विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए कुछ नए नियम आए हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने इन संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने और जाति आधारित उत्पीड़न रोकने के लिए जो नियम जारी किए हैं, उनको लेकर सवर्ण स्टूडेंट्स इसके विरोध में उतर आए हैं। सोशल मीडिया पर इसके खिलाफ अभियान चलाए जा रहे हैं और सड़क पर भी इसके खिलाफ उतरने की तैयारी भी चल रही है। एक वर्ग इन नियमों को वापस लेने की मांग कर रहा है तो दूसरे वर्ग का मानना है कि इनके चलते ही विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोका जा सकेगा।
प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूट्स 2026 के नियम सभी उच्च शिक्षण संस्थानों पर लागू होंगे। इन संस्थानों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स के साथ-साथ टीचर और स्टाफ भी इसकी जद में आएंगे। मकसद है कि किसी भी स्टू़डेंट, स्टाफ या टीचर के खिलाफ जाति आधारित भेदभाव न होने दिया। साथ ही, किसी व्यक्ति के सम्मान और शिक्षण संस्थान के सम्मान की रक्षा की जा सके। अब छात्र चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इन नियमों को वापस नहीं लिया गया तो 26 जनवरी को बाद सड़क पर भी आंदोलन होगा। मृत्युंजय तिवारी नाम के एक शख्स ने यूजीसी रेगुलेशन, 2026 के रूल 3 (C) को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा है कि नए नियम जातिगत भेदभाव को सिर्फ OBC और SC-ST तक सीमित करते हैं।
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विरोध करने वालों का कहना है कि सैद्धांतिक तौर पर और लिखित रूप में भले ही ये नियम बेहद सीधे लग रहे हैं लेकिन जब इन्हें लागू करने की बारी आएगी तो दुरुपयोग होगा। आइए इस मामले को विस्तार से समझते हैं...
क्या बदलाव हुआ है?
शैक्षणिक संस्थानों में सबके साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए पहले भी नियम थे, इन्हीं को 'इक्विटी रूल्स' कहा जाता है। अब नए नियम आ गए हैं और ये इन्हीं इक्विटी रूल्स की जगह लेंगे। अब इन्हें लागू कराने की ज्यादा जिम्मेदारी संस्थान और उसे चलाने वाले लोगों यानी कि पदाधिकारियों पर होगी। कुछ गलत होता है तो वही जिम्मेदार माने जाएंगे। उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी और भारी भरकम जुर्माना भी लगाया जा सकता है। नए नियमों के तहत, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षिक स्तर पर पिछड़ा वर्ग, आर्थिक पिछड़ा वर्ग और दिव्यागों के प्रति होने वाले भेदभाव को रोकना होगा और इसके लिए संस्थानों को काम करना होगा।
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बड़ा बदलाव है कि पहले जातिगत भेदभाव की परिभाषा में सिर्फ SC-ST थे, अब ओबीसी को भी शामिल कर लिया गया है। यानी अगर इन समुदायों के लोगों से भेदभाव होता है तो कार्रवाई की जाएगी। पहली चिंता यही है कि जब 2012 के नियमों में OBC नहीं थे तो अब उन्हें क्यों शामिल कर लिया गया? अगर कर लिया गया तो इसमें सवर्णों को क्यों शामिल नहीं किया गया?

किस वजह से बदले गए नियम?
दरअसल, साल 2012 में यूजीसी ने नियम लागू किए थे जिनके तहत जातिगत भेदभाव पर रोक लगाया जाना था। जनवरी 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला नाम के एक स्टूडेंट ने जातिगत भेदभाव के आरोप लगाते हुए आत्महत्या कर ली थी। उसके बाद से कई ऐसे मामले चर्चा में आए जिसमें दलित और ओबीसी छात्रों की आत्महत्या ने शैक्षणिक संस्थानों को सवालों के घेरे में खड़ा किया।
हाल ही में शिक्षा, महिला, बाल और युवा मामलों की संसदीय समिति ने UGC के इन नियमों की समीक्षा की थी। इस कमेटी ने 8 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट सौंपी। कांग्रेस के राज्यसभा सांसद दिग्विजिय सिंह इस कमेटी के चेयरपर्सन हैं। इसी कमेटी की सूची पर ये नियम फाइनल हुए और जनवरी 2026 में इन नियमों को अधिसूचित किया गया है। समय के साथ संसदीय समिति ने यूजीसी के इन्हीं नियमों को अपडेट किया है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी के केस के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर ही ये नियम बनाए गए हैं।
विवाद और चिंताएं क्या हैं?
इन नियमों को लेकर कई चिंताएं सामने आ रही हैं और ऐसी चिंताओं की बड़ी वजह है कई चीजों पर स्पष्टता नहीं है। गलत और फर्जी शिकायतों की स्थिति में क्या होगा, आपसी झगड़ों के बाद किसी ने शिकायत कर दी तो क्या होगा और किसी ने दुश्मनी निकालने के लिए जातिगत भेदभाव से जुड़ी शिकायत की गई तो क्या होगा? विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि स्पष्टता न होने के चलते इसका दुरुपयोग किया जा सकता है।
सवर्ण छात्रों का कहना है कि नए नियमों के तहत, सामान्य वर्ग के छात्रों को पहले से ही दोषी और अन्य वर्गों के छात्रों को पीड़ित मान लिया गया है। इनका कहना है कि अगर झूठी शिकायत की जाती है तो आरोपी का करियर बर्बाद हो सकता है लेकिन ऐसी शिकायत करने वाले के खिलाफ कुछ नहीं होगा। पहले झूठी शिकायत पर जुर्माने का प्रावधान था लेकिन अब इसे हटा लिए जाने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि निजी दुश्मनी, आपसी झगड़े या ऐसे अन्य मामलों में भी उन्हें फंसाया जा सकता है। इसी के चलते इन नियमों का विरोध किया जा रहा है।
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एक और चिंता जताई जा रही है कि SC-ST या ओबीसी वर्ग के किसी छात्र को किसी परीक्षा में कम नंबर दिए जाते हैं तो वह छात्र अपने टीचर पर भी भेदभाव के आरोप लगा देगा। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि राज्य किसी भी व्यक्ति से भेदभाव नहीं करेगा और कानून की नजर में हर व्यक्ति बराबर होगा। अब आरोप लगाए जा रहे हैं कि यह कानून अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।
इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर (EOC) क्या है?
नए नियमों के मुताबिक, हर उच्च शिक्षण संसथान को एक इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर (EOC) बनाना अनिवार्य होगा। कैंपस में भेदभाव को रोकने का जिम्मा इसी EOC का होगा। काउंसलिंग करने, नियम लागू करने, जागरूकता फैलाने और शिकायतों का निपटारा करने का काम भी इसी EOC को करना होगा। जो छोटे कॉलेज होंगे वे संबंधित यूनिवर्सिटी की EOC के सहारे भी काम चला सकेंगे।
यही EOC सिविल सोसायटी की संस्थाओं, स्थानीय प्रशासन, पुलिस अधिकारियों और लीगल सर्विस वाली संस्थाओं से भी संपर्क में रहेगी और जरूरत के हिसाब से उनकी मदद लेगी।
इस EOC को एक इक्विटी कमेटी बनानी होगी जिसमें उस संस्थान के मुखिया को शामिल किया जाना अनिवार्य होगा। उनके अलावा, नॉन-टीचिंग स्टाफ के सदस्य, सीनियर फैकल्टी सदस्य, सिविल सोसायटी के सदस्य और छात्र प्रतिनिधि भी शामिल किए जाएंगे। नए नियमों के मुताबिक, इस कमेटी में महिला, दिव्यांग, SC-ST और ओबीसी प्रतिनिधियों को शामिल करना अनिवार्य होगा। साल में दो बार इसकी मीटिंग होगी और उस मीटिंग में समीक्षा की जाएगी कि शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई। इसी मीटिंग में चर्चा के बाद यह कमेटी अपनी रिपोर्ट भी सबमिट करेगी।
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इस कमेटी के अलावा इक्विटी स्कॉड और इक्विटी एंबेसडर भी होंगे। इक्विटी स्कॉड एक छोटी टीम होगी जिसके लोग कैंपस में संदिग्ध जगहों का दौरा करेंगे और नजर रखने का काम करेंगे। वहीं, इक्विटी एंबेसडर ऐसे लोग होंगे जो हॉस्टल, डिपार्टमेंट, लाइब्रेरी या ऐसी अन्य यूनिट में होंगे और अगर उनकी नजर में कहीं भेदभाव होता है तो वे इसकी शिकायत कर सकेंगे। मतलब अब ऐसे मामलों की हमेशा निगरानी की जाएगी।
साथ ही, एक इक्विटी हेल्पलाइन भी सभी संस्थानों में रखी जाएगी ताकि लोग अपनी शिकायत दर्ज करा सकें। अगर शिकायत करने वाला चाहे तो उसकी पहचान गोपनीय रखी जाएगी। अगर यह पाया जाता है कि कहीं कानून का उल्लंघन हो रहा है तो तुरंत इसकी सूचना पुलिस को देनी होगी।
शिकायत और समाधान
नए नियमों के मुताबिक, अगर कोई शिकायत आती है तो उसका समाधान निश्चित समयसीमा में करना होगा। पीड़ित शख्स ईमेल, ऑनलाइन पोर्टल, लिखित शिकायत या हेल्पलाइन के जरिए अपनी शिकायत दर्ज करा सकेगा और इक्विटी कमेटी को 24 घंटे में इस पर कार्रवाई करनी होगी। कमेटी 15 दिन में अपनी रिपोर्ट सबमिट करेगी। रिपोर्ट के बाद संस्थान के मुखिया के पास कार्रवाई करने के लिए 7 दिन का समय होगा। अगर संस्थान के मुखिया ही पीड़ित या शिकायतकर्ता हों तो EOC के कोऑर्डिनेटर इस जांच की अगुवाई करेंगे।
अब अगर कोई शख्स कमेटी की रिपोर्ट से सहमत नहीं है तो वह 30 दिन में इसकी शिकायत लोकपाल से कर सकेगा। लोकपाल को इसकी जांच 30 दिन में करानी होगी। इस सब पर UGC नजर भी रखेगा। UGC की टीम कहीं पर भी औचक निरीक्षण कर सकती है। जहां इन नियमों का पालन नहीं होता पाया जाएगा, उन संस्थानों को डीबार किया जा सकता है, उन्हें डिग्री देने का कोर्स चलाने से रोका जा सकता है और UGC की लिस्ट से निकाला भी जा सकता है।
