदालत में पक्ष रखा। अभियोजन ने तर्क दिया कि चुनावी सभा में दिया गया बयान आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन था और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निचली अदालत का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत है। अदालत ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए अपील खारिज कर दी।

 

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अब हाईकोर्ट का रास्ता खुला

सेशन कोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद आजम खां के सामने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती देने का विकल्प बचा है। राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजर अब इस बात पर टिकी है कि समाजवादी पार्टी नेता इस फैसले के खिलाफ आगे क्या कदम उठाते हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम चेहरा रहे आजम खां पहले से कई मामलों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में इस फैसले को उनकी कानूनी चुनौतियों में एक और बड़ा झटका माना जा रहा है। राजनीतिक दलों और कानूनी विशेषज्ञों की निगाह अब इस मामले की अगली न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हुई है।

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