साल 1982 की बात है। एलेक्जेंडर फ्लेमिंग फ्लेमिंग सेंट मैरी अस्पताल, लंदन में स्टेफिलोकोकस पर काम कर रहे थे। बीच में ही उन्हें कहीं छुट्टी पर जाना पड़ा।  छुट्टी बिताकर जब वह अपने लैब में पहुंचे तो वहां सब ठीक था लेकिन एक पेट्री डिश पर फंफूद जम गई थी। इस पेट्री डिश में 'स्टेफिलोकोकस' था और इसी के आसपास फंफूद जम आई थी। उस फंफूद के आसपास जितने बैक्टीरिया थे, सारे मर चुके थे। दुनिया बचाने वाली एक दवाई की नींव यहां पड़ चुकी थी, जिसे फ्लेमिंग पहचान गए थे। उन्होंने उस फफूंद का नाम 'पेनिसिलियम नोटेटम' रखा, उस पर जो तत्व मौजूद था, उसका नाम उन्होंने 'पेनिसिलिन' दिया।

एलेक्जेंडर फ्लेमिंग एक स्कॉटिश चिकित्सक और माइक्रोबायोलॉजिस्ट थे। उन्होंने 1928 में लंदन के सेंट मैरी अस्पताल में काम करते समय अनजाने में पेनिसिलिन की खोज की थी। एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने इसकी खोज की थी, लेकिन इसे दवा के तौर पर विकसित किया था हावर्ड फ्लोरे और अर्नस्ट चेन ने। इन तीनों को संयुक्त रूप से 1945 में चिकित्सा के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ये दवाइयां जान बचाती हैं, शरीर को रोगों से लड़ने के लिए जरूरी एंटीबॉडीज बनाती हैं। लेकिन आज एंटीबाटोटिक का जिक्र क्यों? वजह इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की एक हालिया रिपोर्ट है, जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो प्रोग्राम, 'मन की बात' में किया है। खबरगांव के खास वीकली कॉलम 'फ्राइडे रिलीज' पढ़िए कहानी एंटीबायोटिक की। 

यह भी पढ़ें: सीने पर 'बोझ' से, ग्लैमर वर्ल्ड की एंट्री तक, ब्रेस्ट इंप्लांट्स का लेखा-जोखा

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री:-
ICMR यानि इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की हाल ही की एक रिपोर्ट बताती है कि निमोनिया और UTI जैसी बीमारियों में एंटीबायोटिक दवाएं कमजोर साबित हो रही हैं। इसका एक बड़ा कारण बिना सोचे-समझे इनका सेवन है। इसलिए मेरा आग्रह है कि डॉक्टर की सलाह के बिना एंटीबायोटिक दवाएं ना लें।


प्रधानमंत्री जिस बात पर चिंता जता रहे, उस बला का नाम क्या है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' कार्यक्रम में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की रिसर्च का हवाला दिया है और कहा है कि देश में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ रहा है। यह क्या है, पहले इसे समझते हैं।  ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस  के पूर्व डायरेक्टर डॉ. एमसी मिसरा से खबरगांव ने इन दवाइयों के असर को लेकर बातचीत की। डॉ. एमसी मिसरा साल 2013 से लेकर 2017 तक AIIMS के निदेशक रहे हैं। वह जनरल सर्जरी के चीफ रहे। उन्होंने लेप्रोस्कोपिक और जनरल सर्जरी में कई उपलब्धियां हासिल कीं हैं।

यह भी पढ़ें: बिजली-पानी चूस रहे डेटा सेंटर कैसे बन रहे हैं कमाई का अड्डा? सब समझ लीजिए

 

डॉ. एमसी मिसरा ने कहा, 'एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस वह स्थिति है जब बैक्टीरिया एंटीबायोटिक दवाओं के प्रभाव से बचने के लिए खुद को बदल लेते हैं। नतीजतन, ये दवाइयां बैक्टीरिया को मारने या उनके बढ़ने को रोकने में असफल हो जाती हैं। इससे सामान्य संक्रमण भी इलाज करना मुश्किल हो जाता है और वे जानलेवा बन सकते हैं। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन एंटीबायोटिक्स का गलत या ज्यादा उपयोग इसे तेजी से बढ़ाता है। 


ICMR की रिपोर्ट क्या कह रही है?

ICMR की यह रिपोर्ट, एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर है। रिपोर्ट में साल 2024 में करीब 99,000 संक्रमित नमूनों का विश्लेषण किया गया। इनमें ज्यादातर संक्रमण ग्राम-नेगेटिव बैक्टीरिया से हुए थे। सबसे आम बैक्टीरिया एस्चेरिचिया कोलाई और क्लेबसिएला निमोनिया हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि मजबूत एंटीबायोटिक दवाइयों का असर तेजी से कम हो रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि एस्चेरिचिया कोलाई पर इमिपेनम दवा की प्रभावशीलता 2017 में 81.4 फीसदी थी, जो 2024 में घटकर सिर्फ 57.6 तक आ गई। ग्राम-पॉजिटिव बैक्टीरिया में भी समस्या बढ़ी है। आधे से ज्यादा मामलों में आम एंटीबायोटिक काम नहीं कर रही है। ICMR की रिपोर्ट साफ चेतावनी देती है कि अगर अस्पतालों में संक्रमण नियंत्रण और एंटीबायोटिक दवाओं का सही इस्तेमाल नहीं बढ़ाया गया तो आने वाले समय में कई आम संक्रमण लाइलाज हो सकते हैं।

यह भी पढ़ें: राजा भैया vs भानवी सिंह: आखिर सड़क पर कैसे आई राजा-रानी की लड़ाई?

क्यों एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर संभलने की है जरूरत?

डॉ. एमसी मिसरा, पूर्व निदेशक, AIIMS:-
भारत ही नहीं, दुनियाभर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस एक बढ़ती समस्या है। दुनियाभर में हर साल लाखों लोग इस बीमारी से मर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे वैश्विक स्वास्थ्य के लिए प्रमुख खतरा मानता है। यह समस्या सिर्फ भारत की नहीं है। पूरे दुनिया इसकी जद में है। एंटीबायोटिक दवाइयों का ओवरडोज पूरी दुनिया के लिए समस्या है। जिन मरीजों को इसे देने की जरूरत नहीं होती, वे भी एंटीबायोटिक दवाइयां लेने लगते हैं। 

'अपना डॉक्टर खुद बनना, मौत को दावत देना है'

AIIMS के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिसरा ने कहा, 'जरा सी बीमारी में लोग खुद अपना इलाज करने लगते हैं। डॉक्टर को पता होता है कि मरीज को किस बीमारी के लिए क्या दवा लिखनी है। लोग मनमाने ढंग से एंटीबायोटिक दवाइयां लेते हैं फिर ये दवाइयां जरूरत पड़ने पर असर ही नहीं करतीं। इन दवाइयों का कई बार ज्यादा इस्तेमाल अस्पतालों में भी हो जाता है, वायरल दवाइयों के लिए लोग एंटीबायोटिक दवाइयों को लिख देते हैं। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की सबसे बड़ी वजह, इनका दुरुपयोग है। इससे बैक्टीरिया मजबूत हो रहे हैं और दवाएं बेअसर हो रही हैं। कई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि हर साल करीब 3 लाख लोग संक्रमण से मर जाते हैं, इसका मुख्य कारण एंटीबायोटिक का गलत इस्तेमाल है।'

यह भी पढ़ें: पायलट की कमी या नीयत में खोट? इंडिगो संकट की पूरी कहानी समझिए




एंटीबायोटिक पर क्या रुख अपनाना चाहिए?

AIIMS के पूर्व निदेशक डॉ. एमसी मिसरा ने कहा, 'अस्पतालों में एंटीबायोटिक का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। वायरल बीमारियों जैसे सर्दी-खांसी के लिए भी ये दवाएं दी जा रही हैं, जबकि ये सिर्फ बैक्टीरियल संक्रमण के लिए होती हैं। एंटीबायोटिक दवाइयों को बिना मरीज की प्रोफाइल का विश्लेषण किए नहीं देना चाहिए। कुछ बीमारी में 3 से 4 डोज पर्याप्त होता है, कुछ बीमारियों से ज्यादा देने की जरूरत पड़ती है। कुछ मरीजों में एंटीबायोटिक का असर एक दिन में ही बेहतर हो सकता है, कुछ में कई दिन लग सकते हैं। कई बार प्रोफाइलिंग करके सही डोज नहीं दी जाती। इससे बैक्टीरिया शरीर में मजबूत हो जाते हैं, मरीज और बीमार हो जाता है।'


क्यों एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस बढ़ रहा है? 

डॉ. एमसी मिसरा ने बताया कि खेती किसानी से लेकर पशु उत्पादों तक में बैक्टीरियल ट्रीटमेंट का क्रेज बढ़ा है। मुर्गी, सूअर और दूसरे मवेशियों में फैली बीमारियों को दुरुस्त करने के लिए इनका इस्तेमाल किया जाता है। ज्यादा दूध, अंडा उत्पादन बढ़ाने के लिए बैक्टीरियल ट्रीटमेंट का चलन बढ़ा है। फल और सब्जियां भी इससे नहीं बची हैं। यही उत्पाद लोग खा रहे हैं, जाहिर है कि प्राकृतिक तौर पर भी एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस इससे बढ़ेगा ही। एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस पर एक चिंता यह भी उन्होंने जताई कि अस्पतालों में एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट पर शोध की कमी है। कुछ संस्थान की इस दिशा में काम कर रहे हैं। नई एंटीबायोटिक दवाओं की उपयोगिता भी कम हो रही है क्योंकि बैक्टीरिया उन पर असर नहीं होने दे रहे। बैक्टीरिया को समझना जरूरी है, वरना संक्रमण बढ़ते जाएंगे। 

यह भी पढ़ें: 111 साल पुरानी किस शरारत के चलते अरुणाचल पर दावा करता है चीन? विस्तार से समझिए

'नीम हकीम, खतरा-ए-जान'

डॉ. एमसी मिसरा ने एक चिंता यह भी जताई कि फार्मेसी में बिना प्रिस्क्रिप्शन के दवाइयां देने का चलन बढ़ा है। अगर दवाई निश्चेतक नहीं है तो आमतौर पर केमिस्ट बिना कुछ सवाल-जवाब के दे देते हैं। लोग मनमाने ढंग से दवा खाते हैं और बीमार होते हैं। पैरासिटामोल जैसी साधारण दवाओं के साथ-साथ एंटीबायोटिक भी बिना डॉक्टर की सलाह के मिल जाती हैं। केमिस्ट तुरंत देने को तैयार रहते हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के दिशानिर्देशों के बावजूद यह चल रहा है। इससे लोगों में बीमारी फैल रही है और एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस की समस्या बढ़ रही है।


डॉ. एमसी मिसरा ने कोविड के दौरान एंटीबायोटिक दवाइयों के इस्तेमाल का जिक्र करते हुए कहा, 'कोविड के दौरान पैरासीटामॉल के साथ-साथ एंटीबायोटिक दवाइयां खूब दी गईं। भारत में कम्युनिटी एक्वायर्ड इन्फेक्शन निमोनिया, यूटीआई इन्फेक्शन जैसी कई बीमारियां पहले हैं। कई बार मरीजों में बैक्टीरियल समस्याएं नहीं होती हैं, फिर भी दवाइयां लिख दी जाती हैं। डॉक्टर भी कई बार गलती कर बैठते हैं, एंटीबायोटिक रिकमंड करते हैं। यह गलत है, वायरल बीमारियों के लिए बैक्टीरियल इलाज बिलकुल भी ठीक नहीं है और मरीजों की सेहत से खिलवाड़ है।'

डॉ. एमसी मिसरा, पूर्व निदेशक, AIIMS:-
एंटीबायोटिक का सही इस्तेमाल जरूरी है। बिना डॉक्टर की सलाह के दवा न लें और अस्पतालों में भी मानकों का पालन करें। अगर यह समस्या नहीं रुकी तो लाखों जानें और खतरे में पड़ सकती हैं। सरकार और स्वास्थ्य विभाग को सख्त कदम उठाने की जरूरत है।

 
एंटीबायोटिक के साइड इफेक्ट क्या होते हैं?

डॉ. एमसी मिसरा, पूर्व निदेशक, AIIMS:-
एंटीबायोटिक दवाइयों की वजह से कई बार मरीजों में एनाफिलेक्टिक रिएक्शन हो जाता है। यह इतना संक्रामक हो सकता है कि मौत हो जाए। कई मामलों में लोग ब्रेन डेड हो जाते हैं। संक्रमण का असर, शरीर के सभी हिस्सों पर पड़ता है। किडनी, लिवर, एमोक्सिसिलिन लूज मोशन की समस्याएं बढ़ जाती हैं। लिवर डैमेज होने तक की स्थिति आ जाती है। सामान्य साइड इफेक्ट में उल्टी, दस्त, मतली, पेट दर्द, रैशेज और एलर्जी आते हैं। 

अगर एंटीबायोटिक काम नहीं कर रही है तो इलाज के विकल्प क्या हैं?

डॉ. एमसी मिसरा ने इस सवाल के जवाब में कहा कि अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए। डॉक्टर से मिलना चाहिए। डॉक्टर इसके लिए कल्चर टेस्ट कराते हैं, बैक्टीरिया की पहचान करते हैं और उसकी संवेदनशीलता की जांच करते हैं। वे एंटीबायोटिक बदल सकते हैं, नए विकल्प तलाश सकते हैं। कई बार एंटीबायोटिक ट्रीटमेंट में डॉक्टर कॉम्बिनेशन थेरेपी या लास्ट-रिजॉर्ट दवाइयों का इस्तेमाल करते हैं। बैक्टीरियोफेज थेरेपी, एंटीमाइक्रोबियल पेप्टाइड्स, मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज, प्रोबायोटिक्स, वैक्सीन और फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट जैसे कई विकल्प होते हैं, जिनका इस्तेमाल डॉक्टर करते हैं। लोगों को अपना इलाज नहीं करना चाहिए, इलाज के लिए डॉक्टर होते हैं।  

यह भी पढ़ें: चीन, जापान और US की कंपनी फिर 99% मोबाइल 'मेड इन इंडिया' कैसे?


बैक्टीरियल और वायरल इन्फेक्शन में अंतर क्या है?

बैक्टीरियल इन्फेक्शन, बैक्टीरिया होते हैं। ये शरीर में बढ़ते रहते हैं। इन्हें एंटीबायोटिक्स से निष्क्रिय किया जाता है। इनके लक्षण अचानक दिखते हैं, लंबे समय तक रहते हैं। वायरस के लिए एंटीबायोटिक्स काम नहीं करतीं। इनके लिए एंटी-वायरल दवाइंया और वैक्सीन की जरूरत होती है। वायरस में म्युटेशन होता है। वायरस खुद से जीवित नहीं रह सकते, उन्हें जिंदा रहने के लिए हमारे शरीर की कोशिकाओं की जरूरत होती है। बैक्टीरिया स्वतंत्र जीव हैं। वे कहीं भी पनप सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हमारे शरीर में मौजूद 99 फीसदी बैक्टीरिया फायदेमंद होते हैं, वहीं सारे वायरस, बीमारी पैदा करते हैं। ऐसे में वायरस जनित रोगों में बैक्टीरियल दवाइयां देना, मौत को दावत देना है। 

वायरस या बैक्टीरिया क्या ज्यादा खतरनाक है?

बैक्टीरिया और वायरस दोनों इंसानों के लिए गंभीर खतरा हैं। बैक्टीरियल इन्फेक्शन से ज्यादा मौतें होती हैं। लेंसेट के ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज स्टडी बताती है कि बैक्टीरिया की वजह से हर साल 7.7 मिलियन से ज्यादा मौतें होती हैं। यह वैश्विक स्तर पर 13 फीसदी हिस्सा है। दिल के रोगियो के बाद सबसे ज्यादा मौतें, बैक्टीरियल इन्फेक्शन की वजह से होती हैं। 14वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी तक महामारी की तरह रहा प्लेग, येर्सिनिया पेस्टिस बैक्टीरिया के संक्रमण से फैलता रहा।  दुनिया में ट्यूबरकुलोसिस आज भी सबसे घातक रोगों में से एक है। बैक्टीरिया के खिलाफ हमारे पास एंटीबायोटिक्स हैं लेकिन ड्रग रेजिस्टेंस के बढ़ते मामले चिंताजनक हैं। यह भविष्य में बहुत घातक हो सकता है।


अस्पतालों को क्या करना चाहिए?

डॉ. एमसी मिसरा ने कहा, 'हर अस्पताल में एक साफ एंटीबायोटिक पॉलिसी होनी चाहिए। माइक्रोबायोलॉजिस्ट की नियुक्ति अनिवार्य होनी चाहिए। जब कोई मरीज संक्रमण के साथ आता है और सेंसिटिविटी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं होती, तब मरीजों का का इलाज एम्पिरिकल थेरेपी के तौर पर की जाती है। अस्पतालों को मरीजों की बैक्टीरियल प्रोफाइल जांचनी चाहिए। बड़े अस्पतालों में यह होता है, इसे ग्रामीण और कस्बाई इलाकों तक पहुंचाने की जरूरत है।'

क्या  एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस अगली महामारी है?

डॉ. एमसी मिसरा ने बताया कि यह महामारी की तरह ही है। अगर आप अस्पताल जाएं और इलाज ही न हो तो मौत ही होगी। यह साइलेंट पेंडेमिक की तरह फैल रहा है। देश में अब एंटीबायोटिक दवाइयां लिखने को लेकर सख्त नियमों की जरूरत है। विदेश में इसे लेकर नियम हैं, भारत में भी ऐसे नियमों की जरूरत है। 

भारतीय अस्पतालों की एंटीबायोटिक पॉलिसी क्या है?

ICMR की गाइडलाइन के मुताबिक देश के बड़े अस्पतालों में एंटीमाइक्रोबियल स्टीवर्डशिप कमिटी होती है। इस समिति का काम एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल और मॉनिटरिंग का होता है। यह कमिटी माइक्रोबायोलॉजी विभाग के नेतृत्व में काम करती है। इसमें क्लिनिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट, फार्मासिस्ट, इंफेक्शन कंट्रोल स्टाफ और इंफेक्शस डिजीज फिजिशियन शामिल होते हैं। यह अस्पताल की एंटीबायोटिक पॉलिसी बनाती, लागू करती और मॉनिटरिंग करती है। ऐसी ही समितियों की पूरे देश में जरूरत है। 


कितना बड़ा है एंटीबायोटिक्स का बाजार?

दुनिया भर में एंटीबायोटिक्स दवाओं का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। 2025 में यह बाजार 49.82 अरब अमेरिकी डॉलर का है, जो 2026 में बढ़कर 52.41 अरब डॉलर हो सकता है। 2034 तक यह करीब 78.63 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 2025 से 2034 तक यह हर साल औसतन 5.20% की दर से इसका बाजार बढ़ रहा है। साल 2024 में एशिया पैसिफिक इलाके में सबसे ज्यादा ग्रोथ देखी गई है। दुनियाभर की एंटीबायोटिक दवाइयों के बाजार का 46% हिस्सा यहीं से आता है, वहीं उत्तर अमेरिका और यूरोप मिलकर 48% हिस्से के बाजार पर अपनी दखल रखते हैं। पेनिसिलिन दवाएं सबसे लोकप्रिय हैं, जिनका बाजार, 27% से ज्यादा है। सेल वॉल फोटो सेंथेसिसि रोकने वाली दवाओं का हिस्सा 53 फीसदी है। बढ़ते संक्रमण, बुजुर्ग आबादी, अस्पताल में होने वाले इंफेक्शन और महामारी के असर से इन दवाओं की मांग बढ़ी है।

यह भी पढ़ें: एक मीटिंग के बाद टाटा ट्रस्ट में क्यों शुरू हो गया झगड़ा? पढ़िए कहानी

एंटीबायोटिक दवाइयों की ग्लोबल कंपनियां कौन सी हैं

भारत में सन फार्मास्युटिकल्स, सिप्ला और हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स की एंटीबायोटिक्स दवाइयां, वैश्विक स्तर पर बिकती हैं। ऑरोबिंदो फार्मा, पेनिसिलिन और दूसरे एंटीबायोटिक्स बनाती है। सिप्ला, ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स की बड़ी निर्माता कंपनियों में से एक है। सन फार्मास्युटिकल इंडस्ट्रीज, ल्यूपिन , अल्केम लेबोरेटरीज, डॉ. रेड्डीज लेबोरेटरीज, ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स, मैनकाइंड फार्मा, टॉरेंट फार्मास्युटिकल्स, एबॉट इंडिया की दवाइयां भी दुनियाभर में बिकती हैं। वैश्विक स्तर पर  फाइजर, जॉनसन एंड जॉनसन, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और सनोफी की एंटीबायोटिक दवाइयां दुनियाभर में बिकती हैं। भारत और चीन इन दवाइयों का सबसे बड़ा बाजार है। ग्रैंड व्यू रिसर्च की एक रिपोर्ट बताती है कि साल 2023 में 53.4 अरब डॉलर से बढ़कर एंटीबायोटिक दवाइयों का कारोबार साल 2030 तक 74.1 अरब डॉलर हो जाएगा। 'प्रेसीडेंस रिसर्च' की भी एक रिपोर्ट का अनुमान है कि 2034 तक एंटीबायोटिक का बाजार बढ़कर 70 अरब डॉलर पार कर जाए।