उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बदायूं से बरेली तक सियासी हलचल तेज हो गई है। एक तरफ बदायूं में पूर्व विधायक सिनोद कुमार शाक्य और कुशाग्र सागर समाजवादी पार्टी में शामिल हुए हैं, तो दूसरी तरफ बरेली की आंवला लोकसभा सीट से दो बार सांसद रहे धर्मेंद्र कश्यप ने भी भारतीय जनता पार्टी छोड़कर सपा का दामन थाम लिया है। धर्मेंद्र कश्यप के साथ उनकी बेटी कीर्ति कश्यप भी सपा में शामिल हुई हैं। पार्टी ने कीर्ति कश्यप को बरेली की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार घोषित कर दिया है। इससे बदायूं और बरेली की राजनीति में नए समीकरणों को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
बदायूं और बरेली को मिलाकर कुल 15 विधानसभा सीटें हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में इनमें से 10 सीटों पर BJP और पांच पर सपा ने जीत दर्ज की थी। बदायूं में दोनों दलों को तीन-तीन सीटें मिली थीं, जबकि बरेली की नौ सीटों में BJP ने सात और सपा ने दो सीटों पर कब्जा किया था। अब सपा में नेताओं की नई एंट्री और पुराने नेताओं की वापसी के बीच सवाल उठ रहा है कि 2027 में इन सीटों पर मुकाबले की तस्वीर किस तरह बदल सकती है।
बदायूं में तीन-तीन सीटों पर बराबरी
2022 के चुनाव में बदायूं जिले की छह विधानसभा सीटों में BJP और सपा ने तीन-तीन सीटें जीती थीं। बिसौली से सपा के आशुतोष मौर्य, सहसवान से बृजेश यादव और शेखूपुर से हिमांशु यादव विधायक बने थे। वहीं बदायूं सदर से BJP के महेश चंद्र गुप्ता, बिल्सी से हरीश चंद्र शाक्य और दातागंज से राजीव कुमार सिंह ने जीत हासिल की थी।अब बदायूं में सपा की रणनीति को लेकर चर्चा तेज है। दातागंज से पूर्व विधायक सिनोद कुमार शाक्य और बिसौली के पूर्व विधायक कुशाग्र सागर सपा में शामिल हो गए हैं।
सिनोद शाक्य पहले बीएसपी और सपा में रह चुके हैं, जबकि कुशाग्र सागर BJP के टिकट पर 2017 में बिसौली से विधायक बने थे। 2022 के चुनाव में उन्हें सपा के आशुतोष मौर्य से हार का सामना करना पड़ा था। दोनों पूर्व विधायकों की सपा में एंट्री से दातागंज और बिसौली में पार्टी के संगठनात्मक समीकरण बदल सकते हैं। हालांकि, इन नेताओं को आगामी चुनाव में टिकट मिलेगा या पार्टी उन्हें कोई दूसरी जिम्मेदारी सौंपेगी, इस पर अभी फैसला नहीं हुआ है।
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आंवला के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप की सपा में एंट्री
बरेली जिले की आंवला लोकसभा सीट से BJP के टिकट पर 2014 और 2019 में सांसद चुने गए धर्मेंद्र कश्यप 27 अक्टूबर 2026 को सपा में शामिल हो गए। उन्होंने लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की मौजूदगी में सदस्यता ग्रहण की। धर्मेंद्र कश्यप इससे पहले सपा और बीएसपी में भी रह चुके हैं। वह 2002 में बिथरी चैनपुर से बीएसपी के टिकट पर विधायक बने थे और 2007 में सपा के टिकट पर चुनाव जीते थे। बाद में वह BJP में शामिल हो गए और आंवला से दो बार सांसद बने।
2024 के लोकसभा चुनाव में धर्मेंद्र कश्यप को आंवला सीट पर सपा के नीरज मौर्य से हार का सामना करना पड़ा था। BJP छोड़ने के बाद उन्होंने पार्टी संगठन में पिछड़े और अति पिछड़े समाज की उपेक्षा का आरोप लगाया था। सपा में शामिल होने के बाद उन्होंने कश्यप और निषाद समाज के बीच पार्टी को मजबूत करने की बात कही। धर्मेंद्र कश्यप की बेटी कीर्ति कश्यप भी उनके साथ सपा में आई हैं। सपा ने उन्हें बरेली की बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से उम्मीदवार घोषित किया है। इस सीट पर 2022 में BJP के डॉ. राघवेंद्र शर्मा ने जीत दर्ज की थी। ऐसे में 2027 के चुनाव में बिथरी चैनपुर पर होने वाला मुकाबला भी चर्चा में रहेगा।
बरेली की नौ सीटों में BJP ने जीती थीं सात
बरेली जिले की नौ विधानसभा सीटों में 2022 में BJP ने सात सीटें जीती थीं, जबकि सपा को दो सीटों पर सफलता मिली थी। भोजीपुरा से सपा के शहजिल इस्लाम और बहेड़ी से अताउर रहमान विधायक चुने गए थे। बाकी सात सीटों पर BJP के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। बरेली में BJP के सामने अपनी मौजूदा सीटों को बचाए रखने की चुनौती रहेगी। दूसरी तरफ सपा की कोशिश होगी कि भोजीपुरा और बहेड़ी में अपनी स्थिति कायम रखने के साथ अन्य सीटों पर भी मुकाबले को मजबूत बनाया जाए। धर्मेंद्र कश्यप और उनकी बेटी कीर्ति कश्यप की सपा में एंट्री से पार्टी को स्थानीय स्तर पर नए नेताओं और समर्थकों का साथ मिल सकता है, लेकिन इसका चुनावी असर आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा।
OBC समीकरण पर भी रहेगी नजर
बदायूं और बरेली में शाक्य, मौर्य, कुर्मी, कश्यप, निषाद और यादव समेत विभिन्न सामाजिक समूहों की राजनीतिक भूमिका पर चर्चा होती रही है। ऐसे में पिछड़े वर्गों से जुड़े नेताओं की दल-बदल गतिविधियां चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती हैं। सपा में सिनोद शाक्य, कुशाग्र सागर और धर्मेंद्र कश्यप जैसे नेताओं का शामिल होना पार्टी के लिए संगठन विस्तार का अवसर है। वहीं BJP के लिए अपने पुराने कार्यकर्ताओं को साथ बनाए रखने और स्थानीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने की चुनौती रहेगी। हालांकि, किसी नेता के पार्टी बदलने से पूरा समुदाय उसी पार्टी के पक्ष में मतदान करेगा, यह मान लेना सही नहीं होगा। चुनाव में उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे, संगठन और मतदाताओं का रुख भी अहम भूमिका निभाते हैं।
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2027 से पहले दोनों दलों के सामने अलग-अलग चुनौती
2022 के नतीजों के हिसाब से बदायूं में BJP और सपा बराबरी पर थीं, जबकि बरेली में BJP को स्पष्ट बढ़त मिली थी। अब बदायूं में पूर्व विधायकों की सपा में वापसी और आंवला के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप का पार्टी में शामिल होना राजनीतिक चर्चा के केंद्र में है। कीर्ति कश्यप को बिथरी चैनपुर से उम्मीदवार घोषित किए जाने से सपा ने बरेली में अपनी चुनावी तैयारी का संकेत भी दिया है। BJP के लिए बदायूं की अपनी तीन सीटें बचाने और बरेली में सात सीटों पर मिली पिछली जीत को बरकरार रखने की चुनौती होगी।
सपा को नए नेताओं को संगठन में समायोजित करने, पुराने कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल बैठाने और अपनी पांच मौजूदा सीटों से आगे बढ़ने की कोशिश करनी होगी।बदायूं से बरेली तक कुल 15 सीटों की यह सियासी तस्वीर 2027 के चुनाव से पहले बदलती राजनीतिक गतिविधियों को सामने लाती है। फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन बदलावों से किस दल को कितना फायदा होगा, लेकिन नेताओं की लगातार आवाजाही ने दोनों दलों की चुनावी तैयारियों को चर्चा में जरूर ला दिया है।
