उत्तर प्रदेश का खेल तंत्र कागजों में खिलाड़ियों और खेल प्रतिभाओं के विकास के लिए योजनाओं की लंबी सूची तैयार कर रहा है लेकिन जमीनी तस्वीर में प्राथमिकता कुछ और ही नजर आती है। वर्ष 2026-27 के खेल बजट में कुल 1028.84 करोड़ रुपये का प्रावधान है। इसमें से 614.52 करोड़ रुपये यानी करीब 60 प्रतिशत राशि सीधे निर्माण कार्यों के लिए रखी गई है। दूसरी ओर खिलाड़ियों की खुराक, प्रशिक्षण, उपकरण और प्रतियोगिताओं की तैयारी पर होने वाला खर्च बेहद कम है।खेल विभाग की ओर से स्टेडियम, मिनी स्टेडियम, इंडोर हॉल, स्पोर्ट्स हॉस्टल, ट्रैक और अन्य परियोजनाओं के निर्माण पर लगातार जोर दिया जा रहा है। वहीं स्पोर्ट्स हॉस्टलों और कॉलेजों में प्रशिक्षण ले रहे खिलाड़ियों को मिलने वाली सुविधाओं को लेकर लंबे समय से शिकायतें सामने आती रही हैं।
साल 2026-27 के लिए खेल विभाग का कुल बजट 1028.84 करोड़ रुपये है। इसमें 614.52 करोड़ रुपये निर्माण कार्यों पर खर्च किए जाने हैं। बजट की प्राथमिकताओं के मुताबिक, विभाग कुल बजट का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा स्टेडियम, मिनी स्टेडियम, इंडोर हॉल, स्पोर्ट्स हॉस्टल, ट्रैक और अन्य परियोजनाओं के निर्माण पर खर्च करेगा। बाकी 414.32 करोड़ रुपये अधिकारियों-कर्मचारियों और प्रशिक्षकों के वेतन, स्टेडियमों के रखरखाव, प्रशिक्षण, उपकरण और हॉस्टल-कॉलेजों में खिलाड़ियों के भोजन समेत अन्य मदों में खर्च होने हैं। विभाग के मुताबिक, 2026-27 में बड़ी संख्या में निर्माण परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। विभाग का तर्क है कि खेल सुविधाओं के विस्तार के लिए आधारभूत ढांचे का मजबूत होना जरूरी है।
खिलाड़ियों के पोषण और ट्रेनिंग के लिए सिर्फ 48 करोड़
सबसे बड़ा सवाल खिलाड़ियों पर सीधे होने वाले खर्च को लेकर है। 1028.84 करोड़ रुपये के कुल बजट में खिलाड़ियों की खुराक, प्रशिक्षण और उपकरणों पर सिर्फ 48 करोड़ रुपये खर्च होने हैं। इसमें हॉस्टल की बालिका खिलाड़ियों के भोजन पर 3.18 करोड़ रुपये और बालक खिलाड़ियों के भोजन पर 9.68 करोड़ रुपये खर्च का प्रावधान है। हॉस्टल और गैर-हॉस्टल खिलाड़ियों के प्रशिक्षण पर 20 करोड़ रुपये, उपकरणों पर पांच करोड़ रुपये और स्टेडियमों के रखरखाव पर 10 करोड़ रुपये की व्यवस्था है यानी खिलाड़ियों की तैयारी, पोषण और खेल संबंधी जरूरतों की तुलना में निर्माण कार्यों पर होने वाला खर्च कई गुना अधिक है।
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21 जिलों में 44 हॉस्टल, 890 खिलाड़ी रह रहे
खेल विभाग के 21 जिलों में 16 खेलों के 44 हॉस्टल संचालित हैं। इनमें 670 बालक और 220 बालिका खिलाड़ी, यानी कुल 890 खिलाड़ी रह रहे हैं। इन हॉस्टलों में हॉकी, तैराकी, वालीबाल, जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स, क्रिकेट, फुटबाल, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, बास्केटबाल, कबड्डी, कुश्ती, हैंडबाल, बाक्सिंग, जूडो और तीरंदाजी जैसे खेलों का प्रशिक्षण दिया जाता है।खिलाड़ियों को हॉस्टल में रहने के साथ खेल की नियमित तैयारी का अवसर मिलता है लेकिन सुविधाओं और प्रशिक्षण से जुड़े संसाधनों की कमी की शिकायतें बनी हुई हैं।
खिलाड़ियों के बेहतर प्रदर्शन के लिए सिर्फ मैदान और उपकरण ही पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें पोषण विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपिस्ट, स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच, स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट और बायोमैकेनिक्स विशेषज्ञों की भी जरूरत होती है।रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश के कई खेलों में इन विशेषज्ञों की कमी है। सीमित बजट के कारण यह व्यवस्था करना कठिन हो रहा है। भारतीय खेल प्राधिकरण के प्रशिक्षण केंद्रों की तुलना में खिलाड़ियों के पोषण और वैज्ञानिक प्रशिक्षण पर अपेक्षित अधिक खर्च किया जाता है। विभाग से जुड़े लोगों का कहना है कि इसी वजह से कई प्रतिभाएं पिछड़ जाती हैं।
सिर्फ 375 रुपये में खिलाड़ी की रोजाना खुराक?
हॉस्टल-कॉलेज के प्रशिक्षुओं के लिए प्रतिदिन के भोजन पर 375 रुपये की व्यवस्था है। इसमें सुबह-शाम का नाश्ता, दिन और रात का भोजन शामिल है।सवाल यह है कि इतनी राशि में खिलाड़ियों को पर्याप्त पौष्टिक आहार देकर उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए कैसे तैयार किया जा सकता है। खासकर ऐसे खिलाड़ियों के लिए, जिन्हें प्रशिक्षण के दौरान सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक कैलोरी और प्रोटीन की आवश्यकता होती है। तुलना करें तो भारतीय खेल प्राधिकरण के प्रशिक्षण हासिल करने वाले खिलाड़ियों को करीब 650 रुपये प्रतिदिन की खुराक दी जाती है। खेल विभाग के मुताबिक एक खिलाड़ी पर प्रतिवर्ष करीब 1,44,625 रुपये खर्च किए जाते हैं। इसमें खुराक, पढ़ाई-लिखाई, किट, पहनने के कपड़े और चिकित्सा का खर्च भी शामिल है।
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राज्य में 1250 कोच की जरूरत, तैनात सिर्फ 450
खेल प्रतिभाओं को तराशने के लिए प्रशिक्षकों की पर्याप्त संख्या सबसे जरूरी है, लेकिन उत्तर प्रदेश में इस मोर्चे पर भी बड़ी कमी है।राज्य में विभिन्न खेलों के लिए करीब 1250 कोचों की आवश्यकता है, जबकि वर्तमान में केवल लगभग 450 कोच से ही काम चलाया जा रहा है। यानी जरूरत के मुकाबले 800 से अधिक प्रशिक्षकों की कमी है।खेल विभाग के अनुसार राज्य में विभिन्न खेलों के लिए करीब 1250 कोचों की आवश्यकता है। प्रतिभाओं को तराशने के लिए जरूरी प्रशिक्षकों की भारी कमी को राज्य के खेल तंत्र की सबसे बड़ी कमजोरियों में गिना जा रहा है। इसका सीधा असर जिला खेल केंद्रों, स्पोर्ट्स हॉस्टलों, कॉलेजों और प्रतिभा खोज कार्यक्रमों पर पड़ रहा है।
खेल विभाग के सचिव सुहास एलवाई के मुताबिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के लिए खिलाड़ियों की अलग से तैयारी होती है। सरकार ऐसे खिलाड़ियों को अलग से आर्थिक मदद भी करती है। प्रदेश में खेल और खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं और खेल का बजट लगातार बढ़ाया जा रहा है।
