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Deepfake से अपराध हुआ तो दोषी कौन, AI कंपनी, प्लेटफॉर्म या यूजर?

डीपफेक से होने वाले अपराध पर दुनिया भर में रोक लगाने की बात उठ रही है। हमें यह समझना होगा कि कैसे डीपफेक का प्रयोग करके अपराध किया जाता है और इसमें अगर अपराध साबित हो गया तो किसे इसका दोषी माना जाएगा?

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प्रतीकात्मक तस्वीर, AI Generated Image

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इन दिनों दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस्तेमाल को लेकर काफी चर्चा हो रही है। एक तरफ AI ने लोगों के कई काम आसान कर दिए हैं वहीं दूसरी तरफ इसके गलत इस्तेमाल को लेकर भी चिंता बढ़ रही है। AI की मदद से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज और वीडियो का इस्तेमाल करके फर्जी तस्वीरें, वीडियो या आवाज तैयार की जा सकती है। इसका इस्तेमाल धोखाधड़ी और दूसरे अपराधों के लिए भी किया जा रहा है।

 

सबसे बड़ी चिंता यह है कि AI के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए कई जगहों पर अभी तक पर्याप्त और स्पष्ट नियम-कानून नहीं हैं। ऐसे में इस तकनीक के दुरुपयोग को रोकना सरकारों और संबंधित संस्थाओं के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

 

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डीपफेक से होने वाले अपराध

डीपफेक से होने वाले अपराध से पहले हमें यह समझना होगा कि असल में डीपफेक है क्या? यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें  AI और डीप लर्निंग का उपयोग करके किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज या शरीर बदलकर एक नकली लेकिन पूरी तरह असली दिखने वाला वीडियो, ऑडियो या तस्वीर बनाई जाती है। हम सब कभी न कभी इसके शिकार हुए हैं। पारंपरिक अपराधों में अपराधी और पीड़ित सीधे जुड़े होते हैं। AI अपराधों में एक पूरी 'डिजिटल सप्लाई चेन' शामिल होती है। हर स्टेज पर कानूनी लूपहोल मौजूद है। भारत सरकार ने कई नियमों में बदलाव कर इनसे जुड़े लोगों पर शिकंजा कसने का काम किया है लेकिन कमजोर कानून व्यवस्था का फायदा उठाकर अपराधी इससे बच जाते हैं। 

 

इसमें कई हाई टेकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत कंप्यूटर को किसी व्यक्ति के हजारों फोटो और वीडियो या ऑडियो सैंपल देकर ट्रेन किया जाता है। इसके बाद AI उस व्यक्ति के हाव-भाव, बोलने के तरीके और चेहरे की नकल करके नया और अलग कंटेंट तैयार करता है जिसे देखकर असली और नकली का फर्क करना बेहद मुश्किल होता है। इसमें वीडियो और ऑडियो डीपफेक दोनों तरह का इस्तेमाल किया जाता है। 

जिम्मेदार किसे बनाए?

किसी दिन आपको अपने बैंक से मैसेज मिलता है कि आपके खाते से 50 लाख रुपये ट्रांसफर हो चुके हैं। आप पुलिस स्टेशन पहुंचते हैं तो पता चलता है कि बैंक मैनेजर को आपकी ही आवाज में एक फोन कॉल आया था। लेकिन आपने तो कभी फोन किया ही नहीं था। यह काम आपकी आवाज के डीपफेक ने किया था। अब समझने की जरूरत है कि इस अपराध का असली गुनहगार कौन है और किसे सजा मिलनी चाहिए?

 

इसमें 4 कड़िया शामिल है जिन्हें अपराध का दोषी माना जा सकता है। पहला,  AI मॉडल बनाने वाली टेक कंपनी, जिसने आवाज बनाने का टूल बनाया। दूसरा, वह प्लेटफॉर्म या डार्क वेब ऐप जिस पर यह टूल इस्तेमाल हुआ। तीसरा, वह साइबर क्रिमिनल जिसने प्रॉम्प डालकर यह वॉयस क्लोन बनाया और चौथा, वह सोशल मीडिया या टेलीकॉम नेटवर्क जिसके जरिए यह कॉल या ऑडियो पहुंचा। 

 

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इससे अपराध होने पर कानून और विशेषज्ञों के अनुसार जवाबदेही सिर्फ एक पर नहीं होती बल्कि मामले की प्रकृति के आधार पर यूजर, प्लेटफॉर्म और AI कंपनी तीनों की अलग-अलग भूमिकाएं होती हैं। कानूनी और तकनीकी आधार पर इसमें मुख्य दोषी यूजर होता है जिसने यह अपराध किया है। भारतीय कानून (IT एक्ट की धारा 66D, 66E, 67 और की मानहानि व धोखाधड़ी की धाराएं) के तहत सहमति के बिना किसी का चेहरा या आवाज बदलकर ब्लैकमेल करना, ठगी करना या मानहानि करना गैर-जमानती अपराध है। इसके बाद जिम्मेदारी प्लेटफॉर्म यानी सोशल मीडिया की आती है। IT नियम 2021 के तहत अगर प्लेटफॉर्म शिकायत मिलने के बाद समय पर गैर-कानूनी कंटेंट को हटाने में विफल रहता है तो उसे भी सह-आरोपी बनाया जा सकता है।

 

इसके बाद नंबर आता है AI टूल बनाने वाली कंपनी। कंपनी सीधे तौर पर तब तक दोषी नहीं मानी जाती जब तक कि उसने जानबूझकर नुकसान पहुंचाने वाला टूल न बनाया हो। 2026 की नई व्यवस्था के तहत यदि कोई प्लेटफॉर्म 2-4 घंटे के भीतर शिकायत मिलने पर डीपफेक नहीं हटाता या उस पर वॉटरमार्क/लेबल नहीं लगाता, तो वह भी सह-आरोपी माना जा सकता है। टूल का इस्तेमाल करने वाला यूजर ही असली मुजरिम है लेकिन इसे पकड़ें कैसे? VPN, डार्कनेट और ओपन-सोर्स AI मॉडल के कारण मुख्य आरोपी का आईपी एड्रेस ढूंढना बेहद मुश्किल होता है। जब तक आरोपी की पहचान होती है तब तक डिजिटल सबूत डिलीट हो चुके होते हैं।

 

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कानून क्या कहता है?

भारत सरकार और चुनाव आयोग (ECI) ने हाल के चुनावों और वित्तीय अपराधों के बाद इस पर अपना रुख सख्त किया है। चुनाव के दौरान AI कंटेंट को राजनीतिक दलों के लिए स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य किया गया है। बिना डिस्क्लेमर वाले डीपफेक कंटेंट पर सीधे चुनाव आचार संहिता और IT Act के तहत कार्रवाई का प्रावधान है। नए नियमों में प्लेटफॉर्म्स को इन मामलों के लॉग्स और मेटाडेटा कम से कम 180 दिनों तक सुरक्षित रखने के कड़े निर्देश दिए गए हैं ताकि कोर्ट में इसे सबूत के तौर पर पेश किया जा सके।

 

इन सब के बीच हम यह कोशिश कर रहे हैं कि जिसकी भी गलती हो वह साबित हो जाए और उसे सजा दे दी जाएं। लेकिन इन सब में जिस व्यक्ति की साख, तस्वीरें या जीवन भर की कमाई एक AI कोड की वजह से बर्बाद हो गई, उसकी भरपाई कौन करेगा? AI से हुआ अपराध किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं बल्कि 'सिस्टम की विफलता' है। जब तक भारत का कानून AI मॉडल से लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म तक हर कड़ी पर जिम्मेदारी और जुर्माना तय नहीं करता है तब तक इस पर सही तरीके से समाधान नहीं निकलेगा। 


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