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हिमालय की ग्लेशियल झीलों पर कैसे रखी जाती है नजर? सैटेलाइट से सर्वे तक समझिए

हिमालय की ग्लेशियल झीलों पर सैटेलाइट और ग्राउंड सर्वे से नजर रखी जाती है। खतरा बढ़ने पर अर्ली वार्निंग सिस्टम से समय रहते अलर्ट दिया जाता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर, Photo Credit- Gemini

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हिमालय की ग्लेशियल झीलों को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ी है। 14 सितंबर की रॉयटर्स की रिपोर्ट में बताया गया कि हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और भारत में करीब 200 ग्लेशियल झीलों को ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। इनमें 56 झीलों को ‘बहुत ज्यादा जोखिम’ वाली बताया गया है। ऐसी झीलों से अगर अचानक पानी नीचे की ओर बहने लगे तो इसे ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। इससे पहाड़ों के नीचे बसे इलाकों में अचानक बाढ़ आ सकती है और सड़क, पुल और दूसरी जरूरी सुविधाओं को नुकसान पहुंच सकता है।

 

हालांकि सवाल यह है कि इतनी ऊंचाई पर मौजूद इन झीलों पर नजर कैसे रखी जाती है? हर झील तक बार-बार पहुंचना आसान नहीं होता। इसलिए पहले सैटेलाइट की मदद से झीलों में हो रहे बदलाव देखे जाते हैं और जरूरत पड़ने पर जमीन पर जाकर भी जांच की जाती है। भारत में केंद्रीय जल आयोग (CWC) और राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग केंद्र (NRSC) इस काम में सैटेलाइट डेटा और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

 

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सैटेलाइट से झीलों पर नजर

हिमालय के कई इलाके बहुत ऊंचे और मुश्किल जगहों पर हैं। ऐसे में सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों की मदद से झील और उसमें मौजूद पानी में हुए बदलाव को देखा जाता है। पुरानी और नई तस्वीरों को मिलाकर देखा जाता है कि झील में पानी बढ़ रहा है या नहीं। इससे यह भी पता चलता है कि झील में पानी अचानक बढ़ रहा है या धीरे-धीरे। ISRO ने 1984 से 2023 तक के सैटेलाइट डेटा से हिमालय की ग्लेशियल झीलों में हुए बदलावों को देखा। इस दौरान 676 झीलों का आकार बढ़ा हुआ मिला।

 

CWC भी सैटेलाइट की मदद से ग्लेशियल झीलों और दूसरी पानी वाली जगहों पर नजर रखता है। खासकर जून से अक्टूबर के बीच इनकी निगरानी की जाती है क्योंकि इस समय बर्फ पिघलने और बारिश से झीलों में पानी बढ़ सकता है। अगर किसी झील में पानी 40 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ता दिखे तो उस पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है और आगे जांच की जाती है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि झील जरूर फटेगी।

 

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जमीन पर जाकर होती है जांच

सैटेलाइट से झील में हुए बदलाव का पता चल जाता है लेकिन इससे हर जानकारी नहीं मिलती। झील कितनी गहरी है, उसे रोकने वाली मिट्टी-पत्थरों की दीवार कितनी मजबूत है और अगर पानी अचानक बाहर निकला तो किस रास्ते से नीचे जाएगा यह जानने के लिए जमीन पर जाकर जांच की जाती है।

 

इसीलिए ज्यादा जोखिम वाली कुछ झीलों का ग्राउंड सर्वे भी किया जाता है। इसमें झील की गहराई, पानी की स्थिति और आसपास की बर्फ, मिट्टी और चट्टानों को देखा जाता है। यह भी देखा जाता है कि झील को रोकने वाली दीवार में कोई दरार या कमजोरी तो नहीं है। जरूरत पड़ने पर ड्रोन और दूसरी तकनीकों की मदद भी ली जाती है।

 

भारत में ऐसी झीलों की निगरानी भी बढ़ाई गई है। CWC अब 2,843 ग्लेशियल झीलों और दूसरी पानी वाली जगहों पर नजर रखता है। इनमें 2,485 ग्लेशियल झीलें हैं। हालांकि इन सभी झीलों को खतरनाक नहीं माना जाता। किसी झील का खतरा कितना है यह देखते समय उसके आकार, पानी की मात्रा, उसे रोकने वाली दीवार, आसपास के इलाके और नीचे मौजूद बस्तियों को भी देखा जाता है।

खतरा दिखे तो ऐसे मिलता है अलर्ट

अगर किसी झील में खतरे के संकेत मिलते हैं तो सिर्फ उस पर नजर रखना काफी नहीं होता। ऐसी जगहों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाया जा सकता है। इसमें मौसम और पानी की जानकारी लेने वाले उपकरण, सैटेलाइट डेटा और लोगों तक सूचना पहुंचाने की व्यवस्था शामिल होती है।

 

इसका मकसद झील में पानी तेजी से बढ़ने या किसी और बदलाव की जानकारी समय रहते देना है। इसके बाद संबंधित विभाग नीचे के इलाकों में रहने वाले लोगों को सावधान कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें सुरक्षित जगह ले जाने की तैयारी कर सकते हैं। सरकार के GLOF कार्यक्रम में भी ज्यादा जोखिम वाली झीलों की पहचान और अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम किया जा रहा है।

 

यानी ग्लेशियल झीलों पर नजर रखने का काम सिर्फ सैटेलाइट की तस्वीरों तक सीमित नहीं है। पहले सैटेलाइट से बदलाव देखा जाता है फिर जरूरत पड़ने पर जमीन पर जांच की जाती है और खतरा ज्यादा होने पर चेतावनी की व्यवस्था की जाती है। इसका मकसद खतरा बढ़ने से पहले लोगों को सावधान करना और बचाव की तैयारी करना है।

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