आज के दिन पूरे देश में राधा अष्टमी का पावन पर्व मनाया जाएगा। जहां सभी भक्त राधा रानी और कृष्ण भगवान की पूजा-पाठ करेंगे, साथ ही लाखों लोग आज के दिन व्रत रखेंगे। धार्मिक मान्यता के अनुसार राधा अष्टमी के दिन व्रत रखना बेहद शुभ है। व्रत रखने के साथ व्यक्ति को राधा अष्टमी पर किशोरी जी से जुड़ी एक कथा सुननी चाहिए। इसके साथ ही व्यक्ति को शुभ मुहूर्त के हिसाब से काम करना चाहिए, ताकि व्यक्ति को राधा रानी का आशीर्वाद मिले।
राधा अष्टमी को राधा जयंती के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन राधा रानी का जन्मदिन मनाया जाता है। इस त्योहार को उत्तर प्रदेश के ब्रज क्षेत्र में बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। आइए जानते हैं राधा अष्टमी के व्रत के नियम, शुभ मुहूर्त और व्रत की कथा क्या है।
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राधा अष्टमी का शुभ मुहूर्त
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार राधा जी का जन्म दोपहर के 12 बजे हुआ था। इस वजह से भक्तों को दोपहर के समय विधिवत तरीके से पूजा-पाठ करनी चाहिए। पंचांग के मुताबिक, नई दिल्ली में पूजा करने का सबसे शुभ समय सुबह 11:01 से लेकर 1:28 बजे तक है। इस दौरान व्यक्ति को पूजा-पाठ करना चाहिए।
पूजा की विधि
इस दिन सुबह उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद अपने घर के पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। साथ ही राधा रानी और कृष्ण भगवान की प्रतिमा के आसपास सजावट करें। सजावट करने के बाद 11:01 के बाद पूजा करें।
पूजा करते वक्त घी का दीपक जलाएं, जिसके बाद राधा रानी की प्रतिमा के समक्ष फूल, फल और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा करने के बाद पूरे परिवार को एक साथ मिलकर कथा सुननी चाहिए, जिसके बाद आरती करनी चाहिए।
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राधा अष्टमी की कथा
धार्मिक ग्रंथ पद्म पुराण में राधा जी के जन्म से जुड़ी कहानी बताई गई है। जिसके अनुसार, द्वापर युग में एक दिन वृषभानु जी यमुना नदी में स्नान करने गए थे। उसी समय वृषभानु जी को कमल के फूल में बेहद सुंदर कन्या मिली थी। जिसके बाद यमुना नदी के पास ब्रह्मा देव प्रकट हुए, जिन्होंने वृषभानु जी को बताया कि पिछले जन्म में वृषभानु जी ने कठिन तपस्या की थी, ताकि लक्ष्मी जी बेटी के रूप में उन्हें मिलें। साथ ही ब्रह्मा जी ने बताया कि जो कन्या कमल के पत्तों में जन्मी है, वह लक्ष्मी जी का ही एक रूप है। यह बात जानकर वृषभानु जी बेहद खुश हुए।
वृषभानु जी और उनकी पत्नी कीर्तिदा की कोई संतान नहीं थी। इसी कारण वृषभानु जी उस कन्या को अपनी गोद में उठाकर घर ले गए। कन्या को देखने के बाद कीर्तिदा जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। कीर्तिदा जी ने धार्मिक अनुष्ठान किए। साथ ही ब्राह्मणों और गायों को दान दिया।
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राधा रानी ने क्यों लिया जन्म?
ब्रह्मवैवर्त पुराण में राधा रानी के जन्म को लेकर एक कथा बताई गई है। जिसके अनुसार, राधा रानी और कृष्ण भगवान गोलोक धाम में रहते थे। तभी एक बार राधा रानी किसी काम की वजह से श्रीकृष्ण के साथ नहीं थीं। तो राधा जी की अनुपस्थिति में कृष्ण अपनी सखी विरजा के साथ टहल रहे थे। यह देख राधा रानी बेहद नाराज हो गईं, साथ ही कृष्ण भगवान को कठोर शब्द कहने लगीं।
यह देखकर श्रीकृष्ण के प्रिय मित्र श्रीदामा दुखी हो गए। जब श्रीदामा को राधा जी पर गुस्सा आने लगा था, तब उन्होंने राधा जी को श्राप दिया कि उन्हें गोलोक छोड़कर धरती लोक में जन्म लेना पड़ेगा। धार्मिक जानकारों के अनुसार, इसी श्राप की वजह से राधा जी का धरती लोक में जन्म हुआ। जबकि श्राप देने की वजह से श्रीदामा को शंखचूड़ नाम के राक्षस के रूप में जन्म लेना पड़ा।
जब श्रीदामा ने श्राप दे दिया था, तब श्रीकृष्ण ने राधा रानी को बताया कि वे पृथ्वी पर वृषभानु जी और कीर्तिदा देवी की बेटी के रूप में जन्म लेंगी। जिसके बाद उनका विवाह रायाण के साथ हुआ, जो कि श्रीकृष्ण का एक अवतार है। धरती लोक पर समय बिताने के बाद राधा जी गोलोक में वापस चली गईं।
नोट- यह लेख धार्मिक मान्यताओं और गणनाओं पर आधारित है। इसकी पुष्टि हम नहीं करते हैं।
