पंजाब में अगले साल की शुरुआत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर नशे का मुद्दा सबसे अहम मुद्दा बन गया है। पंजाब के मानसा में बीते दिन एक एंटी ड्रग ऐक्टिविस्ट परविंदर सिंह झोटा की गोली मारकर हत्या कर दी गई, जिसके बाद से पूरे पंजाब में नशे का मुद्दा फिर से चर्चा में है। गुरुद्वारों से लेकर सामाजिक संगठन तक और आम लोग भी लगातार बढ़ते नशे पर चिंता जाहिर कर चुके हैं। पंजाब में हर चुनाव में तमाम राजनीतिक पार्टियां नशे को खत्म करने का वादा करती हैं लेकिन अभी तक इस मोर्चे पर कोई भी सरकार कुछ खास प्रदर्शन नहीं कर पाई है। 

 

15 दिसंबर 2015 को बठिंडा में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष का पद संभालने के मौके पर आयोजित बड़ी रैली में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने धार्मिक ग्रंथ गुटका साहिब हाथ में लेकर वादा किया था कि मुख्यमंत्री बनने पर वह चार सप्ताह में नशे की समस्या की कमर तोड़ देंगे। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना पूरा कैंपेन शिरोमणि अकाली दल पर नशे को बढ़ावा देने और अपनी सरकार बनने पर नशा खत्म करने के वादे पर ही खड़ा किया। 

 

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अकाली सरकार में बना बड़ा मुद्दा

पंजाब में नशे का मुद्दा 2012 से 2017 तक प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व वाली अकाली दल-बीजेपी सरकार के दौरान भी बड़ा राजनीतिक विवाद रहा। उस समय विपक्ष ने नशे की तस्करी और युवाओं में बढ़ती लत को लेकर सरकार पर सवाल उठाए थे। 2018 में विधानसभा में पेश CAG की रिपोर्ट ने भी नशे के मामलों की जांच में गंभीर कमियां उजागर कीं। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2016-17 में नशीले पदार्थों से जुड़े मामलों में बरी हुए 756 आरोपियों में से 532 पुलिस की गवाही में कमियों के कारण बरी हुए थे। इसके बाद तो सरकार इस मुद्दे पर बैकफुट पर ही रही। 

2017 में सत्ता परिवर्तन

2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सत्ता में आई तो जनता को उम्मीद थी की नशे के कारोबार की कमर तोड़ने का वादा सरकार पूरा करेगी। उनकी सरकार ने शुरुआती दौर में कार्रवाई तेज करने और नशा तस्करों के खिलाफ सख्त कदम उठाने की घोषणा की और जनता का सरकार में विश्वास स्थापित करने की कोशिश की गई।

 

हालांकि, नशे की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। चार सप्ताह में नशे की कमर तोड़ने का वादा करने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह साढ़े चार साल से ज्यादा समय तक सरकार के मुखिया रहे लेकिन वह नशे को खत्म नहीं करवा पाए। इसी साल मशहूर अखबार द ट्रिब्यून में उन्होंने अपने लेख में स्वीकार किया कि पंजाब का नशा विरोधी अभियान अधूरा रह गया। उन्होंने कहा कि केवल गिरफ्तारियों को सफलता का पैमाना नहीं माना जा सकता, क्योंकि नशे की सप्लाई के पीछे मौजूद व्यापक नेटवर्क को तोड़ना भी जरूरी है।

AAP का तीन महीने वाला वादा

2022 में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपना कैंपेन नशे के मुद्दे पर ही खड़ा किया था। अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान ने वादा किया था कि उनकी सरकार बनने के तीन महीने के भीतर सरकार नशा खत्म कर देगी। जनता ने उन्हें पूरा समर्थन दिया और भारी बहुमत के साथ भगवंत मान पंजाब के सीएम बने। इसके बाद सरकार की ओर से कार्रवाई शुरू की गई लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला।

 

सरकार नशा खत्म करने की डेडलाइन लगातार बढ़ाती गई। सरकार ने नशे के खिलाफ युद्ध शुरू किया लेकिन जमीनी स्तर पर इसका भी व्यापक असर देखने को नहीं मिला। अब मुख्यमंत्री ने नशा विरोधी अभियान और कानून-व्यवस्था की समीक्षा के लिए 16 अक्टूबर को अधिकारियों की बैठक बुलाने की घोषणा की है। हालांकि, इससे पहले ही खुद उनके विधायक यह स्वीकार कर चुके हैं कि नशा खत्म करने के मोर्चे पर उनकी सरकार असफल रही है। 

 

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आगे क्या?

पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होंगे और हर बार की तरह इस बार भी नशा पंजाब में एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इस बार बीजेपी भी एक बड़ी ताकत के रूप में चुनाव लड़ने जा रही है। अमित शाह ने पंजाब में एक रैली में कहा कि बीजेपी की सरकार बनाओ, पंजाब को 31 दिसंबर 2029 तक नशा मुक्त कर देंगे। अमृतपाल की पार्टी भी नशे के मुद्दे पर अपना चुनावी अभियान चला रही है। हालांकि, अभी तक नशे को खत्म करने के लिए कोई भी राजनीतिक दल ना तो कोई ठोस प्लान सामने रख पाया है और ना ही कोई सरकार कोई ठोस कार्रवाई कर पाई है।