आज के शेयर बाजार में और साल 2003 से 2005 का शेयर बाजार बिल्कुल अलग हुआ करता था। उस दौर में जब भी कोई नई कंपनी अपना IPO लेकर आती तो ब्रोकर ऑफिसों के बाहर चेक जमा करने वालों की लंबी कतारें लग जाती थीं। इस सीधी-सादी दिखती भीड़ के पीछे कुछ दिमाग ऐसे भी थे जो नियमों की ढील का फायदा उठाकर करोड़ों रुपये का हेरफेर कर रहे थे। साल 2003 में शेयर बाजार में एक ऐसा खेल सामने आया जिससे पूरे शेयर बाजार में हड़कंप मच गया था। इस पूरे खेल का केंद्र मुंबई के दलाल बने जिनमें मुख्य रूप से रूपाण शाह और उनके साथियों का नाम सामने आया। इस घोटाले के सामने आने के बाद SEBI ने कई नियम बदले जिससे इन पर रोक लग सकी। 

 

रूपल पंचाल और उनके साथियों ने IPO में ज्यादा से ज्यादा शेयर हासिल करने के लिए इन लोगों ने फर्जी नामों, पतों और तस्वीरों के जरिए हजारों नकली बैंक और डीमैट अकाउंट खोल दिए। जब भी कोई नया IPO आता तो इन फर्जी खातों से भारी संख्या में बोलियां लगा दी जाती थीं। शेयर अलॉट होने के बाद इन्हें मुख्य खातों में ट्रांसफर करके ऊंचे दामों पर बेच दिया जाता था। इससे आम रिटेल निवेशकों को खाली हाथ रहना पड़ता था।

IPO में कैसे होता था खेल?

उस समय की व्यवस्था में दो बड़ी खामियां थीं। पहला, IPO आवेदन करते समय तुरंत पैसे नहीं कटते थे। साथ ही चेक क्लीयर होने में समय लगता था। दूसरा, डीमैट खाते या IPO आवेदन के लिए पैन कार्ड जरूरी नहीं था। इसी ढील का फायदा उठाकर एक ही व्यक्ति दर्जनों अलग-अलग नामों से आवेदन कर देता था।

 

यह भी पढ़ें: खस्ताहाल चल रहा शेयर मार्केट, इस समय म्यूचुअल फंड में पैसे डालें या नहीं?

 

रूपल शाह नाम की महिला का किया गया यह घोटाला वास्तव में शेयर ऑपरेटरों का एक संगठित नेटवर्क था। इस नेटवर्क ने फर्जी पहचानों का सहारा लेकर आम निवेशकों के हक के रिटेल कोटे पर अवैध कब्जा जमा लिया था।

घोटाला सामने आने के बाद SEBI के तीन बड़े फैसले

जब इस गड़बड़ी की जांच हुई और सच सामने आया तो SEBI ने व्यवस्था को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के लिए दो कड़े कदम उठाए। पहला, घोटालेबाज एक ही पहचान पर अलग-अलग नामों से खाते खोल लेते थे। SEBI ने इस पर रोक लगाने के लिए डीमैट और ट्रेडिंग खातों के लिए पैन कार्ड को पूरी तरह अनिवार्य कर दिया। चूंकि एक व्यक्ति का एक ही पैन कार्ड होता है इसलिए फर्जी नामों से कई खाते खोलने का रास्ता बंद हो गया। दूसरा, पहले बिना खाते में पर्याप्त राशि हुए भी चेक के दम पर बोलियां लगा दी जाती थीं। इसे रोकने के लिए ASBA (Application Supported by Blocked Amount) प्रणाली लागू की गई। अब IPO में बोली तभी दर्ज होती है जब आवेदक के बैंक खाते में उतनी रकम मौजूद हो और वह राशि ब्लॉक कर दी जाए।

 

यह भी पढ़ें: लार्जकैप से स्मॉलकैप तक, शेयर बाजार की इन कैटेगरी में क्या है बड़ा अंतर?

 

 

ASBA सीस्टम के जरिए किसी नॉन-सीरियस इंवेस्टर को हटाना बहुत आसान हो जाता है। जैसे अगर किसी के बैंक अकाउंट में 1 लाख तक की राशि हैै और उसने किसी कंपनी के 10000  वैल्यू की कीमत वाले शेयर खरीदे हैं तो उसके खाते में 10000 रुपये ब्लॉक कर दिया जाएगा और बाकि के 90000 से वह अपने रोजमर्रा के चीजों में खर्च कर सकता है। अगर उसे शेयर मिला तो लॉक की हुई राशि उसके अकाउंट से कट जाएगी और अगर नहीं मिली तो वह अनलॉक हो कर फिर से उसके लिए उपयोगी हो जाएंगे। 

 

साल 2003 से 2005 के बीच हुआ 'IPO Demat Scam' भारतीय शेयर बाजार के इतिहास की सबसे शातिर धोखाधड़ी में से एक था। इसके बाद SEBI के उठाए गए सख्त कदमों ने भारतीय शेयर बाजार को मजबूत बनाया। आज के समय में डिजिटल तकनीक, पैन अनिवार्य करने और ASBA जैसी व्यवस्थाओं के कारण कोई भी आम निवेशक बिना किसी धोखाधड़ी के डर के पूरी पारदर्शिता के साथ IPO प्रक्रिया में हिस्सा ले सकता है।