कभी कांग्रेस का गढ़ रहे असम ने कांग्रेस को चुनाव-दर-चुनाव हाशिए पर रखा है। लोकसभा चुनाव हों या विधानसभा, कांग्रेस के लिए हर चुनाव मुश्किल रहा है। संगठन बिखर रहा है, जिनके भरोसे, राज्य में कांग्रेस की कमान, आलाकमान ने सौंपी थी, वे ही पार्टी से किनारा कर रहे हैं। भूपेन कुमार बोरा हों या प्रद्युत बोरदोलोई, कांग्रेस छोड़कर लोग भाग रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी (BJP) जिस चेहरे के दम पर राज्य में खुद को सबसे मजबूत मान रही है, वह चेहरा, एक जमाने में कांग्रेस का नबंर 2 चेहरा है। गौरव गोगोई के साथ राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और राहुल गांधी की उपेक्षा की वजह से कांग्रेस से उस चेहरे ने किनारा किया, आज कांग्रेस के लिए चुनौती बनकर खड़ा है।
वह चेहरा कोई और नहीं, मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा हैं। वह पुराने कांग्रेसी हैं, कांग्रेस से नाराज होकर उन्होंने बीजेपी का हाथ पकड़ा था। 10 साल की राजनीति में कैसे कांग्रेस पिछड़ती गई, कांग्रेस, अपने गढ़ में ही कमजोर पड़ती गई, कहां पार्टी चूकी, आइए समझते हैं-
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आखिरी चुनाव, जब मजबूत थी कांग्रेस
साल 2001, 2006 और 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की प्रचंड बहुमत से जीत हुई। सहयोगी दलों को गठबंधन में हिस्सेदारी मिली। केंद्र और राज्य दोनों में कांग्रेस मजबूत स्थिति में थी। दोनों जगहों पर सरकार थी। असम की 126 विधानसभा सीटों में से 78 सीटें, कांग्रेस के खाते में आईं। मुख्य विपक्षी पार्टी, बदरुद्दीन अजमल की ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF) रही। बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (BPF) ने कांग्रेस को समर्थन दिया। असम गण परिषद ने भी 10 सीटें जीत लीं। राज्य में बहुमत का आंकड़ा सिर्फ 64 सीट है। कांग्रेस अकेले बहुमत हासिल कर चुकी थी। भारतीय जनता पार्टी, हाशिए पर रही। सिर्फ 5 सीट पर जीत मिली। तब बीजेपी असम में अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही थी।
3 चुनाव में नंबर 1 पार्टी, फिर 2016 कैसे गंवाया?
2016 में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में सत्ता में आई। बीजेपी ने 60 सीटें हासिल की। यह आंकड़े चौंकाने वाले थे। कांग्रेस के पास 26 सीटें, असम गण परिषद के पास 14 सीटें, AIUDF के पास 13 सीटें और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट ने 12 सीटों पर जीत हासिल की। सर्वानंद सोनोवाल को मुख्यमंत्री बनाया गया। चुनाव से ठीक पहले 23 अगस्त 2015 को सत्ता में आए हिमंत बिस्व सरमा का कद राज्य में बढ़ता गया। वह देखते ही देखते हिंदुत्व के पोस्ट बॉय बन गए।
2021 के चुनाव तक, असम, बीजेपी के कर्ता-धर्ता हिमंत बिस्व सरमा हो गए थे। उनकी मजबूत उपस्थिति, सर्वानंद सोनोवाल पर भारी पड़ने लगी थी। राज्य के सबसे चर्चित नेता हिमंत बिस्व सरमा ने हो गए थे। 2021 का चुनाव ही उन्हीं की अगुवाई में लड़ा गया। 2021 में भी बीजेपी ने 60 सीटें हासिल की। कांग्रेस ने 29 सीट हासिल की। AIUDF ने 16 सीटों पर जीत दर्ज की। असम गण परिषद ने 9 सीटों पर जीत हासिल की। यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल ने 6 सीटें हासिल की। बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन ने जीत हासिल की।
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कांग्रेस कहां चूकती गई?
साल 2016 का विधानसभा चुनाव, 3 चुनावों में प्रचंड बहुमत से सत्ता में रहने वाली कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा। जिस कांग्रेस ने 2011 के चुनाव में 78 सीटें जीती थी, वह पार्टी, सिर्फ 26 सीट पर सिमट गई। तरुण गोगोई अपना जनाधार खोने लगे थे। राज्य में बीजेपी का उदय होने लगा था।
हिमंत बिस्वा सरमा का झटका, कांग्रेस पर भारी पड़ा
हिमंत बिस्व सरमा, केंद्र और नरेंद्र मोदी सरकार के धुर आलोचक थे। उनका जाना, कांग्रेस को अंदर से कमजोर कर गया। तरुण गोगोई सरकार में वह अहम पद पर रहे, पार्टी के मुख्य रणनीतिकार और संकटमोचक माने जाते थे। राहुल गांधी और गौरव गोगोई से अनबन के बाद उन्होंने कांग्रेस से किनारा किया और 2015 में चुनाव से ठीक पहले, बीजेपी का हाथ थाम लिया।
उनके जाने से कांग्रेस कमजोर पड़ गई। उन्होंने दावा किया था कि सोनिया गांधी ने उन्हें सीएम बनाने का वादा किया था लेकिन राहुल गांधी को यह मंजूर नहीं था। राजनीति में हाशिए पर रहने के बाद, वह कांग्रेस से अलग हो गए। उन्होंने सेक्युलर राजनीति से किनारा किया और हिंदुत्व पर ऐसी राजनीति शुरू की, जिसने कांग्रेस को कमजोर कर दिया।
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'असमिया अस्मिता' और घुसपैठ के दांव ने बदला खेल
बीजेपी ने 'जाति, माटी और भेटी' का नारा देकर खुद को स्वदेशी असमिया लोगों को अपने पक्ष में किया। हिमंत बिस्व सरमा, मुखर होकर कैंपेनिंग शुरू की थी। सर्वानंद सोनोवाल का बढ़-चढ़कर उन्होंने साथ दिया। खुद को असम के रक्षक के रूप में पेश किया। कांग्रेस पर अक्सर अवैध प्रवासियों के प्रति नरम रुख रखने के आरोप लगते रहे हैं। असमिया जनजाति और असम के लोगों ने कांग्रेस पर संदेह किया। अवैध बांग्लादेशियों के मुद्दे पर वे हिमंत बिस्व सरमा और बीजेपी से सहमत हुए। नतीजे बीजेपी के पक्ष में आए।
AIUDF के साथ गठबंधन कर कांग्रेस के बुरे दिन आए?
AIUDF पर हमेशा से सांप्रदायिक राजनीति के आरोप लगते रहे हैं। साल 2021 के चुनावों में कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की AIUDF के साथ गठबंधन किया था। गठबंधन को महाजोत नाम दिया था। बीजेपी ने इसे मुद्दा बना लिया। बदरुद्दीन अजमल पर बीजेपी ने बांग्लादेशी मुसलमानों को शरण देने का आरोप लगाया, उन्हें सांप्रदायिक और घुसपैठियों का समर्थक बताया। नजरिए की राजनीति में बीजेपी, कांग्रेस पर भारी पड़ गई। हिंदू और स्थानीय वोटर कांग्रेस से नाराज हो गए।
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योजनाओं का भी हुआ खूब असर
केंद्र की जो भी योजनाएं थीं, असम तक पहुंचाईं गईं। डारेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, पीएम किसान योजनाओं का भी जनता में सही संदेश गया। उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन योजना, सड़क, पुल, निवेश की वजह से बीजेपी पर असम के लोगों का भरोसा बढ़ा। बीजेपी ने चाय बागान के मजदूरों को लुभाने के लिए वादे किए। कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगी। योजनाएं भी 2016 से ही बीजेपी के पक्ष में माहौल बना रहीं हैं।
नेतृत्व संकट से जूझ रही है कांग्रेस
तरुण गोगोई के निधन के बाद कांग्रेस के पास राज्य स्तर पर वैसा कोई कद्दावर चेहरा नहीं उभर पाया। गौरव गोगोई, तरुण गोगोई के बेटे हैं लेकिन उनके पास हिमंत बिस्व सरमा जैसी लोकप्रियता नहीं है। हिमंत बिस्व सरमा की गिनती अब देश के चर्चित नेताओं में होती है, उन्हें महाराष्ट्र से लेकर झारखंड जैसे राज्यों तक में अहम जिम्मेदारियां दी जाती हैं, उन्हें स्टार प्रचारक की तरह पेश किया जाता है। वह हिंदुत्व के नए पोस्टर ब्वॉय बन गए हैं। गौरव गोगोई लोकसभा में उपनेता हैं लेकिन 2026 का चुनाव, चुनौती की तरह उनके सामने खड़ा है।
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अंदरुनी कलह भी कांग्रेस पर भारी पड़ा है
कांग्रेस, अंदरुनी कलह से जूझ रही है। भूपेन कुमार बोरा साल 2021 से साल 2025 तक, असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। पार्टी में ऐसी खटपट हुई कि वह कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए। वह असम की बिहपुरिया विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। कांग्रेस के सांसद रहे प्रद्युत बोरदोलोई दिसपुर से चुनाव लड़ रहे हैं। 2011 से लेकर अब तक, कांग्रेस के कई दिग्गज बीजेपी में शामिल हो गए। कमलाख्या दे पुरकायस्थ, बसंती दास, शशिकांत दास जैसे नेता, अब बीजेपी के साथ हैं। असम कांग्रेस के उपाध्यक्ष रहे नबज्योति तालुदार भी बीजेपी में शामिल हो चुके हैं।
अब कांग्रेस क्या कर रही है?
कांग्रेस ने आलोचनाओं के बाद, AIUDF को फटकारकर, लेफ्ट, रायजोर और असम जातीय परिषद के साथ गठबंधन किया है। कांग्रेस, असमिया पहचान, सांप्रदायिक सौहार्द और विकास के मुद्दे पर राजनीति कर रही है। देखने वाली बात यह है कि मोदी और हिमंत फैक्टर से कांग्रेस, राज्य में कैसे उबरती है।
