एडिलेड यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने बिजली और सोडियम क्लोराइड का इस्तेमाल कर यूरिया से हाइड्राजीन बनाने का एक नया तरीका खोजा है। हाइड्राजीन एक जरूरी इंडस्ट्रियल केमिकल है, जिसका इस्तेमाल रॉकेट फ्यूल और दवाइयों को बनाने में किया जाता है। खास बात यह है कि इस तकनीक में इंसानी पेशाब और गंदे पानी (वेस्टवॉटर) से मिलने वाले यूरिया का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
इससे हाइड्राजीन बनाने का एक ऐसा तरीका मिल सकता है, जो पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाएगा। एक्सपर्ट्स का कहना है कि जिस चीज को अभी तक कचरा समझकर फेंका जाता था, उसे अब एक कीमती केमिकल बनाने के काम में लाया जा सकेगा।
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पहले समझें क्या है हाइड्राजीन
नेचर सिंथेसिस में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, हाइड्राजीन एक जरूरी इंडस्ट्रियल केमिकल है, जिसका इस्तेमाल कई क्षेत्रों में होता है। इसका इस्तेमाल रॉकेट फ्यूल और दवाइयों को बनाने में किया जाता है, साथ ही रिसर्चर नई एनर्जी सिस्टम और इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी टेक्नोलॉजी में भी इसकी भूमिका पर रिसर्च कर रहे हैं। बता दें कि हाइड्राजीन बनाने के मौजूदा तरीकों में पर्यावरण और खर्च से जुड़ी कई समस्याएं हैं। इनमें खतरनाक केमिकल का इस्तेमाल होता है और काफी ज्यादा ऊर्जा भी लगती है।
एडिलेड यूनिवर्सिटी के डॉ. पेंगटांग वांग ने कहा कि अगर हाइड्राजीन बनाने का कोई आसान और नया तरीका विकसित होता है, तो इसका उत्पादन ज्यादा सस्ता और पर्यावरण के लिए बेहतर हो सकता है। यह हाइड्राजीन के हरित और किफायती उत्पादन की दिशा में एक बड़ा कदम होगा।
कैसे इस्तेमाल होगा इंसानी यूरिन?
इस रिसर्च में यूरिया सबसे अहम चीज है। यूरिया एक ऐसा पदार्थ है, जो इंसानी पेशाब में प्राकृतिक रूप से काफी मात्रा में पाया जाता है। ऐसे में यूरिया से भरपूर वेस्ट को फेंकने वाली चीज मानने के बजाय, रिसर्चर ने यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या इसका इस्तेमाल हाइड्राजीन बनाने के लिए कच्चे माल के रूप में किया जा सकता है। वांग के मुताबिक, यूरिया को फीडस्टॉक के तौर पर इसलिए चुना गया क्योंकि यह इंसानी पेशाब में भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
टीम ने शुद्ध यूरिया, यूरिया से भरपूर वेस्टवॉटर और इंसानी पेशाब का इस्तेमाल करके अपने तरीके को टेस्ट किया और दिखाया कि यह तरीका अलग-अलग स्रोतों के साथ काम कर सकता है। इससे यह रिसर्च सस्टेनेबिलिटी के नजरिए से खास तौर पर दिलचस्प हो जाती है। अगर इसे और विकसित किया जाए, तो यूरिया वाले वेस्ट स्ट्रीम केमिकल उत्पादन के लिए कच्चे माल का स्रोत बन सकते हैं।
यह तरीका यूरिया को हाइड्राजीन में कैसे बदलती है?
इसके लिए रिसर्चर ने एक इलेक्ट्रोकेमिकल प्रक्रिया का इस्तेमाल किया, जिसका मतलब है कि बिजली केमिकल रिएक्शन को चलाती है। सोडियम क्लोराइड, या साधारण नमक, इसमें अहम भूमिका निभाता है। रिसर्चर के अनुसार, यह क्लोरीन स्पीशज बनाता है जो इलेक्ट्रोड की सतह से जुड़ जाती हैं। ये क्लोरीन स्पीशीज यूरिया के साथ रिएक्शन करके N-क्लोरोयूरिया बनाती हैं। इसके बाद यह इंटरमीडिएट एक आसान हाइड्रोलिसिस प्रक्रिया से गुज़रता है, जिससे हाइड्राजीन बनता है।
टीम ने हाइड्राज़ीन का ज़्यादा उत्पादन हासिल किया और दिखाया कि यह तरीका अलग-अलग यूरिया स्रोतों के साथ काम करता है। आसान शब्दों में कहें तो, रिसर्चर्स ने बिजली का इस्तेमाल करके कचरे में आसानी से मिलने वाले एक कंपाउंड को कमर्शियल रूप से जरूरी केमिकल में बदलने का तरीका खोज लिया है।
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रॉकेट फ्यूल और ऊर्जा के लिए मायने
हाइड्राजीन का इस्तेमाल रॉकेट के ईंधन में लंबे समय से होता आया है, साथ ही फ्यूल सेल, स्पेस मिशन और इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी में भी इस पर रिसर्च चल रही है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि पेशाब से अभी सीधे कार चलाई जा सकती है, यह केवल एक संभावित नया रास्ता है, जो बड़े स्तर पर अपनाए जाने पर आगे चलकर काम आ सकता है।
यह तरीका अभी रिसर्च के चरण में ही है। नमक का जमाव और हाइड्राजीन को अलग करने में लगने वाली ऊर्जा जैसी दिक्कतें अभी बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में रुकावट बनी हैं। आगे की रिसर्च लागत घटाने और बेहतर रिएक्टर डिजाइन पर होगी। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि अगर इसे रिन्यूएबल बिजली से चलाया जाए, तो यह हाइड्राजीन बनाने का एक टिकाऊ और सस्ता तरीका बन सकता है।