सरधना के पूर्व विधायक संगीत सोम इन दिनों क्षेत्र के मुसलमानों से मिल रहे हैं। बीते सोमवार को वह विधानसभा क्षेत्र के मुस्लिम राजपूत बहुल कैली गांव पहुंचे थे। यहां मुस्लिम समाज के लोगों ने अपने पूर्व विधायक का फूल-मालाओं से स्वागत किया। स्वागत के बाद संगीत सोम ने कहा कि मुस्लिम समाज द्वारा आयोजित स्वागत समारोह में शामिल होकर क्षेत्रवासियों से मिले अपार स्नेह, सम्मान एवं आत्मीय स्वागत से अभिभूत हूं।
इससे पहले जून के महीने में भी संगीत सोम जिले के लावड़ कस्बे के मोहल्ला मोमिन अंसार पहुंचे थे। यहां उन्होंने मुस्लिम समाज के लोगों से जनसंपर्क किया था। हालांकि कुछ वक्त पहले संगीत सोम के विचार मुस्लिम समाज के लिए इतने उदारवादी नहीं थे। इस दौरान संगीत सोम ने कहा था कि उन्हें मुस्लिम वोट नहीं चाहिए।
संगीत सोम ने अप्रैल में एक टीवी चैनल को इंटरव्यू दिया था। इसमें उन्होंने मुस्लिम समाज को लेकर कई बयान दिए थे। उन्होंने सवाल पूछा था कि 99 फीसदी आतंकवादी मुसलमान ही क्यों होते हैं। उन्होंने दावा किया था कि मुस्लिम समाज बीजेपी को वोट नहीं देता है। हालांकि, छह महीने में ही संगीत सोम का रुख बदल गया है। उनके रुख में बदलाव को समझने के लिए सरधना विधानसभा सीट का समीकरण और पिछले दो विधानसभा चुनावों के परिणाम देखना होगा।
पिछले दो चुनावों के आंकड़े
साल 2022 के चुनाव में संगीत सोम को हार का सामना करना पड़ा था। वह समाजवादी पार्टी के अतुल प्रधान से 18,200 वोटों से हार गए थे। अतुल प्रधान को 1,18,573 वोट मिले थे, जबकि संगीत सोम को 1,00,373 वोट मिले थे। 2022 में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोक दल का गठबंधन था। बहुजन समाज पार्टी ने संजीव धामा को टिकट दिया था। उन्हें सिर्फ 18,140 वोट मिले थे। संगीत सोम भले ही चुनाव हार गए हों, लेकिन दोनों उम्मीदवारों के बीच वोटों का अंतर बहुत अधिक नहीं था।
2017 में संगीत सोम बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीत गए थे। उन्हें कुल 97,821 वोट मिले थे, जबकि समाजवादी पार्टी के अतुल प्रधान को 76,296 वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर रहे बसपा प्रत्याशी हाफिज इमरान याकूब को 57,239 वोट मिले थे। संगीत सोम ने यह चुनाव सिर्फ 21,525 वोटों से जीता था।
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क्या मुस्लिम वोटों से जीतेंगे संगीत सोम?
साल 2017 में बसपा ने हाफिज इमरान याकूब को टिकट दिया था। इमरान को 57 हजार से ज्यादा वोट मिले थे। मुस्लिम वोट समाजवादी पार्टी का कोर वोट माना जाता है। अब चूंकि बसपा ने मुस्लिम प्रत्याशी उतारा था, इसलिए समाजवादी पार्टी के वोट बंट गए। यदि मुस्लिम समाज ने एकमुश्त अतुल प्रधान को वोट दिया होता तो चुनाव की तस्वीर बदल सकती थी, क्योंकि संगीत सोम सिर्फ 21 हजार वोटों से जीते थे। इस बात की तस्दीक 2022 का विधानसभा चुनाव भी करता है।
साल 2022 में बसपा ने संजीव धामा को टिकट दिया था। संजीव धामा जाट बिरादरी से आते हैं। अब चूंकि यहां किसी बड़ी पार्टी ने मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया था, इसलिए मुस्लिम मतदाताओं का ज्यादातर वोट अतुल प्रधान को मिला और वह 18 हजार वोटों से चुनाव जीत गए। यानी इस सीट पर मुस्लिम मतदाताओं का रुख चुनाव परिणाम पर बड़ा असर डाल सकता है।
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सरधना का जातीय समीकरण समझ लीजिए
सरधना का जातीय समीकरण इस सीट को काफी दिलचस्प बना देता है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस सीट पर करीब 60 हजार ठाकुर और 50 हजार जाट मतदाता हैं। वहीं, 40 हजार गुर्जर और करीब 50 हजार दलित मतदाता हैं, लेकिन क्षेत्र में सबसे अधिक मुस्लिम मतदाता हैं। यहां इनकी संख्या करीब एक लाख बताई जाती है।
मेरठ में हुए दंगों की वजह से सरधना की राजनीति लंबे समय तक हिंदुत्व के मुद्दों के इर्द-गिर्द रही है। लेकिन अब चूंकि हिंदू मतदाताओं के वोट बंट रहे हैं, इसलिए मुस्लिम समाज क्षेत्र की राजनीति में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता दिख रहा है। अब देखना होगा कि मुस्लिम समाज के बीच संगीत सोम की यह मौजूदगी कुछ चुनिंदा सामाजिक कार्यक्रमों तक सीमित रहती है या आने वाले समय में वह मुस्लिम बहुल इलाकों में अपना जनसंपर्क और बढ़ाते हैं।