अमेरिका और ईरान के बीच 12 दिनों से जंग जारी है। मगर सबसे अधिक हमलों की मार जॉर्डन को झेलनी पड़ रही है। ईरान की सेना और आईआरजीसी ने जॉर्डन के कई एयरबेस पर हमलों को अंजाम दिया। पोर्ट शहर अकाबा पर भी कई बार बैलेस्टिक मिसाइल से अटैक हो चुका है। 

 

ईरानी हमले में तीन अमेरिकी सैनिकों की मौत भी हो चुकी है। बहरीन, कुवैत और कतर की तुलना में ईरान जॉर्डन को अधिक ताकत के साथ निशाना बना रहा है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि सिर्फ जॉर्डन पर ही तेहरान इतना गुस्सा क्यों दिख रहा है... आइये इसे समझे हैं। 

 

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जॉर्डन और ईरान की ताजा दुश्मनी क्या है?

युद्ध शुरू होने से पहले ईरान ने स्पष्ट किया था कि अगर उस पर हमला हुआ तो वह पूरे क्षेत्र में हमलों को अंजाम देगा। खासकर उन देशों पर जहां अमेरिकी बेस और उसकी सेना की मौजूदगी है। इसके बाद सऊदी अरब समेत तमाम खाड़ी के देशों ने अपने यहां अमेरिकी सेना की तैनाती पर रोक लगा दी। यह भी कहा कि उनकी धरती से ईरान पर कोई हमला नहीं होगा। अमेरिकी हमले सिर्फ रक्षात्मक होंगे।

 

  • जॉर्डन ने अन्य खाड़ी देशों से अलग राह पकड़ी। उसने अपने यहां से अमेरिका को ईरान पर हमला करने की अनुमति दी। अमेरिका के फाइटर जेट, गोला-बारूद और सैनिकों की मेजबानी की। आज ईरान पर अमेरिका अधिकांश हमले जॉर्डन और फारस की खाड़ी पर मौजूद अपने विमानवाहक पोतों से कर रहा है।

 

  • कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान इन हमलों को जॉर्डन पर अमेरिका को पनाह देने की सजा के तौर पर थोप रहा, ताकि अन्य खाड़ी देशों तक यह संदेश जाए कि अमेरिका की मेजबानी करने का नतीजा क्या होता है? 

 

  • वहीं कुछ का तर्क यह है कि ईरान की रणनीति युद्ध को सीमित रखने की है। उसे पता है कि अगर इजरायल पर हमला किया तो जंग का दायर बढ़ सकता है। संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब भी एक सीमा के बाद पलटवार कर सकते हैं। मगर जॉर्डन का ऐसा करना लगभग नामुमकिन है।

 

  • जॉर्डन की सरकार ने लगातार हो रहे ईरानी हमलों की समय-समय पर निंदा की। पिछले रविवार को ईरान और जॉर्डन के बीच राजनयिक तनाव भी देखने को मिला। जॉर्डन ने ईरानी राजदूत को तलब किया और तुरंत हमले रोकने की मांग की।

अमेरिका ने जॉर्डन में सैनिकों को क्यो भेजा?

रिपोर्ट के मुताबिक रक्षा सहयोग समझौते के तहत जॉर्डन के सैन्य ठिकानों तक अमेरिका की पहुंच है। यही समझौता आज जॉर्डन को भारी पड़ रहा है। हालांकि मिसाइल और ड्रोन हमलों के बीच जॉर्डन आज भी तटस्थ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान में जॉर्डन में लगभग 4000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। कतर, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन से कई अमेरिकी सैनिकों को जॉर्डन में भेजा गया है। इसकी वजह यह है कि इन देशों की तुलना में जॉर्डन अधिक सुरक्षित है।

 

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जॉर्डन में अमेरिका को कितना नुकसान?

पिछले हफ्ते ईरान ने जॉर्डन में पांच बड़े हमलों को अंजाम दिया। इनमें तीन अमेरिकी सैनिकों की जान गई और बड़ी संख्या में जवान घायल भी हुए। ईरान ने अपना पहला हमला किंग फैसल एयर बेस के आवासीय परिसर पर किया। यहां पांच अमेरिकी सैनिकों को चोट आई। दूसरा हमला एक अन्य बेस पर किया गया। यहां बड़ी संख्या में ब्लैकहॉक हेलीकॉप्टर को नुकसान पहुंचा है।

 

तीसरा हमला मुवफ्फक साल्टी एयरबेस पर किया गया। गनीमत रही की किसी को कोई चोट नहीं आई। इसके बाद 17 जुलाई को ईरान ने इसी एयरपोर्ट पर दोबारा हमला किया। इस हमले में तीन सैनिकों की जान गई और 20 जवान घायल हुए।