उत्तर प्रदेश की राजधानी के नगर निगम में मृतक आश्रित के आधार पर नौकरी दिलाने में कथित फर्जीवाड़े का एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस बार आरोप है कि एक महिला ने अपने ही बेटे को मृतक आश्रित बताकर नौकरी दिलाने की कोशिश की जबकि दस्तावेजों के अनुसार बेटे के जन्म के समय उसकी उम्र महज 11 वर्ष थी। हैरानी की बात यह है कि एक कर्मचारी की आपत्ति और कई गंभीर विसंगतियों के बावजूद नियुक्ति की फाइल लगातार आगे बढ़ती रही। मामला अब गोपनीय शिकायत के बाद सामने आया है और कई अधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में आ सकती है।
जानकारी के अनुसार, वर्ष 2024 में नगर निगम के एक कर्मचारी की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसकी पत्नी ने मृतक आश्रित के आधार पर पहले स्वयं नौकरी का दावा किया। बाद में उसने अपने बेटे को मृतक आश्रित के रूप में नौकरी दिलाने के लिए नगर निगम में आवेदन कर दिया।
दस्तावेजों की जांच के दौरान सामने आया कि महिला की जन्मतिथि 4 मई 1991 दर्ज है जबकि जिस बेटे के लिए नौकरी मांगी गई, उसकी जन्मतिथि 24 जून 2002 है। यानी बेटे के जन्म के समय महिला की उम्र करीब 11 वर्ष बनती है। यही तथ्य पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है।
कर्मचारी ने उठाए सवाल, फिर भी आगे बढ़ती रही फाइल
नगर निगम के एक कर्मचारी ने इस गंभीर विसंगति की ओर अधिकारियों का ध्यान दिलाया और फाइल पर आपत्ति दर्ज कराई। इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने आपत्ति को नजरअंदाज करते हुए फाइल को अंतिम चरण तक पहुंचा दिया। अब इस पूरे घटनाक्रम पर सवाल उठ रहे हैं कि स्पष्ट दस्तावेजी विरोधाभास के बावजूद फाइल आगे कैसे बढ़ी।
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सूत्रों के मुताबिक, मामले की गोपनीय शिकायत होने के बाद इसकी जानकारी उच्च अधिकारियों तक पहुंची। अब पूरे प्रकरण की जांच की तैयारी की जा रही है। जांच में यह भी देखा जाएगा कि किन अधिकारियों और कर्मचारियों ने फाइल को बिना पर्याप्त सत्यापन के आगे बढ़ाया।नगर निगम में मृतक आश्रित की नियुक्ति के लिए एक समिति बनाई जाती है, जो सभी दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद ही संस्तुति देती है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि यदि दस्तावेजों में इतनी बड़ी विसंगति थी तो समिति की जांच में यह तथ्य सामने क्यों नहीं आया और फाइल अंतिम चरण तक कैसे पहुंच गई।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
नगर निगम में मृतक आश्रित नियुक्तियों में कथित फर्जीवाड़े के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। कोरोना काल में मृतक कर्मचारी की जगह दूसरे व्यक्ति को नौकरी देने का मामला प्रकाश में आया था। जांच के दौरान पता चला कि जिस कर्मचारी के नाम पर नियुक्ति दी गई थी, उसकी कोरोना से मृत्यु ही नहीं हुई थी। गोमतीनगर वार्ड के सफाई कर्मचारी सुंदर लाल की मृत्यु 12 अप्रैल 2022 को हुई थी, लेकिन उनकी पहली पत्नी के पुत्र को मृतक आश्रित के रूप में नियुक्ति देने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों में कई गंभीर गड़बड़ियां मिली थीं।
आरोप था कि महिला ने 30 जून 2020 को आर्य समाज मंदिर में विवाह का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया, जबकि जांच में यह प्रमाणपत्र संदिग्ध और फर्जी पाया गया। यह भी सामने आया कि विवाह प्रमाणपत्र में दर्ज आर्य प्रतिनिधि सभा से संबंधित विवरण वास्तविक रिकॉर्ड से मेल नहीं खाते थे।
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जांच के केंद्र में ये बड़े सवाल
- 11 वर्ष की उम्र में मां बनने जैसी असंभव स्थिति वाले दस्तावेज कैसे स्वीकार किए गए?
- कर्मचारी की लिखित आपत्ति के बावजूद फाइल आगे किसके निर्देश पर बढ़ी?
- नियुक्ति समिति ने दस्तावेजों का सत्यापन कैसे किया?
- क्या नगर निगम में मृतक आश्रित नियुक्तियों में संगठित फर्जीवाड़े का नेटवर्क सक्रिय है?
यह मामला सामने आने के बाद नगर निगम की मृतक आश्रित नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता और दस्तावेज सत्यापन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच रिपोर्ट के बाद कई अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होने की संभावना जताई जा रही है।नगर आयुक्त गौरव कुमार ने कहा कि मामला जानकारी में आने के बाद इसकी जांच कराई जाएगी। यदि जांच में किसी स्तर पर गड़बड़ी या लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ नियमानुसार सख्त कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि दोषी पाए जाने वालों को किसी भी स्तर पर बख्शा नहीं जाएगा।