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ईमेल से इंटरनेट तक, डिजिटल लाइफ हर रोज पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रही?

हम बिना कुछ सोचे समझे हर रोज अपनी डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करते रहते हैं। हमें लगता है कि इन सुविधाओं की कीमत सिर्फ पैसों में चुका रहे हैं लेकिन इसकी कीमत पैसों से कहीं ज्यादा चुका रहे हैं।

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सांकेतिक तस्वीर, Photo Credit: AI

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हर साल की तरह इस साल भी 22 अप्रैल यानी आज वर्ल्ड अर्थ डे मनाया जा रहा है। इस साल का थीम है  'अवर पावर, अवर प्लैनेट' है यानी हमरा ग्रह (पृथ्वी) ही हमारी शक्ति है। पूरी दुनिया में इस थीम के साथ अर्थ डे मनाया जा रहा है लेकिन तेजी से बदलती दुनियाम में हमारी छोटी-छोटी गतिविधियां भी हमारी पृथ्वी को नुकसान पहुंचा रही हैं। यहां तक की आपकी फोन में जो ईमेल ओपन है उस ईमेल से भी पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। हमरी हर रोज की डिजिटल एक्टिविटी से हमारे पर्यावरण को नुकसान हो रहा है। आपके मन में सवाल होगा कि यह कैसे संभव है?

 

आपकी हर एक ऑनलाइन एक्टिविटी की एक कीमत होती है जो जिसे हमारी पृथ्वी और हमारा पर्यावरण चुकाता है। इलेक्ट्रोनिक डिवाइस को चलाने से लेकर वायरलेस नेटवर्क चलाने तक हर एक काम के लिए पावर यानी ऊर्जा की जरूरत होती है और इस ऊर्जा से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होती है। 

 

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ईमेल से पर्यावरण को कैसा खतरा?

हमारी ईमेल पर हमारा डेटा सुरक्षइत रहता है। आमतौर पर जो भी जरूरी डॉक्यूमेंट की जरूरत हमें होती है हम उस डॉक्यूमेंट को ईमेल पर स्टोर करके रखते हैं। दुनियाभर में हर दिन अरबों ईमेल भेजे जा रहे हैं और यह सारे एक जगह सुरक्षित हैं। यह सारे ईमेल डेटा सेंटर्स में संग्रहित होते हैं, जिन्हें चलाने के लिए बड़े स्तर पर बिजली का इस्तेमाल किया जाता है। इस बिजली का एक बड़ा हिस्सा कार्बन उत्सर्जन करने वाले सोर्स से आता है। मैकएफे और आईसीएफ इंटरनेशनल के अनुसार, हर स्पैम ईमेल 0.3 ग्राम सीओटू उत्सर्जित करता है। वहीं, साधारण ईमेल 50 ग्राम सीओटू उत्सर्जित करता है। 

डिजिटल लाइफ प्रदूषण की वजह

क्लाउड का इस्तेमाल आजकल व्यापक स्तर पर हो रहा है। आपको जानकर हैरानी होगी की क्लाउड भी हमारे पर्यावरण के लिए खतरना बना हुआ है। क्लाउड का सर्वर ठंडा रखने के लिए करोड़ों लीटर पानी खर्च होता है। डिजिटल बेडरॉक के अनुसार, एक मध्यम डेटा सेंटर को एक दिन में 11 लाख लीटर पानी लगता है। अगर आप क्लाउड स्टोरेज से गैर-जरूरी डेटा डिलीट करते हैं तो आप पानी बचा सकते हैं। इसके साथ ही सेलुलर डेटा यानी आपके फोन में चलने वाला इंटरनेट भी पर्यावरण के लिए खतरा बन रहा है। 

 

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जितना जहाजों से प्रदूषण उतना गैजेट्स से

इंटरनेट बेस्ड बड़ी कंपनियों जैसे कि गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आदि के अपने डाटा सेंटर हैं, जिनमें सैकड़ों-हजारों की संख्या में सर्वर का इस्तेमाल होता है। इनके माइक्रोप्रोसेसर बड़ी मात्रा में ऊर्जा की खपत करते हैं और उनसे वातावरण में गर्मी पैदा होती है। गूगल ने 2012 में ही माना था कि उसके हर सर्च पर 0.2 ग्राम कार्बन उत्सर्जित होता है। 

 

कुछ अनुमानों के अनुसार, हमारे गैजेट्स, इंटरनेट और सपोर्टिंग सिस्टम का कार्बन फुटप्रिंट ग्लोबल ग्रीनहाउस उत्सर्जन का लगभग 3.7 फीसद है। यह वैश्विक स्तर पर एयरलाइन इंडस्ट्री के समान है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस इंटरनेट और ईमेल को हम फ्री समझते हैं उस इंटरनेट के इस्तेमाल से हमारे पर्यावरण को किस स्तर पर नुकसान हो रहा है। 

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