उत्तर प्रदेश के जिला बलिया में 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी मुकाबला दिलचस्प होता जा रहा है। जिले की सात सीटों पर समाजवादी पार्टी (सपा) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बीच कड़ी टक्कर के आसार हैं। 2012 में सपा ने पांच सीटें जीतीं, 2017 में बीजेपी ने पांच सीटों पर कब्जा किया, जबकि 2022 में सपा ने तीन सीटों के साथ वापसी की। 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्रवार बढ़त ने दोनों दलों के सामने नई चुनौती खड़ी की है।

बलिया नगर में नारद राय की बीजेपी में एंट्री, रसड़ा में उमाशंकर सिंह के निधन से बसपा के सामने नेतृत्व का संकट और बांसडीह में केतकी सिंह की स्थिति चुनावी समीकरण को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में 2027 में बीजेपी के सामने जिले में अपना प्रभाव बढ़ाने और सपा के सामने अपनी बढ़त को जीत में बदलने की चुनौती होगी।

बलिया की सात विधानसभा सीटें तीन लोकसभा क्षेत्रों में फैली हैं। बैरिया, बलिया नगर और फेफना बलिया लोकसभा क्षेत्र में, बेल्थरा रोड, सिकंदरपुर और बांसडीह सलेमपुर में, जबकि रसड़ा घोसी लोकसभा क्षेत्र में शामिल है।2012 में सपा ने पांच सीटें जीतीं। 2017 में बीजेपी ने पांच सीटों पर कब्जा किया। 2022 में सपा को तीन, बीजेपी को दो और बसपा व सुभासपा को एक-एक सीट मिली। नतीजे बताते हैं कि बलिया में प्रत्याशी और गठबंधन का प्रभाव भी निर्णायक रहता है।

बैरिया: सपा की बढ़त, बीजेपी की चुनौती

2012 में सपा के जयप्रकाश अंचल, 2017 में बीजेपी के सुरेंद्र सिंह और 2022 में फिर जयप्रकाश अंचल ने जीत दर्ज की। 2024 में सपा को यहां 6,248 मतों की बढ़त मिली। 2027 में बीजेपी के सामने सपा की इस बढ़त को खत्म कर सीट पर अपना प्रभाव दोबारा स्थापित करने की चुनौती होगी।

बलिया नगर: नारद राय से बीजेपी को उम्मीद

2012 में सपा के नारद राय, 2017 में बीजेपी के आनंद स्वरूप शुक्ल और 2022 में बीजेपी के दयाशंकर सिंह जीते। दयाशंकर सिंह ने नारद राय को 26,239 मतों से हराया था। 2024 में बीजेपी को 5,682 मतों की बढ़त मिली। नारद राय के बीजेपी में आने से पार्टी को उनके व्यक्तिगत प्रभाव का लाभ मिल सकता है। बीजेपी के सामने उनके समर्थकों को पार्टी के साथ जोड़ने की चुनौती होगी, जबकि सपा को इस सीट पर अपनी स्थिति मजबूत करनी होगी।

 

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बांसडीह: केतकी सिंह के सामने दोहराव की चुनौती

2012 और 2017 में सपा के रामगोविंद चौधरी जीते, जबकि 2022 में बीजेपी की केतकी सिंह ने उन्हें हराया। 2024 में बीजेपी को 8,600 मतों की बढ़त मिली। हालांकि, स्थानीय स्तर पर केतकी सिंह को लेकर नाराजगी की चर्चा भी रही है। 2027 में बीजेपी के सामने जीत दोहराने और सपा के सामने पुराने प्रभाव को वापस हासिल करने की चुनौती होगी।

फेफना: संग्राम यादव बनाम उपेंद्र तिवारी

 

2012 और 2017 में बीजेपी के उपेंद्र तिवारी जीते, जबकि 2022 में सपा के संग्राम सिंह यादव ने उन्हें हराया। 2024 में सपा को 3,398 मतों की बढ़त मिली। उपेंद्र तिवारी की सक्रियता बीजेपी संगठन को मजबूती देने में अहम मानी जा रही है। 2027 में सपा के सामने अपनी सीट बचाने और बीजेपी के सामने उपेंद्र तिवारी के जरिए वापसी करने की चुनौती होगी।

सिकंदरपुर: सुभासपा के बदले गठबंधन की परीक्षा

2012 में सपा के जियाउद्दीन रिजवी, 2017 में बीजेपी के संजय यादव और 2022 में फिर रिजवी जीते। 2024 में सपा को 7,380 मतों की बढ़त मिली। सुभासपा के सपा गठबंधन से निकलकर एनडीए में आने के बाद समीकरण बदल गए हैं। बीजेपी और सुभासपा के सामने पुराने समर्थन को नए गठबंधन के पक्ष में बनाए रखने की चुनौती होगी, जबकि सपा अपनी बढ़त को कायम रखने की कोशिश करेगी।

रसड़ा: बसपा की विरासत पर संकट

उमाशंकर सिंह ने 2012, 2017 और 2022 में लगातार जीत दर्ज की थी। 5 अगस्त 2026 को उनके निधन के बाद बसपा के सामने स्थानीय नेतृत्व और राजनीतिक विरासत संभालने की चुनौती है। 2024 में रसड़ा विधानसभा क्षेत्र में सपा को 5,117 मतों की बढ़त मिली थी। बीजेपी और सपा दोनों के लिए यहां बसपा के पुराने प्रभाव को चुनौती देना महत्वपूर्ण होगा।

बेल्थरा रोड: हंसू राम के सामने समर्थन बचाने की चुनौती

आरक्षित सीट पर 2012 में सपा के गोरख पासवान, 2017 में बीजेपी के धनंजय कनौजिया और 2022 में सुभासपा के हंसू राम जीते। 2024 में सपा को 9,700 मतों की बढ़त मिली। सपा गठबंधन के साथ चुनाव जीतने के बाद एनडीए में आए हंसू राम के सामने बदले समीकरण में अपना जनाधार बनाए रखने की चुनौती होगी। बीजेपी और सुभासपा के लिए सपा की बढ़त को खत्म करना अहम होगा।

 

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बीजेपी और सपा के सामने बड़ी चुनौती

2027 के चुनाव में बीजेपी के सामने बलिया में अपना प्रभाव मजबूत करने, नारद राय की राजनीतिक ताकत का लाभ उठाने और सपा की विधानसभा क्षेत्रवार बढ़त को खत्म करने की चुनौती होगी। वहीं सपा के सामने 2024 में मिली बढ़त को विधानसभा चुनाव में जीत में बदलना, अपने पुराने जनाधार को मजबूत रखना और बीजेपी के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव को रोकना महत्वपूर्ण होगा।

बसपा के सामने रसड़ा में उमाशंकर सिंह की विरासत संभालने और सुभासपा के सामने बदले गठबंधन में अपना समर्थन बनाए रखने की चुनौती है।बलिया की सात सीटों पर 2027 का चुनाव सपा और बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई बन सकता है। पिछले चुनावों में बदलते नतीजे बताते हैं कि जिले में किसी दल का स्थायी दबदबा नहीं है। नारद राय की बीजेपी में एंट्री, रसड़ा में बसपा का नेतृत्व संकट और सुभासपा के गठबंधन परिवर्तन से चुनावी गणित प्रभावित होने की संभावना है।