दिल्ली के भारत मंडपम में देश का सबसे बड़ा पुस्तक मेला एक बार फिर किताबों के शौकीनों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है। हर साल आयोजित होने वाला यह प्रतिष्ठित पुस्तक मेला इस बार 10 जनवरी से शुरू होकर 18 जनवरी तक चलेगा। नौ दिनों तक चलने वाले इस मेले में देश-विदेश के लाखों पाठकों, लेखकों, प्रकाशकों और विद्यार्थियों के पहुंचने की उम्मीद है।
इस भव्य पुस्तक मेले में दुनिया भर के लगभग सभी प्रमुख प्रकाशनों की किताबें एक ही छत के नीचे उपलब्ध हैं। साहित्य, इतिहास, विज्ञान, राजनीति, दर्शन, बच्चों की किताबें, प्रतियोगी परीक्षाओं की सामग्री, आत्मकथाएं और शोध आधारित पुस्तकों से लेकर आधुनिक फिक्शन तक, हर विषय की किताबें यहां पाठकों को आकर्षित कर रही हैं। कई अंतरराष्ट्रीय प्रकाशक भी अपने खास संस्करण और नई किताबों के साथ मेले में मौजूद हैं। खास बात यह है कि इस मेले में ऐसी कई किताबें भी उपलब्ध हैं, जिन्हें बड़े लेखक, शिक्षाविद और विचारक पढ़ने की सलाह देते रहे हैं। आइए जानते हैं उन पांच खास किताबों के नाम जिन्हें लोग सबसे ज्यादा पढ़ने की सलाह देते हैं।
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पांच मशहूर किताबें
शेखर: एक जीवनी
लेखक: अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’)
प्रकाशन: भारतीय ज्ञानपीठ (बाद में राजकमल प्रकाशन से भी संस्करण उपलब्ध)
कहानी का सार:
यह उपन्यास एक व्यक्ति शेखर के जीवन के माध्यम से आत्मसंघर्ष, विद्रोह, स्वतंत्र सोच और आधुनिक मनुष्य की मानसिक उलझनों को सामने लाता है। यह परंपरागत समाज, नैतिकता और रूढ़ियों के खिलाफ एक बौद्धिक संघर्ष की कहानी है। शेखर अपने विचारों और आत्मबोध की तलाश में जीवन के हर मोड़ से गुजरता है।
देवदास
लेखक: शरतचंद्र चट्टोपाध्याय
प्रकाशन: हिंदी में प्रमुख संस्करण – राजकमल प्रकाशन
कहानी का सार:
देवदास और पारो की प्रेम कहानी सामाजिक बंधनों और अहंकार की भेंट चढ़ जाती है। पारो की शादी कहीं और हो जाती है और देवदास आत्मविनाश के रास्ते पर चल पड़ता है। यह उपन्यास असफल प्रेम, पछतावे और टूटे हुए इंसान की दर्दभरी कहानी है।
गुनाहों का देवता
लेखक: धर्मवीर भारती
प्रकाशन: भारतीय ज्ञानपीठ
कहानी का सार:
यह सुधा और चंदर के निश्छल लेकिन अधूरे प्रेम की कहानी है। सामाजिक मर्यादाएं और परिस्थितियां उनके प्रेम के आड़े आती हैं। यह उपन्यास त्याग, मौन प्रेम और आत्मसंयम की गहरी भावनाओं को बेहद संवेदनशील तरीके से प्रस्तुत करता है।
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चित्रलेखा
लेखक: भगवतीचरण वर्मा
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन
कहानी का सार:
यह उपन्यास पाप और पुण्य की परिभाषा पर सवाल उठाता है। चित्रलेखा एक नर्तकी है, जिसे समाज पाप की दृष्टि से देखता है, जबकि कई तथाकथित धर्मात्मा भीतर से पतित हैं। कहानी बताती है कि पाप-पुण्य कर्म से नहीं, नीयत से तय होते हैं।
उसने कहा था
लेखक: चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’
प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन (मूल रूप से ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित)
कहानी का सार:
यह एक अमर प्रेम कहानी है, जिसमें एक युवक अपने बचपन के प्रेम को जीवनभर निभाता है। युद्ध के मैदान में वह अपनी जान देकर अपने प्रेम की रक्षा करता है। यह कहानी त्याग, सच्चे प्रेम और बलिदान की मिसाल मानी जाती है।