दिव्यांग बच्चों को अपने पूरे जीवन में खासकर शुरुआती दौर में खास सुविधाओं की जरूरत होती है। वे सामान्य बच्चों से अलग होते हैं और उनको पढ़ाने के लिए भी सामान्य शिक्षक से अलग ट्रेनिंग की जरूरत होती है। ऐसे बच्चों की सीखने की जरूरत, बात करने का तरीका और सीखने की क्षमता काफी अलग-अलग हो सकती है। इसलिए उनके लिए अच्छे से ट्रेनड स्पेशल एजुकेटर की जरूरत होती है। 

 

दिव्यांग स्टूडेंट्स को आम टीचर नहीं पढ़ा सकते क्योंकि उनके सीखने का स्तर और तरीका काफी अलग हो सकता है। ऐसे में उनके लिए स्पेशल एजुकेटर्स की जरूरत होती है और इस जरूरत को पूरा करने के लिए हमारे देश में एक सिस्टम बना हुआ है। सिस्टम वैसा ही है जैसा सामान्य टीचर बनने के लिए है लेकिन उसके लिए बस अलग ट्रेनिंग की जरूरत होती है। दिव्यांग बच्चों की स्पेशल एजुकेशन से जुड़े कोर्स और ट्रेनिंग के लिए भारत में भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) के नियमों का पालन किया जाता है।  आरसीआई ही दिव्यांग बच्चों के लिए ट्रेनिंग देता है।  

 

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12वीं के बाद क्या करें?

अगर कोई छात्र 12वीं के बाद इस क्षेत्र में करियर बनाना चाहता है तो D.Ed. स्पेशल एजुकेशन प्रमुख विकल्पों में से एक है। यह आमतौर पर दो साल का ट्रेनिंग कोर्स होता है। आरसीआई की लिस्ट में श्रवण बाधित, दृष्टिबाधित, बौद्धिक एवं विकासात्मक दिव्यांगता और बहु-दिव्यांगता जैसे क्षेत्रों में दो साल के डिप्लोमा कोर्स शामिल हैं। इन कोर्स में सिर्फ किताबी पढ़ाई नहीं होती, बल्कि दिव्यांग बच्चों की जरूरत समझना, उनकी क्षमता के अनुसार पढ़ाने की तकनीक, शिक्षण सामग्री तैयार करना और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग भी दिया जाता है। 

ग्रेजुएशन के बाद क्या विकल्प?

आमतौर पर 12वीं के बाद छात्र ग्रेजुएशन करते हैं और इसके बाद अपने लिए सही करियर चुनते हैं। अगर आपने ग्रेजुएशन कर लिया है तो B.Ed. स्पेशल एजुकेशन एक प्रमुख विकल्प है। आरसीआई की लिस्ट में इसकी अलग-अलग स्पेशलाइजेशन उपलब्ध हैं। इनमें इंटेलेक्चुअल डिसएबिलिटी, हियरिंग इम्पेयरमेंट, विजुअल इम्पेयरमेंट, मल्टीपल डिसएबिलिटीज और ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर जैसे क्षेत्र शामिल हैं। यह कोर्स 2 साल का होता है। छात्र अपनी रुचि के अनुसार स्पेशलाइजेश को चुन सकता है। 

चार साल का इंटीग्रेटेड कोर्स भी

आरसीआई की लिस्ट में इंटीग्रेटेड स्पेशल एंड इनक्लूसिव टीचर एजुकेशन प्रोग्राम (ISITEP) भी शामिल है। इसके तहत बीए, बीएससी या बीकॉम के साथ B.Ed. स्पेशल एजुकेशन को एक साथ पढ़ाया जाता है। यह कोर्स कुल 4 साल का होता है। इसमें अलग-अलग दिव्यांगता विशेषज्ञताओं के साथ स्कूली शिक्षा के अलग-अलग स्तरों के विकल्प भी दिए गए हैं। इसका फायदा यह है कि छात्र ग्रेजुएशन और स्पेशल टीचिंग ट्रेनिंग एक ही कोर्स में पूरा कर सकता है। 

 

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इन बातों का रखें ध्यान

अगर आप दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने के लिए ट्रेनिंग लेना चाहते हैं तो आरसीआई से मान्यता प्राप्त संस्थान में ही दाखिला लेना चाहिए। गैर-मान्यता प्राप्त संस्थान से किया गया कोर्स रोजगार या पेशेवर काम के लिए मान्य नहीं हो सकता। आरसीआई अपनी वेबसाइट पर मान्यता प्राप्त संस्थानों और कोर्स की लिस्ट जारी करता है। एडमिशन लेने से पहले यह जरूर जांच लें कि संबंधित कॉलेज को उसी कोर्स और सेशन के लिए आरसीआई की मान्यता मिली है या नहीं। कोर्स पूरा करने के बाद योग्य उम्मीदवार दिव्यांग बच्चों के लिए बने स्कूलों, दिव्यांग बच्चों के लिए काम करने वाले संस्थानों और पुनर्वास से जुड़े क्षेत्रों में नौकरी मिल सकती है। इसके लिए सरकार भी समय-समय पर नौकरी निकालती रहती है।