दिल्ली हाई कोर्ट ने यौन उत्पीड़न के एक मामले की सुनवाई के दौरान महिलाओं के कपड़ों और उनके चरित्र को लेकर की जाने वाली टिप्पणियों पर सख्त नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह सोच बेहद चिंताजनक और अस्वीकार्य है कि जींस पहनने वाली महिला से लड़के भटक सकते हैं। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने कहा कि लड़कियों और महिलाओं के कपड़ों पर नियंत्रण करने के बजाय माता-पिता और समाज को बच्चों को अपने व्यवहार पर नियंत्रण रखना और दूसरों की निजी सीमाओं का सम्मान करना सिखाना चाहिए।

 

हाई कोर्ट ने 2013 के इस मामले में निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया जिसमें आरोपी को बरी किया गया था। कोर्ट ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A के तहत यौन उत्पीड़न का दोषी माना है। हालांकि, शिकायतकर्ता की उम्र 18 साल से कम होने का पर्याप्त सबूत नहीं मिलने के कारण कोर्ट ने मामले में पॉक्सो एक्ट के तहत आरोप को बरकरार नहीं रखा।

 

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हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने महिला के कपड़ों को लेकर पूछे गए सवालों पर भी आपत्ति जताई। जस्टिस सुधा ने कहा कि कोई लड़की या महिला क्या पहनकी है यह उसका निजी फैसला है। पड़ोसी, समाज, आरोपी या अदालत में पेश होने वाला वकील उसे कपड़ों के बारे में निर्देश नहीं दे सकता। कोर्ट ने कहा कि जिरह के दौरान महिला से पश्चिमी कपड़ों, जींस और टॉप को लेकर सवाल किए गए। इन सवालों का उसकी गवाही की सच्चाई जांचने से कोई संबंध नहीं था। कोर्ट के मुताबिक, ऐसे सवाल महिला को शर्मिंदा और परेशान करने वाले थे।

 

अदालत ने साफ किया कि किसी महिला का चरित्र उसके साथ होने वाले उत्पीड़न को सही नहीं ठहरा सकता। कोर्ट ने कहा कि महिला को अपनी निजता और शरीर की सुरक्षा का अधिकार है। उसकी इच्छा के खिलाफ कोई भी व्यक्ति उसके साथ गलत व्यवहार नहीं कर सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी महिला को चरित्रहीन बताने की कोशिश की जाए तब भी उसकी गवाही को सिर्फ इसी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।

 

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जिरह के नाम पर अपमान की इजाजत नहीं

जस्टिस सुधा ने न्यायिक अधिकारियों को भी निर्देश दिया कि जिरह के नाम पर किसी गवाह को अपमानित, डराया या परेशान नहीं किया जाना चाहिए। अगर सवाल मामले से संबंधित नहीं हैं या किसी की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं, तो जज को उन्हें तुरंत रोकना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यौन अपराध के पीड़ितों, बच्चों और अन्य कमजोर गवाहों के मामले में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। अदालत की कार्यवाही उनके लिए दोबारा मानसिक आघात का कारण नहीं बननी चाहिए।

किस मामले पर कोर्ट की आई टिप्पणी?

यह मामला 17 जुलाई 2013 का है। शिकायतकर्ता ने आरोपी पर पीछा करने, अश्लील टिप्पणियां करने और उसके गाल व कूल्हे छूने का आरोप लगाया था। हाई कोर्ट ने गाल छूने और आपत्तिजनक टिप्पणियों को यौन उत्पीड़न माना। हालांकि, उम्र साबित करने से जुड़े दस्तावेजों में कमियों के कारण पॉक्सो एक्ट लागू नहीं किया गया। आरोपी को सजा पर सुनवाई के लिए 12 अगस्त को कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया गया है।