उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी (BJP) सरकार के खिलाफ राजनीतिक दल और स्थानीय संगठन सड़कों पर उतरे हैं। उनका कहना है कि अंकिता भंडारी केस में संदिग्ध 'VIP' होने के आरोपों के बाद भी दुष्यंत गौतम को संवैधानिक संरक्षण दिया गया है। कांग्रेस का दावा है कि भारतीय जनता पार्टी ने जानबूझकर दुष्यंत गौतम को सिक्किम का राज्यपाल बनाया है, जिससे वह उन पर उठने वाले सवालों से अपनी कानूनी तौर रक्षा कर सकें।
कांग्रेस महासचिव कुमारी सैलजा ने सोमवार को आरोप लगाया कि अंकिता भंडारी मामले में 'VIP' के तौर पर दुष्यंत कुमार गौतम का नाम सामने आने के बावजूद उनसे पूछताछ नहीं की गई और अब उन्हें राजभवन में बैठाया गया है, ताकि उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न हो सके। दुष्यंत गौतम ने सोमवार को ही सिक्किम के राज्यपाल के तौर पर शपथ ली। उन्होंने अंकिता भंडारी मामले में लगे आरोपों को खारिज किया है।
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कुमारी सैलजा, उत्तराखंड प्रभारी, कांग्रेस:-
सिक्किम के राजभवन में एक ऐसे शख्स को बैठाया जा रहा है, जिसका नाम एक बहुत बड़े स्कैंडल के साथ जुड़ा हुआ है। अंकिता भंडारी केस ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया, लेकिन उसे आज तक इंसाफ नहीं मिला।
कुमारी सैलजा ने कहा, 'इस मामले में BJP के लोगों के ऑडियो आए, VIP का नाम भी आया। हमें यह झुनझुना थमाया जाता है कि CBI जांच कर रही है, लेकिन CBI ने कभी भी इस केस के सभी एंगल पर जांच नहीं की। VIP के तौर जिस दुष्यंत गौतम का नाम आया, उससे पूछताछ ही नहीं हुई, उल्टा उसे राजभवन में बैठाया जा रहा है, ताकि कोई लीगल एक्शन न हो सके।'
क्या राज्यपाल को संवैधानिक संरक्षण मिलता है?
अनुच्छेद 361, संविधान:-
कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति या राज्यपाल के खिलाफ किसी भी अदालत में कोई आपराधिक मामला न शुरू हो सकता है और न जारी रह सकता है। इसी तरह कोई अदालत उनकी गिरफ्तारी या कैद का आदेश भी नहीं दे सकती।
सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड विशाल अरुण मिश्रा ने कहा, 'राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत संवैधानिक संरक्षण मिला है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति, राजप्रमुख और राज्यपाल के संवैधानिक संरक्षण की बात करता है। राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कामों के लिए किसी अदालत के सामने जवाबदेह नहीं हैं। पद के नाते किए गए किसी काम पर भी उन्हें अदालत में जवाब नहीं देना पड़ता।
अपराध की स्थिति में क्या होता है?
राज्यपाल, राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यंत ही अपने पद पर बने रह सकते हैं। संविधान का अनुच्छेद 156(1) के राष्ट्रपति को यह शक्ति देता है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति उन्हें कभी भी पद से हटा सकते हैं। राज्यपाल अनुच्छेद 156(2) के तहत अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति को सौंपकर कभी भी अपना पद छोड़ सकते हैं। अगर अपना पद छोड़ दें तो उन पर मुकदमा चल सकता है। अगर पद पर हैं तो नहीं।
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क्या पहले कभी राज्यपालों पर मुकदमा चला है?
राज्यपालों पर कभी मुकदमे नहीं चले। जिन राज्यपालों पर संगीन आरोप लगे, उन्होंने अपने पदों से इस्तीफा दिया। कुछ नाम ऐसे रहे, जिनका नाम किसी विवाद में सामने आया, फिर उन्होंने अपने पदों से इस्तीफा दिया-
- वी षणमुगनाथन: मेघालय के राज्यपाल वी षणमुगनाथन पर जनवरी 2017 में राजभवन के कर्मचारियों ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। कर्मचारियों ने प्रधानमंत्री को याचिका भेजी थी, जिसमें राजभवन में एक क्लब चलाने की बात कही गई थी। उन्होंने 26 जनवरी को इस्तीफा दे दिया।
- बीवी वांछू और एमके नारायरणन: 2014 में गोवा के राज्यपाल बीवी वांछू और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एमके नारायणन से अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे में CBI ने पूछताछ की। इसके बाद नारायणन ने 30 जून को और वांछू ने 4 जुलाई को इस्तीफा दिया।
- एनडी तिवारी: आंध्र प्रदेश के राज्यपाल एनडी तिवारी को दिसंबर 2009 में टीवी चैनलों ने तीन युवतियों के साथ आपत्तिजनक हालत में दिखाया। इससे कांग्रेस की किरकिरी हुई और उन्होंने 26 दिसंबर को इस्तीफा दे दिया।
- प्रभात कुमार: झारखंड के राज्यपाल प्रभात कुमार पर आरोप था कि कैबिनेट सचिव रहते साल 1999 से 2000 के बीच में उन्होंने पद का गलत इस्तेमाल किया। कारोबारी अशोक चतुर्वेदी ने CBI के सामने कहा था कि उन्होंने उनके सरकारी आवास पर पार्टियों का खर्च उठाया था। प्रभात कुमार ने 31 जनवरी 2002 को इस्तीफा दिया।
- मोती लाल वोरा और पी शिवशंकर: मई 1996 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मोतीलाल वोरा और केरल के राज्यपाल पी शिवशंकर ने हवाला कांड में इस्तीफा दिया। CBI ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि संवैधानिक छूट की वजह से ही उनके खिलाफ चार्जशीट नहीं हो पा रही। दोनों ने 1 मई की रात इस्तीफे भेजे और 3 मई उनका आखिरी दिन रहा।
- शीला कौल, गुलशेर अहमद और कोना प्रभाकर जैसे नेताओं पर राज्यपाल रहने के दौरान आरोप लगे। उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया, फिर मुकदमा चला सका।
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अंकिता भंडारी केस है क्या?
18 सितंबर 2022 को अकिता भंडारी की हत्या हुई थी। ऋषिकेश के पास वनतारा रिजॉरट में अंकिता रिसेप्शनिस्ट के तौर पर काम करती थीं। इसी केस में पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और सहायक मैनेजर अंकित गुप्ता को दोषी पाया गया है। तीनों को उम्रकैद हुई है।
अंकिता की हत्या इसलिए की गई है कि उन्होंने 'VIP' को सेक्सुअल फेवर देने से इनकार कर दिया था। जिस VIP का नाम ऑडियो टेप में सामने आया वह दुष्यंत गौतम थे। यह शक जाहिर किया गया है, पुलिस इस एंगल से केस की जांच नहीं कर रही है। कांग्रेस को यही बात खटक रही है।
दिल्ली में बवाल क्यों हो रहा है?
अंकिता भंडारी के माता-पिता, एक्टिविस्ट योगिता परी के साथ इंडिया गेट पर डटे हुए हैं। दुष्यंत गौतम की नियुक्ति रोकने के लिए राष्ट्रपति तक से गुहार लगा चुके हैं। बुधवार को रात में इंडिया गेट पर प्रदर्शन किया था, गुरुवार को पुलिस न उन्हें हिरासत में लिया, अब दोनों रिहा हैं। राहुल गांधी , कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी और कई अन्य कांग्रेस नेताओं ने इंडिया गेट पहुंचकर अंकिता के माता-पिता के प्रति अपना समर्थन जताया था।
अंकिता के पिता का दावा क्या है?
अंकिता भंडारी के माता-पिता का आरोप है कि हत्याकांड में जिस कथित 'वीआईपी' की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं, वह दुष्यंत गौतम हैं। दुष्यंत गौतम सितंबर 2022 में हुए इस हत्याकांड के दौरान भारतीय जनता पार्टी के राज्य प्रभारी थे।
