दिल्ली में बेहतर भविष्य का सपना लेकर आने वाले छात्रों को पढ़ाई के साथ रहने की भी बड़ी परेशानी झेलनी पड़ रही है। दिल्ली के सत्य निकेतन में हुए हादसे में सात छात्रों की मौत के बाद अब पूरा देश देख रहा है कि किस तरह से बच्चों को परेशानी झेलनी पड़ रही हैं। कहीं बालकनी में बाथरूम बना है तो कहीं पांच मंजिला इमारत की छत पर टिन शेड बनाकर कमरा तैयार किया गया है। यहां एक-एक इंच जगह के लिए पैसे देने पड़ते हैं। यहां तक कि प्लास्टिक की मेज के लिए भी अलग पैसे लिए जाते हैं।

 

दिल्ली देश के कई बड़े शिक्षण संस्थानों का केंद्र है, लेकिन दाखिला मिलने के बाद छात्रों की मुश्किलें खत्म नहीं होतीं। नॉर्थ कैंपस के पास मुखर्जी नगर और कमला नगर, पुराने राजेंद्र नगर, साउथ कैंपस के पास सत्य निकेतन और मोती बाग तथा लक्ष्मी नगर में छात्र छोटे कमरों और पीजी में रहने को मजबूर हैं। छात्र पैसे बचाने और माता-पिता पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए इन परेशानियों को सहते हैं। 

 

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ग्राउंड पर क्या दिखा?

इस हादसे के बाद पीटीआई की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि मुखर्जी नगर के एक पीजी में एक कमरे में बिस्तर के अलावा लगभग कोई जगह नहीं थी। बालकनी में छोटा सिंक और शौचालय बना था। एक ब्रोकर ने बताया कि अंदर बाथरूम के लिए तय जगह नीचे रहने वाले परिवार के घर में बने मंदिर के कारण इस्तेमाल नहीं हो सकती थी। कहीं कमरे का आकार सिर्फ 6-7 फुट गुणा 4-5 फुट था तो कहीं दीवार की जगह गत्ते का पर्दा लगा था। दो-तीन छात्रों के कमरों में बिस्तर, रैक, मेज, किताबों और कपड़ों के कारण चलने तक की जगह नहीं बचती।

 

सत्य निकेतन के एक छात्र ने बताया कि कमरे के अंदर बाथरूम के लिए 5,000 से 6,000 रुपये ज्यादा देने पड़ते हैं। इसलिए ज्यादातर छात्र ऐसा कमरा लेते हैं, जिसमें एक छोटा बाथरूम दो या तीन कमरों के बीच शेयर करना होता है। छात्रों के अनुसार, खाने के बिना कमरे का किराया 6,000 रुपये तक और खाने के साथ 12,000 से 13,000 रुपये तक हो सकता है। टिफिन के लिए करीब 2,500 रुपये और बिजली का बिल अलग देना पड़ता है। पुराने फर्नीचर और उपकरणों के कारण भी परेशानी होती है और बिजली का बिल बढ़ सकता है। पढ़ाई की मेज के लिए छात्रों को 1,500 से 2,000 रुपये तक देने पड़ते हैं और कई बार प्लास्टिक की मेज ही मिलती है।

क्या बोले छात्र?

आईएएस की तैयारी कर रहे ऋतिक ने कहा कि कोई छात्र अगर वर्षों तक आईएएस की तैयारी या विश्वविद्यालय की पढ़ाई करे तो उसे बैठकर पढ़ने जैसी बुनियादी सुविधा के लिए भी अलग पैसे देने पड़ते हैं। किराया, बिजली और दूसरे खर्च मिलाकर रकम काफी ज्यादा हो जाती है। पुराने राजेंद्र नगर में छात्रों ने बताया कि कई बार ब्रोकर कमरा दिलाने का भरोसा देकर एडवांस पैसे लेते हैं और बाद में गायब हो जाते हैं। लखनऊ के एक छात्र ने बताया कि उसके रूममेट से ब्रोकर ने 10,000 रुपये लिए थे। उसने कहा कि ब्रोकर कमरा दिलाने के नाम पर 10,000 या 12,000 रुपये एडवांस लेते हैं और फिर गायब हो जाते हैं।

लगातार ठके जा रहे छात्र

उसने कहा कि छात्र मजबूर होते हैं। उन्हें कक्षाओं, परीक्षाओं और कोचिंग की चिंता होती है और ब्रोकर जानते हैं कि उनके पास ज्यादा खोजबीन करने का समय नहीं है। छात्रों ने बताया कि ऑनलाइन कमरों की तस्वीरें अक्सर असली स्थिति से अलग होती हैं। मोती बाग के एक छात्र ने कहा कि इंटरनेट पर साफ-सुथरे और रोशनी वाले कमरे दिखाए जाते हैं, लेकिन वहां पहुंचने पर स्थिति अलग होती है।

 

लक्ष्मी नगर में सीए और सीएस की तैयारी कर रही एक छात्रा पिछले साल से पांच मंजिला इमारत की छत पर बने टिन शेड में रह रही है। उसने बताया कि दोपहर तक कमरा इतना गर्म हो जाता है कि तुरंत एसी चलाना पड़ता है। गर्मियों में उसका बिजली बिल 5,000 रुपये तक पहुंच जाता है, जबकि दिन का काफी समय कोचिंग या लाइब्रेरी में बीतता है।

 

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बारिश बढ़ाती हैं परेशानी

बारिश के दिनों में परेशानी और बढ़ जाती है। कमला नगर के सेंट स्टीफंस कॉलेज के 22 साल के पोस्ट ग्रेजुएट छात्र ऑस्टिन ने बताया कि पीजी के आसपास की संकरी गलियों में बारिश के बाद पानी और कीचड़ भर जाता है। इससे कॉलेज, कोचिंग और लाइब्रेरी जाना मुश्किल हो जाता है। कमरों की पतली दीवारों से दूसरे कमरों की आवाजें आती हैं और दरवाजा बंद करने के बाद भी निजता नहीं रहती। एक छात्रा ने कहा कि बाहर से कुछ इमारतें नई और अच्छी दिखती हैं, लेकिन अंदर की स्थिति देखकर लगता है कि वे धीरे-धीरे खराब हो रही हैं।

सुरक्षा को खतरा

छात्रों ने उन इमारतों की सुरक्षा पर भी चिंता जताई, जिनके नीचे दुकानें और ऊपर छात्रों के कमरे हैं। बिहार के एक आईएएस अभ्यर्थी ने बताया कि कुछ छात्रावासों के नीचे मिठाई और चाट की दुकानें हैं, जहां पूरे दिन आग जलती रहती है। ऊपर तंग कमरों में छात्र रहते हैं। वहां तारों का जाल, संकरी सीढ़ियां, संकरे गलियारे और ठीक से साफ न किए गए बेसमेंट हैं। उसने कहा कि अगर किसी दुकान में आग लगकर पूरी इमारत में फैल गई तो छात्र कहां जाएंगे। इन इमारतों में इतनी भीड़ है कि एक हादसा सभी को खतरे में डाल सकता है।

 

दौलतराम कॉलेज की 19 वर्षीय छात्रा आकांक्षा ने बताया कि मई में उसके पीजी के पास बिजली के खंभे से आग लग गई थी। करीब 10-12 मिनट तक चिंगारियां निकलती रहीं और बालकनी में सूख रहे कपड़ों में आग लग गई। सत्य निकेतन में रहने वाली 18 वर्षीय छात्रा ने बताया कि रात में कम रोशनी वाली संकरी गलियां असुरक्षित लगती हैं। श्वेता ने कहा कि रात में यह जगह बिल्कुल अलग लगती है। पर्याप्त रोशनी नहीं होती और रास्ते में कौन खड़ा है, पता नहीं होता। एक लड़की के रूप में सूर्यास्त के बाद आसपास को लेकर बहुत सतर्क रहना पड़ता है।

 

छात्रों ने कहा कि दिनभर की भागदौड़ के बाद उनके कमरे ही उनका सहारा होते हैं। उन्होंने कहा कि साफ, सुरक्षित और किफायती आवास जरूरी है, खासकर उन छात्रों के लिए जो पढ़ाई के लिए दिल्ली आते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत तमाम कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई करने आने वाले इन छात्रों के लिए आवास की सुविधा नहीं है। ऐसे में यह छात्र शोषण का शिकार हो रहे हैं। साफ, सुरक्षित और किफायती आवास बुनियादी अधिकार है, खासकर उन छात्रों के लिए जो देश का भविष्य तैयार करेंगे। ऐसे में छात्र प्रशासन से लगातार सुरक्षित आवास प्रदान करने की मांग कर रहे हैं।