लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन जनता की आवाज सरकार तक पहुंचाने का एक अहम तरीका है। इन्हीं विरोध प्रदर्शनों को लेकर समाजवादी चिंतक और स्वतंत्रता सेनानी डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि जब सड़कें सूनी हो जाती हैं तो संसद आवारा हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र में संसद के पास ही पिछले कई दशकों से प्रदर्शन होते आए हैं और प्रदर्शनकारियों की आवाज संसद के गलियारों तक पहुंचती रही है। पहले प्रदर्शन संसद से कुछ ही मीटर की दूरी पर स्थित बोट क्लब का इलाके में होते थे। 90 के दशक में यह स्थान बदलकर जंतर-मंतर कर दिया गया था लेकिन अब जंतर-मंतर भी प्रदर्शन स्थलों की लिस्ट से बाहर हो गया है।
कभी इंडिया गेट के पास बोट क्लब पर बड़े-बड़े आंदोलन होते थे, फिर जंतर-मंतर विरोध की प्रमुख जगह बना और अब दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को भी निर्धारित प्रदर्शन स्थल की लिस्ट से हटा दिया है। 12 अक्टूबर 2026 को पुलिस ने रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सीबीडी ग्राउंड को वैकल्पिक प्रदर्शन स्थलों के रूप में तय किया। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या दिल्ली में विरोध करने की जगह धीरे-धीरे संसद और सत्ता के केंद्रों से दूर होती जा रही है?
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बोट क्लब से शुरू हुई कहानी
दिल्ली में बोट क्लब का इलाका लंबे समय तक बड़े जन आंदोलनों का केंद्र रहा। यह जगह इंडिया गेट के पास और संसद तथा केंद्र सरकार के कई ऑफिस के बिल्कुल नजदीक है। यहां प्रदर्शन करने का मतलब था कि आंदोलन की आवाज सीधे सत्ता के गलियारों तक पहुंचे और कई बार संसद से जनप्रतिनिधि इस इलाके में हो रहे प्रदर्शनों में वार्ता करने आते थे। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में किसानों का विशाल आंदोलन भी इसी इलाके में हुआ था। हजारों किसान अपनी मांगों को लेकर बोट क्लब के लॉन में जुटे और कई दिनों तक वहां डटे रहे। इस आंदोलन ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार का ध्यान खींचा।
हालांकि, बड़े प्रदर्शनों के कारण ट्रैफिक, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को लेकर चिंताएं भी बढ़ीं। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद आंदोलन के दौर में फरवरी 1993 के आसपास तत्कालीन केंद्र सरकार ने बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों और जमावड़ों को कंट्रोल करने के लिए पाबंदियां लगा दीं। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश में बने तनावपूर्ण माहौल ने भी सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ाया था और पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को बोट क्लब इलाके में नहीं जुटने दिया। इन प्रतिबंधों के बाद दिल्ली में विरोध प्रदर्शन के लिए जंतर-मंतर एक प्रमुख वैकल्पिक स्थल के रूप में उभरा। इस तरह बोट क्लब, जो कभी सत्ता के करीब जनता की आवाज उठाने का बड़ा मंच था, धीरे-धीरे बड़े विरोध प्रदर्शनों के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र बन गया।
जंतर-मंतर पर हुए कई प्रदर्शन
बोट क्लब पर पाबंदियों के बाद जंतर-मंतर प्रदर्शनकारियों के लिए प्रमुख जगह बनकर उभरा। यह संसद से बहुत दूर नहीं था, लेकिन यहां भीड़ को कंट्रोल करना और ट्रैफिक संभालना अपेक्षाकृत आसान था। धीरे-धीरे यह जगह धरनों, भूख हड़तालों और राजनीतिक आंदोलनों का जाना-पहचाना ठिकाना बन गई। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के आंदोलन और 2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन प्रमुख बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ पहलवानों के प्रदर्शन जैसे आंदोलनों ने जंतर-मंतर को देशभर में पहचान दिलाई। हालांकि, इस इलाके में प्रदर्शन को लेकर सवाल उठते रहे। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब इलाके में विरोध प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय उचित नियमों के तहत प्रदर्शन की अनुमति देने की बात कही थी।
2026 में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान जंतर-मंतर पर हजारों की संख्या में भीड़ जुटी। पुलिस और प्रशासन के लिए लोगों को काबू करना काफी मु्श्किल हो गया था और अंत में सरकार को प्रदर्शनकारियों की मांगों को मानना पड़ा था। इसके बाद अब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन हो रहे हैं लेकिन इस बार पुलिस ने ना राहुल गांधी को और ना ही किसी अन्य संगठन को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति दी। इसके बाद अब इसे प्रदर्शन के स्थलों की लिस्ट से हटा दिया है।
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क्या संसद से दूर जा रहे प्रदर्शन?
बोट क्लब इंडिया गेट के पास स्थित है और संसद भवन से इसकी दूरी सड़क मार्ग से लगभग 1 से 2 किलोमीटर है। जंतर-मंतर संसद से करीब 2 से 3 किलोमीटर दूर है और लंबे समय तक प्रदर्शनकारियों के लिए प्रमुख स्थल रहा। वहीं, नए निर्धारित स्थलों में रामलीला मैदान संसद से लगभग 4 से 5 किलोमीटर, पूर्वी दिल्ली का सीबीडी ग्राउंड करीब 14 किलोमीटर और उत्तरी दिल्ली का बुराड़ी मैदान लगभग 23 किलोमीटर दूर है। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि प्रदर्शन की जगह लगातार संसद से दूर होती जा रही है।
