बिहार विधान परिषद की 10 सीटों (9 नियमित और 1 उपचुनाव) के लिए चुनावी तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है। एनडीए ने अपने हिस्से की नौ सीटों पर रणनीति तय कर ली है। भाजपा और जदयू ने चार-चार उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं, जबकि एक सीट राष्ट्रीय लोक मोर्चा के खाते में पहले से लगभग तय मानी जा रही है। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उस एक बची हुई सीट को लेकर है, जिस पर एनडीए के दो बड़े सहयोगी दलों के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई छिड़ी हुई है। राजनीतिक गलियारों में सवाल यही है कि आखिर यह सीट किसे मिलेगी। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की पार्टी को या पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी की पार्टी को?
आरएलएम की सीट पर कोई संशय नहीं
एनडीए के अंदर उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के लिए एक सीट पहले से तय मानी जा रही है। पार्टी की ओर से दीपक प्रकाश का नाम लगभग निश्चित है। राजनीतिक समीकरण और पूर्व में हुए समझौतों को देखते हुए इस सीट पर किसी तरह का विवाद नहीं है। सिर्फ औपचारिक घोषणा बाकी है।
यह भी पढ़ें: 'यह झूठ फैलाने का फोरम नहीं', भारत ने UN में पाकिस्तान को खूब खरी-खरी सुनाई
आखिरी सीट पर फंसा पेंच
असल राजनीतिक रोमांच 10वीं सीट को लेकर है। भाजपा और जदयू के उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अब एनडीए के पास एक सीट बची है। इसी सीट के लिए हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) अपनी-अपनी दावेदारी मजबूत तरीके से पेश कर रही हैं। सूत्रों के मुताबिक दोनों दल अपने राजनीतिक महत्व और आगामी विधानसभा चुनाव में भूमिका का हवाला देकर सीट की मांग कर रहे हैं। अंतिम फैसला भाजपा नेतृत्व और एनडीए के शीर्ष नेताओं की सहमति से होगा।
किसका पलड़ा भारी?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस समय चिराग पासवान का कद राष्ट्रीय और राज्य राजनीति दोनों में बढ़ा है। लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन और युवा वोटरों के बीच प्रभाव के कारण उनकी दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। दूसरी ओर, जीतन राम मांझी भी एनडीए के पुराने सहयोगी हैं और महादलित राजनीति में उनकी पकड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विधानसभा चुनाव से पहले सामाजिक संतुलन साधने के लिए एनडीए नेतृत्व मांझी को भी महत्व देना चाहेगा। यही वजह है कि अंतिम निर्णय तक किसी एक के पक्ष में स्पष्ट रूप से कुछ कहना मुश्किल है।
यह भी पढ़ें: पति को मारा, जहां दफनाया वहीं बनाया कूड़ाघर, UP में 'दृश्यम' जैसा हत्याकांड
महागठबंधन भी देख रहा मौका
महागठबंधन के पास उपलब्ध संख्या बल के आधार पर एक सीट पर जीत की संभावना लगभग तय मानी जा रही है। अगर एनडीए की ओर से आखिरी सीट पर उम्मीदवार उतारा जाता है तो मुकाबला रोचक हो सकता है। हालांकि परिणाम काफी हद तक संख्याबल पर निर्भर रहेगा।
नजर अब अंतिम घोषणा पर
नामांकन की समयसीमा तेजी से नजदीक आ रही है। ऐसे में एनडीए को जल्द ही आखिरी सीट पर फैसला करना होगा। यह फैसला सिर्फ एक विधान परिषद सीट का नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन के अंदर ताकत और राजनीतिक संदेश का भी संकेत माना जाएगा।
