इस साल 10 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र पर्व की शुरुआत होगी, जब सभी लोग मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना करेंगे। शारदीय नवरात्र के दौरान कई लोग तंत्र पूजा पद्धति का भी पालन करते हैं। धार्मिक जानकारों के अनुसार, नकारात्मक शक्तियों से अपनी रक्षा के लिए मां दुर्गा की आराधना की जाती है। इसी के साथ माना जाता है कि तंत्र पूजा पद्धति के जरिए लोग नकारात्मक शक्तियों से बच सकते हैं। हालांकि, आज के दौर में तंत्र को लेकर समाज में अलग-अलग धारणाएं हैं। अक्सर लोग तंत्र पूजा का नाम सुनकर ही डर जाते हैं क्योंकि समाज में इसे लेकर कई तरह के भ्रम फैले हुए हैं। लोगों को लगता है कि तंत्र पूजा करना विनाशकारी होता है। इसके विपरीत, दुर्गा सप्तशती में कुछ खास परिस्थितियों में तंत्र पूजा को मंगलकारी मानने से जुड़ी धार्मिक धारणाएं प्रचलित हैं।

 

इस साल 11 से लेकर 19 अक्टूबर तक शारदीय नवरात्र पर्व मनाया जाएगा। इसके बाद 20 अक्टूबर को विजयादशमी मनाई जाएगी। दुर्गा सप्तशती एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें देवी उपासना से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं का वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ में 700 श्लोक हैं। अब सवाल उठता है कि किस समय तांत्रिक पूजा को व्यक्ति के लिए मंगलकारी माना जाता है।

 

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शारदीय नवरात्र में होती है तंत्र पूजा

नवरात्र पर्व के दौरान सिर्फ सामान्य पूजा-पाठ ही नहीं किया जाता, बल्कि इस पर्व के दौरान कई साधक तंत्र पूजा भी करते हैं। असम का कामाख्या मंदिर तंत्र साधना के प्रमुख केंद्रों में से एक माना जाता है। इसी प्रकार, नवरात्र में मां दुर्गा के कई स्वरूपों की तंत्र पद्धति से पूजा की जाती है। मां काली, मां बगलामुखी और मां मातंगी जैसे कई स्वरूप हैं, जिनकी तंत्र पद्धति से पूजा कई साधक करते हैं।

कब है तंत्र पूजा मंगलकारी?

दुर्गा सप्तशती और तंत्र परंपराओं से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तंत्र पूजा का उद्देश्य किसी दूसरे व्यक्ति को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि साधना के माध्यम से आध्यात्मिक उन्नति करना माना जाता है। कुछ परंपराओं में तंत्र पूजा को नकारात्मक ऊर्जा और भय से मुक्ति पाने की साधना के रूप में देखा जाता है। तंत्र पूजा पद्धति के जरिए लोगों को उनके तंत्र दोष या नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त कराने के दावे भी किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नकारात्मकता से बचने और आध्यात्मिक शांति पाने के उद्देश्य से की जाने वाली साधना को मंगलकारी माना जाता है।

 

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हिंदू धर्म की कुछ परंपराओं में तंत्र शब्द का संबंध भय और बंधनों से मुक्ति तथा चेतना के विकास से भी जोड़ा जाता है। इसी कारण तंत्र पूजा के माध्यम से व्यक्ति अपनी चेतना को नकारात्मक विचारों से बचाने और आध्यात्मिक साधना करने का कोशिश करते है।

 

तनोति विपुलान् अर्थान् तत्त्वमन्त्रसमन्वितान्।
त्राणं च कुरुते यस्मात् तन्त्रमित्यभिधीयते॥

 

इस श्लोक का भावार्थ है कि जो तत्त्व और मंत्र से जुड़े व्यापक ज्ञान का विस्तार करे तथा रक्षा का मार्ग बताए, उसे तंत्र कहा जाता है। इस व्याख्या के जरिए तंत्र को ज्ञान, साधना और आध्यात्मिक रक्षा से जोड़कर देखा जाता है। इसका आशय यह है कि तंत्र पूजा को केवल जादू-टोने के रूप में देखना उचित नहीं है। तंत्र परंपराओं में ज्ञान, साधना और चेतना के विकास को भी महत्व दिया जाता है।

 

नोट: यह लेख धार्मिक मान्यताओं और धर्मग्रंथों पर आधारित है। हम इन मान्यताओं और दावों की  पुष्टि नहीं करते है।