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पेंगुइन का डेथ मार्च देख भावुक लोग किस बला के शिकार? कहानी एंथ्रोपोमोर्फिज्म की

निहिलिस्ट पेंगुइन की क्लिप, सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है। लोग इसे देखकर तरह-तरह के कयास लगा रहे हैं। क्या है इसका मतलब, क्यों चर्चा में है, पढ़ें अपने हर सवाल का जवाब।

Nihilist Penguin

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हम दार्शनिक होते नहीं, हमारी आसपास घट रहीं तमाम घटनाएं, हमें ऐसा सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं। सोशल मीडिया पर वायरल 'निहिलिस्ट पेंगुइन' की कहानी कुछ ऐसी ही है। एक पेंगुइन है, जो अपने साथियों को छोड़कर उस तरफ भाग रहा है, जहां से उसका लौटकर आना नामुमकिन है। वह अपने साथियों को छोड़ देता है, एकांत की तरफ भागता है। बर्फीले पहाड़, सामने मौत लेकिन वह सबसे बेपरवाह होकर अपनी धुन में, मौत को गले लगाने के लिए भाग रहा है। 

वायरल पेंगुइंग को लोग 'निहिलिस्ट पेंगुइन' के नाम से बुला रहे हैं, भावुक हो रहे हैं, अपना दर्द साझा कर रहे हैं। कुछ लोगों को लग रहा है कि यह उनकी कहानी है, वह अपनों को छोड़कर, एक अलग ही दुनिया में आ गए हैं, जहां से उन्हें सिर्फ छोड़ना ही सही रास्ता लगता है। 

आखिर क्यों लाखों लोग इस पेंगुइन के वीडियो को देखकर भावुक हो रहे हैं? क्या इसमें हमारे अपने जीवन का कोई बड़ा सबक छिपा है? आइए समझते हैं-

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क्या है वायरल वीडियो की कहानी?

यह वीडियो मशहूर फिल्म निर्माता वर्नर हर्जोग की 2007 में आई डॉक्यूमेंट्री 'Encounters at the End of the World' का एक सीन है। पेंगुइन का एक बड़ा झुंड समुद्र की ओर जा रहा है, जहां उन्हें भोजन और जीवन मिलेगा। उन्हीं में से एक पेंगुइन अचानक रुकता है, मुड़ता है और विपरीत दिशा में मौजूद विशाल पहाड़ों की ओर चलना शुरू कर देता है।

वहां न खाना है, न पानी और न ही उसके साथी। वर्नर हर्जोग ने इसे 'डेथ मार्च' कहा था। साल 2007 में यह डॉक्यूमेंट्री आई थी।डॉक्यूमेंट्री में वह बताते है कि पेंगुइन वापस नहीं लौटेगा। वह तब तक चलता रहेगा जब तक कि भूख या थकान से उसकी जान न चली जाए।

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सोशल मीडिया पर क्यों ट्रेंड कर रहा है?

इंटरनेट की दुनिया ने इस पेंगुइन को एक दार्शनिक बना दिया है। लोगों ने इसे 'निहिलिस्ट'नाम दिया है। निहिलिस्ट को हिंदी में शून्यवादी कहते हैं। ऐसा सिद्धांत, 19वीं सदी के रूस में इवान तुर्गेनेव की वजह से चर्चा में आया था। इस दर्शन में व्यक्ति मानता है कि जीवन का कोई अर्थ नहीं है, मकसद नहीं है, मूल्य नहीं है। यह दर्शन, नैतिकता, ज्ञान और सामाजिक मूल्यों को कृत्रिम मानता है, यह निराशा, संशयवाद और अस्तित्व की निर्रथकता से जुड़ी विचारधारा है।

क्या लिख रहे हैं लोग?

अलग-अलग मानसिक स्थिति से गुजर रहे लोगों को इस पेंगुइन में अलग-अलग दर्शन भी दिख रहे हैं। कुछ लोग लिख रहे हैं कि जब आप जिंदगी से थक चुके हों तो आप अंतिम विश्राम की ओर भागते हैं। कुछ लोग लिख रहे हैं कि शोर-शराब से थककर, एकांत में खुद को जानने के लिए बेताब परिंदा। कुछ लोग कह रहे हैं कि पेंगुइन, इंसानों से ज्यादा विरक्त होते हैं। कुछ लोग लिख रहे हैं कि हर भागदौड़ का अंतिम पड़ाव मौत है, पेंगुइन ने वही चुना है, जो सही है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह पेंगुइन की खामोश बगावत है। 

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क्यों भटकते हैं पेंगुइन, विज्ञान क्या कहता है?

वैज्ञानिकों का मानना है कि पेंगुइन का यह व्यवहार, उसकी मानसिक स्थिति की वजह से नहीं, दूसरे कारणों पर निर्भर हो सकते हैं। पेंगुइन इंसानों की तरह नहीं सोचता है। वे प्राकृतिक संकेतों के आधार पर चलते हैं। कई बार कुछ वजहों से वे दिशा का ज्ञान खो देते हैं। कुछ पेंगुइन, दिमाग में किसी संक्रमण या चोट की वजह से अजीब व्यवहार करने लगते हैं और झुंड से बिछड़ जाते हैं। ब्रीडिंग सीजन के दौरान भी उनमें भटकाव देखने को मिलता है। 

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क्यों लोग इसे खुद से जोड़कर देख रहे हैं?

हम इंसान हैं, सोच सकते हैं इसलिए हर घटना के मानवीकरण की कोशिश करते हैं। जानवर के व्यवहार में इंसानी नजरिया देखने का दर्शन 'एंथ्रोपोमोर्फिज्म' कहा जाता है। इस विचारधारा के प्रवर्तक यूनानी दार्शनिक जेनोफेन्स कहे जाते हैं। लोग पेंगुइंग के व्यवहार में इंसानी समानताएं और अपनी भावनाएं देख रहे हैं। मानवीय गुणों को जानवरों पर थोप रहे हैं। 

पेंगुइंग शायद रास्ता भटक गया है या बीमार है लेकिन उसे बागी की तरह लोग देख रहे हैं, जो समाज के नियमों को ताक पर रखकर अलग दिशा की ओर बढ़ रहा है। कुछ लोग लिख भी रहे हैं कि 'निहिलिस्ट पेंगुइन' की कहानी उस पेंगुइन के बारे में कम और हमारे बारे में ज्यादा है। यह दिखाता है कि हम कितने अकेले और थके हुए हैं कि एक भटकते हुए जानवर में भी हमें अपना हमदर्द नजर आता है। 

 

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