रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसद टैरिफ लगाने वाला विधेयक अमेरिका के दोनों सदनों से पारित हो गया है। यह बिल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से तेल खरीदने वाले पांच सबसे बड़ी खरीदार देशों चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान पर टैरिफ लगाने की ताकत देता है। अब इन देशों पर टैरिफ लगाना या नहीं... यह सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की इच्छा पर निर्भर करेगा। जल्द ही यह बिल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भेजा जाएगा। उनके हस्ताक्षर से यह लागू हो जाएगा। अमेरिका के इस विधेयक के पास होने के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी दुविधा है। दुविधा यह है कि अमेरिका के सामने झुकना है या अपनी विदेश नीति स्वतंत्र रखनी है।
अगर रूस से भारत ने तेल खरीद जारी रखा तो अमेरिका उस पर टैरिफ लगा सकता है। जैसी धमकियां वाशिंगटन से आ रही हैं। दूसरी तरफ अगर अमेरिकी दबाव के आगे भारत झुकता है तो उसकी ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि मध्य-पूर्व में संघर्ष के कारण सप्लाई जेन पहले से ही बाधित है। भारत लगातार अपने ईंधन निर्यात में विविधता ला रहा है। आज लगभग 40 से अधिक देशों से भारत तेल और गैस का निर्यात कर रहा है।
यह भी पढ़ें: मलेशिया से सिडनी जा रही फ्लाइट में आया अस्थमा अटैक, 58 साल के भारतीय की मौत
सऊदी अरब से झटका: भारत सऊदी तेल का भी एक बड़ा आयातक है। यमन के हूती विद्रोहियों के हमले के कारण सऊदी अरब का तेल निर्यात संकट में है। इस बीच सऊदी तेल कंपनी अरामको ने भारतीय रिफाइनरियों को कच्चे तेल की आपूर्ति रोक दी है। ऐसे में अगर भारत अमेरिकी दबाव में रूस से कच्चा तेल नहीं खरीदता है तो एक बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
रूसी तेल खरीदना मजबूरी क्यों?
तेल कंपनियों को वैकल्पिक सप्लाई और अन्य तेल उत्पादक देशों से खरीदारी करने पड़ेगी। इससे शिपिंग रूट पर आने वाला खर्च बढ़ सकता है। अत: इसका हर्जाना देश की जनता को उठाना पड़ेगा। रूसी तेल खरीदने के समर्थन में भारत सरकार का तर्क है कि वह अपनी जनता के लिए रूस से किफायती ऊर्जा खरीदता है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती रूसी तेल को अचानक बंद करने की है। भारत के कुल तेल निर्यात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसद है। अगर रूस से तेल खरीदना बंद करना पड़ा तो भारत को इस 40 फीसद कच्चे तेल की व्यवस्था किसी अन्य देश से करनी होगी। मध्य-पूर्व में संघर्ष के चलते वहां से तेल हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। सबसे बड़ा खतरा जोखिम का है। किसी भी वक्त यह सप्लाई रुक सकती है। तेल टैंकरों पर हमला हो सकता है। चालक दल के सदस्यों की जान खतरे में पड़ सकती है।
डोनाल्ड ट्रंप पिछले साल भारत पर 50 फीसद टैरिफ लगा चुके हैं। जबकि चीन पर कोई टैरिफ नहीं लगाई थी। तथ्य यह है कि भारत की तुलना में चीन अधिक रूसी तेल खरीदता है। उस वक्त भारत सरकार की प्रतिक्रिया अधिक सधी और सहयोगपूर्ण थी।
ट्रंप के आगे क्या भारत कड़ा रुख अपनाने लगा?
मगर अबकी रुख बदलता हुआ दिख रहा है। बिल पास होने के बाद विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि अमेरिका के नए टैरिफ से द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंच सकता है। यह भी कहा, 'भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। बाजार की बदलती परिस्थितियों और विविध स्रोतों से आपूर्ति के आधार पर भारत ऐसा करना जारी रखेगा।' मतलब साफ है कि अमेरिकी दबाव के आगे भारत रूसी तेल खरीदना बंद नहीं करेगा।
वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत कितना अहम?
भारत का रूसी तेल खरीदना सिर्फ उसकी जनता और हितों तक सीमित नहीं है। असल में भारत ने वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को स्थिर रखने में भी अहम भूमिका निभाई। यही कारण है कि पूर्ववर्ती जो बाइडन सरकार ने रूस पर प्राइस कैप लगाया था और भारत को रूसी तेल खरीदने का अनुमति दी थी, ताकि तेल की कीमतों को स्थिर रखा जा सके। आज दुनियाभर के कई देश भारत से बड़ी मात्रा में रिफाइन तेल खरीदते हैं। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है। इसके अलावा विश्व का चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और पांचवां सबसे बड़ा परिष्कृत पेट्रोलियम निर्यातक है। इससे आप वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की भूमिका बखूबी से समझ सकते हैं।
यह भी पढ़ें: पाकिस्तान में स्मार्ट लॉकडाउन, रात 9 बजे बंद होंगे बाजार; विदेश यात्रा पर बैन
ईरान पहले ही छूट चुका: भारत पहले बड़ी मात्रा में ईरान से कच्चा तेल आयात करता था। 2019 में अमेरिका ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद भारत ने तेहरान से भी तेल खरीदना बंद कर दिया। अब सवाल यह है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के दवाब में भारत किस-किस से तेल खरीदना बंद करेगा। अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच ट्रंप प्रशासन ने ईरान से तेल खरीदने की छूट दी, ताकि वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखा जा सके। भारत ने लगभग 7 साल बाद ईरान से तेल खरीदा। बाद में अमेरिका ने यह छूट भी खत्म कर दी।
भारत किस देश से कितना तेल खरीद रहा?
केप्लर की रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर महीने में रूस से भारत का तेल आयात गिरा है। सितंबर महीने में भारत ने रूस से लगभग 14 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल आयात किया। अगस्त में यह प्रतिदिन 21 लाख बैरल प्रतिदिन था। मतलब सितंबर में 30 फीसद की गिरावट आई है।
भारतीय कंपनियों ने इराक से अधिक तेल खरीदना शुरू कर दिया है। अगस्त में जहां रोजाना 163,000 बैरल तेल खरीदती थी। वहीं सितंबर के पहले 14 दिनों में लगभग 535,000 बैरल प्रति दिन आयात किया। यह महीने भर के भीतर लगभग 200 फीसद का इजाफा है।
अप्रैल महीने से भारत ने वेनेजुएला से भी तेल खरीदना शुरू किया है। अगस्त में भारत ने साढ़े तीन लाख बैरल तेल रोजाना खरीदा। सितंबर महीने में भारत ने अमेरिका से प्रतिदिन करीब 1.37 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा। अगस्त में भारत ने रूस के बाद सबसे अधिक तेल संयुक्त अरब अमीरात से लगभग 611,000 बैरल प्रति दिन खरीदा। सऊदी अरब से 3.85 लाख बैरल, वेनेजुएला से 3.83 ला बैरल , नाइजीरिया से 1,29 लाख बैरल और ब्राजील से 1.20 लाख बैरल रोजाना खरीदा।
